गुरु मंत्र, जप रहस्य, सिद्धि क्या है? जानें स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से

 

 

 

 

गुरु मंत्र स्वामी का नाम, गुरु मंत्र ईष्ट का नाम है। गुरु मंत्र से जीवन की सारी बाधाएं आसानी से दूर हो जाती हैं सारे व्यवधान समाप्त हो जाते हैं, जीवन सफल हो जाता है, गुरु मंत्र ईश्वर को पास लाने का वो अचूक मंत्र है जो गुरु द्वारा सभी प्रकार की बाधाओं को दूर कर, हमें अपने परम ज्ञान के माध्यम से ईश्वर के दर्शन करवाते हैं। गुरु मंत्र, गुरु अपने शिष्य को जप करने हेतु देते हैं । गुरु मंत्र के फलस्वरूप शिष्य अपनी आध्यात्मिक उन्नति करता है और अंतत: मोक्ष प्राप्ति करता है। वैसे गुरु मंत्र में जिस देवता का नाम होता है, वही विशेष रूप से उस शिष्य की आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक होते हैं ।

 

 

 

जप क्या है? अक्सर कई लोगों को इसका सही अर्थ नहीं पता। जप करने से यानि अपने ईष्ट, भगवान के नाम को बार-बार याद कर उनके और निकट होना, उनके चरणों में स्थान पाना, उनका दास बनना।

 

सिद्धि शब्द का सामान्य अर्थ है सफलता। सिद्धि अर्थात किसी कार्य विशेष में पारंगत होना। समान्यतया सिद्धि शब्द का अर्थ चमत्कार या रहस्य समझा जाता है, लेकिन योगानुसार सिद्धि का अर्थ इंद्रियों की पुष्टता और व्यापकता होती है। अर्थात, देखने, सुनने और समझने की क्षमता का विकास।

 

 

 

 

 

गुरु-मंत्र-जप-रहस्य-सिद्धि क्या है,इस विषय को स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी ने अपने सत्यास्मि धर्म ग्रंथ में गद्य और पद्य में वर्णित किया है,जिसका एक कवित्त्व अंश यहाँ भक्तों के ज्ञान वर्धन के लिए दिया है…

 

 

 

 

 

मैं कौन हूँ,मैं कौन हूँ
रटने से नहीं होता ज्ञान।
इसी अर्थ संग ध्याना होता
स्थूल स्वरूप में निज भान।।
गुरु बनाना एक पक्ष है
उसे अपने में ले ध्याना होगा।
मैं नहीं केवल गुरु है
इसी भाव को पाना होगा।।
अन्न शरीर से प्राण शरीर तक
और प्राण शरीर से लेकर मन।
अखंड जाप गुरु मंत्र नित करके
स्वयं पाओगे आत्म लक्ष्य सघन।।
सच्च में विद्या चाहो पाना
तो एक ही मंत्र जपो अखंड।
और गुरु में तुम और तुम में गुरु
दो अंड एक कर मिले आत्म ब्रह्मांड।।
और प्रेम जिसे भी अधिक हो करते
उसे संग ले करना ध्यान।
दोनों एक ध्यान बनाओ
तब पाओगे प्रेम आलोकिक विज्ञानं।।
जप सिद्धि जप में छिपी
जप मध्यम स्वर में ध्यान।
स्पष्ट श्रवण कर श्वास संग
जप बने ध्वनिमय ध्यान।।
जप एक स्वर चलता रहे
इष्ट गुरु मंत्र जप नाँद।
मैं मंत्र अर्थ भाव इष्ट
जप कंठ ह्रदय नाभि और नाँद।।
जप करो एक मंत्र कर धारण
जपो रात दिन सिद्ध निवारण।
जपते रहो स्वप्न हो दर्शन
जपते जपते प्रत्यक्ष सिद्ध कारण।।
जप अर्थ है इच्छा दोहराना
जप अर्थ है क्रिया मंथन।
जप अर्थ है मननमय चिंतन
जप अर्थ है ज्ञान अभिनंदन।।
जप ही जीवन भरता रंग
जप जी जीवन आत्म आनन्द।
जप है तो सर्व इच्छा पूरी
जप तग्ये स्वयं बन परमानन्द।।

