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Uttarkashi में मौत की तबाही, PM Modi, Pushkar Singh Dhami सरकार का इस आपदा से क्या संबंध?

उत्तरकाशी के धराली गांव में मौत का सैलाब… चारों तरफ चीखें… मलबे के नीचे दबे घर… लेकिन इस तबाही का जिम्मेदार कौन? प्राकृतिक आपदा या कोई और? सवाल बड़ा है लेकिन जबाव कौन देगा?
सरकार इसे प्राकृतिक आपदा बता रही है। लेकिन हकीकत तो कुछ और ही बयान कर रही है।
धराली में जो हुआ वो सरकार… लालची होटल माफिया… और अंधे विकास की वजह से हुआ।
धराली में जो कुछ हुआ… वो सिर्फ एक प्राकृतिक हादसा नहीं… ये मानवीय गलती का नतीजा है।
पर्यटन के नाम पर देवदार के हजारों पेड़ काट दिए गए… वही देवदार जो पहाड़ी इलाके को भूस्खलन और सैलाब से बचाते थे।
नदी के किनारे पड़ काटकर होटल खड़े कर दिए गए… और लालच में भरे इस विकास ने मौत को न्योता दे दिया।
अगर देवदार के वो घने जंगल होते… तो शायद ये तबाही इतनी भयानक ना होती।
लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को पर्यटन का लालच ज्यादा था… इंसानों की जिंदगी से ज्यादा!

धराली में जो कुछ हुआ उसमें सरकार बहुत हद तक जिम्मेदार है। प्रधानमंत्री मोदी भी जिम्मेदार हैं। वहां आंख मूंदकर इस अंधे विकास की आड में सो रहे लोग भी जिम्मेदार हैं।

अब याद कीजिए… मार्च 2025… हर्षिल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वो भाषण… जिसमें उन्होंने पर्यटन को साल भर चलने वाला कारोबार बनाने का ऐलान किया।
उसके बाद शुरू हुआ पर्यटकों का तांता… और फिर शुरू हुआ अंधाधुंध विकास।
नदी किनारे होटल… पहाड़ों की ढलानों पर रिसॉर्ट… जंगल की छाती पर बुलडोज़र… और नतीजा — बादल फटा, मलबा टूटा, पूरा गांव तबाह हो गया।

आज सवाल सिर्फ इतना है… क्या ये विकास था… या मौत की पटकथा?
क्या पीएम मोदी, पुष्कर सिंह धामी सरकार और पेड़ काटने वाले माफिया इस कत्लेआम के लिए जिम्मेदार नहीं हैं?
धराली की चीखें आज पूरे देश से जवाब मांग रही हैं…

धरती मां के जख्म… और इंसान की लालच की कहानी… धराली की त्रासदी शायद आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाती रहेगी कि “जब इंसान प्रकृति से खिलवाड़ करता है, तो प्रकृति उसका अस्तित्व मिटा देती है।”

पहाड़ों पर अंधे विकास की अनदेखी लोगों की मौत की वजह बन रही है। उत्तराखंड का धराली ही नहीं बल्कि जोशीमठ भी इसी राह पर लगभग बर्बादी की कगार पर है।

वहीं हिमाचल के कई इलाकों में अधाधुंध विकास ने प्रकृति से छेड़छाड़ की है और जब जब प्रकृति से छेड़छाड़ हुई है तब तब मनुष्य ने उसकी कीमत चुकाई है।
केदारनाथ की आपदा शायद किसे याद नहीं होगी? हजारों लोगों ने जान गंवाई.. लोग लापता हुए। पूरा इलाका तबाह हो गया। बरबादी के मंजर आजतक दिखाई दे रहे हैं। लेकिन हम हैं कि सुधरने का नाम नहीं लेते हैं।

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