 

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स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
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स्त्रियुगों का सत्यार्थ प्रमाण, सत्यास्मि धर्म ग्रन्थ में वर्णित इस तथ्य को बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

 

स्त्रियुगों का सत्यार्थ प्रमाण-इस विषय को प्रमाण के साथ समझाते हुए स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी बता रहें हैं की-

 

 

 

 

 

अनेक धार्मिक जिज्ञासु विद्धानों ने सत्यास्मि धर्म ग्रन्थ का अध्ययन कर ये प्रश्न किया की- इस ज्ञान का प्रमाण क्या है? की आपके प्रकाशित सत्यास्मि धर्म ग्रन्थ में दिए पुरुष युगों के उपरांत स्त्रियुगों और बीजयुगों की घोषणा है? जबकि सभी धर्म ग्रन्थ घोषणा कर रहे है की चार पुरुष युगों के महाप्रलय में सभी समाप्त हो जायेगा। उसके बाद कोई नवीन युग और सृष्टि का उल्लेख नही है। तब कैसे इसे प्रमाणित करते है?
तब इसका उत्तर सत्यास्मि में इस प्रकार से दिया है की- मूल ईश्वर के तीन गुण है जो- तम-रज और सत्, जो पुरुष स्त्री और बीज यानि इलेक्ट्रॉन न्यूट्रॉन प्रोटॉन नाम से विज्ञानवत कहे जाते है। तब स्वभाविक ही सिद्ध होता है की जब पुरुष तत्व का युग हुआ है, तो स्त्री का भी होगा, और बीज का भी होगा।दूसरी बात प्रलय का अर्थ समाप्त होना नही है।इसका सत्य अर्थ एक तत्व का दूसरे तत्व के रूप में रूपांतरित होना या सहयोग अर्थ है, जैसे-ऊर्जा नष्ट नही होती वो रूपांतरित होती है। यो ये जो तीन गुण है, उनमे किसी एक की अधिकता एक युग में अधिक होती है,दूसरे युग में किसी और तत्व की अधिकता होगी और पहले तत्व की कम होगी, जैसे-कभी तम् गुण की अधिकता दूसरे रज और सत् से अधिक रहती है। तब संसार भिन्न प्रकार का होता है। उस समय के जीव अन्य प्रकार के होते है। और जब तम् की अधिकता उसके उपयोग से घटती जाती है, तब रज गुण की व्रद्धि होती है। यो तम गुण का रज गुण में अधिकांश विलय के साथ ही आगामी सत् गुण की भी व्रद्धि व् विस्तार सन्तुलन को होता है। यही एक का दूसरे में समाहित होना ही, पर माने दूसरे में लय यानि प्रलय कहलाता है। महाप्रलय का अर्थ है-कि तीनों गुणों का परस्पर लय होना और मूल तत्व में स्थित होना है। जो बीजवस्था कहलाती है। जिससे यानि बीज से पुनः समयांतर में सृष्टि होती है। जिसका उल्लेख सभी धर्मग्रन्थों में यूँ किया है की प्रलय के उपरांत सभी मृत मनुष्य आत्मा ईश्वर के समक्ष अपने कर्मों के आगामी परिणामों के लिए खड़ी हो जाएँगी यानि पुनः जीवित होंगी। जबकि ये प्रलय कब होगी कोई ज्ञात नही है। कहा है ईश्वर ही इसे जानता है। अर्थात आत्माओं का सम्पूर्ण समाप्ति कहाँ सिद्ध हुयी? अर्थात फिर से नवीन सृष्टि होगी, ये सिद्ध होता है। यही सत्यास्मि में सच्चा अर्थ और ज्ञान है, की पुरुष युग में स्त्री ने पुरुषो के सम्पूर्णत्त्व को अपना सहयोग दिया। चूँकि कोई एक ही एक समय में सम्पूर्ण हो सकता है। जैसे एक गुण। यो पुरुष युगों के उपरांत स्त्री युग स्वयं आना सिद्ध होता है। जो की वर्तमान में चल रहा है। यहॉ पुरुष अब स्त्री के सर्वभौमिक विकास में अपना सम्पूर्ण सहयोग दे रहा है।
और पुराणों में भी अनेक मनुओं और आगामी युगों की भविष्यवाणी है। जो वहीं से ली गयी है जिसे आप यहा पढ़े—

 

 

 

स्वायंभुव मनु:-
14 मन्वन्तर के 14 मनु कहे गए हैं। अब तक 7 मनु हुए हैं और 7 होना बाकी है। प्रथम स्वायम्भुव मनु, दूसरे स्वरोचिष, तीसरे उत्तम, चौथे तामस, पांचवें रैवत, छठे चाक्षुष तथा सातवें वैवस्वत मनु कहलाते हैं। वैवस्वत मनु ही वर्तमान कल्प के मनु है। इसके बाद सावर्णि, दक्ष सावर्णि, ब्रह्म सावर्णि, धर्म सावर्णि, रुद्र सावर्णि, .रौच्य या देव सावर्णि और भौत या इन्द्र सावर्णि नाम से मनु होंगे। प्रथम मन्वन्तर के मनु स्वायंभुव मनु को प्रथम मानव कहा गया है।शास्त्र कहते हैं की- सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई है। इनकी पत्नीं का नाम शतरूपा था। स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा के कुल पांच सन्तानें थीं। जिनमें से दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा तीन कन्याएं आकूति, देवहूति और प्रसूति थे। मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, कर्तु, पुलस्त्य तथा वशिष्ठ।-ये सात ब्रह्माजी के पुत्र उत्तर दिशा में स्थित है, जो स्वायम्भुव मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं। आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ। रुचि के आकूति से एक पुत्र उत्प‍न्न हुआ, जिसका नाम यज्ञ रखा गया। इनकी पत्नी का नाम दक्षिणा था। कपिल ऋषि देवहूति की संतान थे। हिंदू पुराणों अनुसार इन्हीं तीन कन्याओं से संसार के मानवों में वृद्धि हुई। प्रियव्रत और उत्तानपाद। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नी थीं। राजा उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुए। ध्रुव ने बहुत प्रसिद्धि हासिल की थी। स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था। जिनसे आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, हव्य, सबल और पुत्र आदि दस पुत्र उत्पन्न हुए। प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम तामस और रैवत- ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए जो अपने नामवाले मनवंतरों के अधिपति हुए। महाराज प्रियव्रत के दस पुत्रों मे से कवि, महावीर तथा सवन ये तीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। और उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण किया था। स्वारोचिष मनु : द्वितिय स्वारोचिष मन्वन्तर में प्राण, बृहस्पति, दत्तात्रेय, अत्रि, च्यवन, वायुप्रोक्त तथा महाव्रत ये सात सप्तर्षि थे।
संत सूरदास ने इस सम्बंध में भविष्यवाणी करते हुए कहा है की-
अरे मन! धीरज कहे न धरे । संवत् दो सहत्र सो ऊपर ऐसो योग परे । सहत्र वर्ष लगि सतयुग बीते धर्म की बेल बढ़ै।अरे मन ! धीरज काहे न धरे।
और महर्षि अरविन्द ने भविष्यवाणी की थी की-भारतवर्ष में एक दिव्य अभियान का प्रारम्भ होगा। जो यहाँ की असुरता को नष्ट करके फिर से सबको एक नई दिशा देगा और इस देश की प्रतिष्ठा को,वहाँ के गौरव को बढ़ाएगा।यह आंदोलन संसार में फिर से सतयुग जैसा सुख सौम्यता लायेगा।ऐसी कई दिव्यता की भविष्यवाणियां अपनी ध्यान दर्शनों में कही है।
और भी भविष्यवाणियों में भी ये उल्लेख है- नेस्त्रेदम्स ने कहा है की-
सूरज पर भूकंप से विकिरण के तीव्र तूफान उठेंगे, जो धरती को इस कदर गरमा देंगे कि ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघलने लगेगी। जब ऐसा होगा तब धरती के ध्रुव भी बदल जाएंगे। कुंभ राशि के युग की शुरुआत में आसमान से एक बड़ी आफत धरती पर आ टूटेगी। धरती का ज्यादातर हिस्सा प्रलयकारी बाढ़ की चपेट में आ जाएगा और तब जान और माल की भारी क्षति होगी।
हैरानी की बात ये है कि नास्त्रेदमस ने कुंभ राशि के जिस युग की शुरुआत की बात की है- वो वक्त है 21 दिसंबर 2012 के बाद का ही है। जो 2012 से 2018 तक में नही घटी है तथा ये भविष्यवाणी अनेक बार गलत भी गयी है। साथ ही इनकी भविष्यवाणियों को सभी नेता,धार्मिक संगठनों ने अपने अपने मतों के लिए तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया है। जो की यहां हमारा उद्धेश्य नही है। फिर भी जिज्ञासुओं के लिए एक सत्य भविष्य एक नई दिशा की और प्रमाणिकता के साथ संकेत दे रहे है।बाकि पाठकों का अपना मत क्या है? ये उनका व्यक्तिगत चिंतन उनके साथ है–ठीक 2012 यही से सत्यास्मि मिशन का मुख्य सामाजिक योजनाओं के कार्यान्वित का प्रारम्भ है।
जैसे-नस्त्रेदमस ने देखा की प्रलय आएगी। तब कुम्भ राशि से युगप्रवर्तक पुरुष और उसका मनुष्य उद्धारक दर्शन और युग प्रारम्भ होगा।
तब आप देखें की- कुम्भ राशि–सत्यास्मि धर्मग्रन्थ,स्त्री शक्ति की महावतार सत्यई पूर्णिमा देवी,सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा महामंत्र, स्त्री शक्तिरूपा ई E एनर्जी का प्रतिनिधि अक्षर जो कुण्डलिनी का ॐ से भी परिपूर्ण अर्थ प्रत्यक्ष में प्रकट करता है,विश्व धर्म के इतिहास में पहली बार सत्यास्मि मिशन ने स्त्री की स्वतंत्र कुंडलिनी की भिन्नता और उसके 5 बीजमंत्र और इस सबके चित्र आदि विषय,जो आजतक किसी धर्म ग्रन्थ में वर्णित नहीं है और न हीं किसी अवतार या योगी ने इस विषय में कोई खोज की है,उसे खोज के साथ समाज के सामने रखा है।
स्वतंत्र स्त्री शक्ति गंगा स्नान आंदोलन और स्त्री युग का प्रथम युग “सिद्ध युग” और इस ग्रन्थ के स्त्रिशक्ति के साथ सहयोगी पुरुष स्वामी सत्येंद्र”सत्य साहिब”जी और सत्यास्मि मिशन तथा स्त्री शक्ति के सर्वभौमिक उन्नति के लिए समस्त देश और विदेशों में “श्री भग पीठों” की स्थापना, जिसके माध्यम से चतुर्थ नवरात्रियों की पूजा उपासना जिसका प्रारम्भ हो चूका है। और यहाँ सत्यास्मि में सनातन धर्म का वेदों से भी परे का सृष्टि दर्शन है।तब क्या और प्रमाण शेष है, जो यहाँ प्रकट नही है।अर्थात सभी पूर्वत भविष्यवाणी यहाँ सम्पूर्ण है।समझदार को ये स्त्री युग का प्रमाण बहुत है।और चल रहा स्त्री विकास का समय, अभी इसे सिद्ध करेगा।

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
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स्त्री की आत्म सिद्धि की पूर्णता और शक्तिपात के प्रभाव से शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति कितनी हुयी? इस विषय पर अनेक प्रमाण के साथ योग ज्ञान को बता रहे हैं -स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी

 

 

 

 

इस विषय में गुरु स्त्री संत हजरत बाबा जान और शिष्य विश्व प्रसिद्ध मेहर बाबा के आध्यात्मिक जीवन के द्रष्टान्तो को देखें:-

 

 

 

यहाँ विषय है की एक आध्यात्मिक स्त्री शक्ति के सम्पूर्णत्त्व का की-क्या स्त्री शक्ति किसी पुरुष शिष्य को अपनी आध्यात्मिक शक्तिपात के बल से सम्पूर्ण आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति करा सकती है?

या उस शिष्य को अन्य पुरुष सिद्ध गुरुओं का भी सहारा लेना पड़ेगा? जैसे की आज के इस स्त्री गुरु हजरत बाबा जान और उनके शिष्य मैहर बाबा के बीच यहां इस घटना से उदाहरण वश बताया जा रहा है। 25 फ़रवरी 1894 को जन्मे मैहर बाबा एक सम्पन्न पारसी परिवार से थे वे जब थोड़े बड़े हुए लगभग 19 साल के मई 1913 में तब एक दिन वे अपनी साईकिल से कही जा रहे थे। तो उसी रास्ते में एक नीम के पेड़ के पास अनेक भक्त गणों से घिरी एक वृद्ध महिला को देखा और फिर उन्हें अपनी और आते देख वे साईकिल से सम्मान को उत्तर गए। महिला पास आई और इन्हें अपने आलिंगन में लेकर इनके माथे पर चूमा। और इसी चूमने से बच्चे में एक अद्धभुत परिवर्तन का आरम्भ हुआ। और फिर से 1914 जनवरी को एक बार फिर स्पर्श किया। तो वे तीन दिन अचेत रहे। इसके बाद वे एक विचित्र मूर्च्छा तन्द्रा में रहने लगे। इस तन्द्रा से बाहर लाने के लिए परिजनों ने अनेक उपाय करे, पर लाभ नही हुआ। तब उसी काल में वे अपने बच्चे को 1915 में शिरडी में साई बाबा के पास लाये। प्रातः साई शौच को जा रहे थे। उन्होंने बच्चे को अपनी और आते देख उसकी आध्यात्मिक स्थिति को देख कर कहा- या परवरदिगार और एक मट्टी का ढेला उठा कर बच्चे को फेंककर मारा। जो बच्चे के वही माथे में लगा, जहाँ उस स्त्री सन्त ने चूमा था। और बच्चा तुरन्त उस तन्द्रा से बाहर आने लगा और साई को प्रणाम किया। तब साई ने उस बच्चे व् परिवार वालो को अपने एक शिष्य संत उपासनी बाबा के पास भेजा और वो बच्चा इस प्रकार उपासनी बाबा व् साई और हजरत ताजुद्दीन व् नारायण बाबा पांच सन्तों की आध्यात्मिक संगत से तप जप ध्यान करता सिद्धि अवस्था को पहुँचा। और उसने एक स्वतन्त्र गुरु परम्परा चलाई। और अनगिनत शिष्यों को प्रेम उपदेश दे कर कल्याण किया। प्रश्न ये है की- क्या मैहर बाबा के जीवन में अलग अलग गुरुओं के द्धारा आत्मिक उन्नति होनी लिखी थी? क्या एक ही स्त्री गुरु के द्धारा उन्हें जो शक्तिपात हुआ उससे उन्होंने ही क्यों नही बाहर निकाला? एक पुरुष शिष्य को पुरुष गुरु ने ही मात्र बिना शक्तिपात किये एक मट्टी का ढिला वो भी दूर से मार कर उस अनियंत्रित योग निंद्रा से बाहर निकाल दिया, यो उन स्त्री संत से ये साई ज्यादा सिद्ध थे? या वे केवल आत्मशक्ति का उत्थान की कर सकती थी? उसे सम्पूर्ण नियंत्रण नही कर सकती थी? यो वे साधक स्थिति को ही प्राप्त थी ना की सिद्ध थी? जबकि हजरत बाबाजान के विषय में ये प्रसिद्ध था की उन्हें कभी स्नान करते नही देखा। और तब भी उनसे सदा सुगंध आती थी और वे भिक्षा मांगती और एक खुले में नीम वृक्ष के नीचे ही दिन रात गुजारती थी। ये अफगानिस्तान के बुलीचिस्तान के रहने वाली थी और अंत में 25 साल यही पुणे में नीम के पेड़ के नीचे रही और 21 सितम्बर सन् 31पुणे में मोक्ष को प्राप्त हुयी। और ये मुस्लिम धर्म सूफियाना सिद्धांत के अंतर्गत गुरु शिष्य परम्परा की सन्त थी। ऐसी स्थिति के उपरांत इस उदाहरण से क्या समझा जाये? ठीक यही आपको रामकृष्ण परमहंस के जीवन में भी देखने मिलता है। की भैरवी ब्राह्मणी ने भी अपने इस पुरुष शिष्य को केवल चोसठ कलाओं में सिद्धि प्रदान में गुरुपद निभाया। जिसका अंत सविकल्प समाधि तक ही था। और उससे ऊपर के लिए उन्होंने पुरुष गुरु तोतापुरी का ही गुरु आसरा लिया। ठीक यही यहाँ उदाहरण में भी दीखता है की- क्या इस युग में स्त्री की आत्मिक आध्यात्मिक सिद्धि केवल इतनी ही है, की वो आत्मशक्ति को उठा तो सकती है, परन्तु उसे इस आधात्मिक की सर्वोच्चता तक नही पहुँचा सकती है। ये पुरुष युग का प्रभाव है या स्त्री की आत्मशक्ति केवल पंचततत्वी प्रकर्ति तक ही पहुँच है? इससे ऊपर केवल पुरुष ही पहुँच और पहुँचा सकता है?
यही विषय सत्यास्मि मिशन ने इस विश्व धर्म में पहली बार विश्व के सामने उजागर किया।की पुरुष की कुण्डलिनी और स्त्री की कुण्डलिनी दोनों बिलकुल ही भिन्न है। जब दोनों के अंदर से बाहर तक बीज सहित शरीर भिन्न है। यो अंदर तक भिन्नता है,तो उनकी ऊर्जा और उसका उत्थान और चक्र आदि सब भिन्न अवश्य है।साथ ही जो रूढ़िवादी लोग है,वे ये कहते है की-आत्मा तो एक है शरीर भिन्न है। ये भ्रम है। तो ये प्रश्न उठता है, की जब आत्मा एक है तो दो अलग अलग स्त्री और पुरुष के शरीर कैसे हुए? वो भी एक आत्मा की तरहां एक शरीर ही होने चाहिए थे? जैसा की ऐसा बिलकुल नही है, दोनों बिलकुल अलग है, तब क्या है? ऐसी अनेक स्त्री संत हुयी है,जैसे मुक्ताबाई, जो पुरुष देव राम, कृष्ण,विठ्ठल,पंढरपुर और अपने सिद्ध पुरुष गुरु ज्ञानेश्वर भाइयों से दीक्षा पा कर भक्ति के उच्चतम मार्ग पर बढ़ी तो थी, परन्तु स्वतन्त्र गुरु पद और विशेषकर उनकी शिष्य परम्परा में कोई सिद्ध शिष्य नही हुया। इसे पढ़ कर लोग उदाहरण देंगे, पर उन्हें सोचना होगा की- ऊपर के प्रमाणित उदाहरणों में क्या कहा गया है। इसी स्त्री की कुंडलिनी पुरुष की कुण्डलिनी से बिलकुल भिन्न है। ये ही जानने को सत्यास्मि की दीक्षित ध्यानी एक महिला भक्त मोनिका ने, अपना योग प्राणायाम करते हुए अपना ध्यान मूलाधार चक्र में लगाया तो उसे स्फुरण के साथ दो चक्र दिखाई दिए नीचे वाले में रं बीज मंत्र जो अष्ट रंगीन कोणों से बना था तथा उससे एक रेखा ऊपर को जाती दूसरे चक्र से जुडी थी जिसमें हं बीज मंत्र अनेक कोणीय दलों से घिरा बना था। और अगले दिन भी उसे ध्यान में वही दिखा जो चैतन्य भी हो रहा था। जबकि पुरुष और उपलब्ध कुण्डलिनी चित्रों में लं मूलाधार में है और हं कण्ठ चक्र में दिखाया है। ऐसी भिन्नता क्यों दिखी? ये प्रश्न बड़ा गहरा खोज भरा है? लेकिन इस प्रश्न का उत्तर ये है की- हमारे ध्यान में हमे तीन आकाशों के दर्शन होते है। पहला मनो आकाश जो पैरो से मूलाधार चक्र और ह्रदय चक्र के बाहरी क्षेत्र तक उसकी सीमा होती है। इसके बाद आता है चित्त आकाश जो ह्रदय चक्र से कण्ठ चक्र तक और आज्ञा चक्र तक की सीमा तक क्षेत्र होता है। और तीसरा केवल कण्ठ से आज्ञाचक्र तक होता है। इसके उपरांत सहस्त्रार चक्र में कोई आकाश नही होता है। वहाँ इन सब आकाशों की निर्मित कर्ता आत्मा स्वयंभू चैतन्य और प्रकाशित व् साक्षी होती है। यो मूलाधार चक्र में तम गुण प्रकर्ति के दर्शन होते है। और जो ये बीज अक्षर व् चक्र है। इनका आभास और दर्शन हमें स्पष्ट होता है। यहाँ अंतर्जगत में जो है वो प्रतिबिम्बित होता है।और प्रत्येक चक्र एक दूसरे की क्रिया और प्रतिक्रिया है। जेसे व्यक्ति को अपना चेहरा शीशे में दीखता है, पर व्यक्ति अलग और दूर होता है, यो जो चक्र मोनिका ने देखें, वे नाभि और कण्ठ का प्रतिबिम्ब मात्र दर्शन और उनका चेतना स्वरूप था। इसमें साधक में उस समय किस चक्र में शक्तिपात हुआ है? वही चक्र और उससे ऊपर के चक्र का सम्बन्ध दीखता है। जैसे मनुष्य में जो प्राण और अपान दो मुख्य मन धाराएं है। वही धाराएं मिलकर जब गुरु या पूर्व जन्म के तपोबल से सुषम्ना में प्रवेश करती है। तब साधक को भस्त्रिका होना, मन का अंतर्मुखी होना, ध्यान लगने का कुछ काल तक प्रभाव होता है, और टूटता रहता है। और किसी को अनन्त प्रकर्ति के दर्शन व् किसी को पूर्वजन्म तो किसी को पूर्वजन्म की गयी मंत्र जप साधना के देव देवी दर्शन आदि, जो मंत्र का भावार्थ मात्र दर्शन होती है। जिसको रखकर साधक ने मन एकाग्र किया होगा। उनका स्पष्ट दर्शन वाणी सुनाई आती है। ये सब अस्थायी है।ये सब अभ्यास बंद और उसके साथ ही सब ये दर्शन समाप्त। और जब साधक की चेतना शक्ति उसके ह्रदय आकाश में प्रवेश करती है,तब ऐसा होने पर उसे भाव समाधि यानि भक्ति का गहरा अनुभव आदि क्रियाएँ होती है। यो मूल विषय पर आते है की- ये उस समय ध्यानाभ्यास में जो स्वर चलता है। जेसे सूर्य तो रं बीज व् नाभि चक्र के दर्शन होते है। और जहाँ जिस चक्र में प्रवेश या दर्शन होते है। उस चक्र का प्रतिक्रिया चक्र का भी दर्शन होता है। क्योकि मेने पूर्व कहा की दो प्राण अपान का संघर्ष ही क्रिया प्रतिक्रिया करता ऊपर को चलता है। यही उसकी क्रिया प्रतिक्रिया की वक्री टेडी एक दूसरे को काटती हुयी सर्पाकार चाल ही कुण्डलिनी कहलाती है। ये बाहर से अंदर और ऊपर तक दो ही का संघर्ष मिलन विछोह चलता है। जहाँ वे मिलते है,जहाँ आकर्षित होते है। वहाँ चक्र का एक क्षेत्र बनता जाता है। जो कुण्डलिनी चक्र कहलाते है। ये स्त्री पुरुष ही है,जिन्हें चन्द्र सूर्य आदि नामों से कहा गया है।तो यहाँ देखा दर्शन मनोदर्शन भी कहा जा सकता है। जो हमने अपनी स्म्रति में पढ़कर बना रखा है की चक्र ऐसे होते है। यो उसके दर्शन होते है।इस विषय में सत्यास्मि मिशन की स्त्री की कुण्डलिनी जागरण विषय को पढ़े।इस विषय के और भी गम्भीर रहस्यों को आगे बताया जायेगा।

 

 

 

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
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11 दिसंबर श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पिता स्व. श्री जगदीश्वर सिंह तौमर के जन्मदिन पर स्वामी जी की मार्मिक कविता रूपी श्रद्धांजलि

 

 

 

आज 11 दिसंबर स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पिता परम पूज्नीय स्व. श्री जगदीश्वर सिंह तौमर का जन्मदिन है और स्वामी जी अपनी कविता रूपी श्रद्धांजलि प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

 

11 दिसम्बर मेरे पिता जी नाम से पिता की अर्थ व्याख्या देते स्व. श्री जगदीश्वर सिंह तौमर जी के जन्मदिवस पर कवित्तश्रद्धांजली अर्पित करते हुए स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी….

 

 

मैं हूँ…. बिन कहे
एक नजर से कहते।
मुस्कराहट दे अपनी
मेरी गलतियां सहते।।
बचपन में दिखाते
जवानी क्या है।
पकड़ हाथ बताते
रवानी क्या है।।
दोस्त बनते संग रह
हमें जवानी दे।
और बुढ़ापा से
अपनी कहानी दे।।
यही हैं बिन कहे
*मेरे श्री पिता*।
अंगार जीना का दे
अपनी जलती चिता।।
अर्द्धांग्नि *लीला* धरा है
*श्री श्री जगदीश्वर*।।
चिरशांति जाग्रत इसी
दुनियां में उसकी ईश्वर।।
रहें हम बन कर
उनके इस जहां में चमन।
शांति मिले हमें उनको
कर पाक रूह ए नमन।।

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स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
जय सत्य ॐ शरणं शांतिः
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स्वतंत्र मतदान व सरकारी योजनाओं को सफल बनाने के लिए स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज की महत्वपूर्ण सलाह

 

 

 

 

 

 

भारत सरकार को चाहिए कि- इस नए वैचारिक योजना के अंतर्गत-भारतीय मतदाता और मतदानों को सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाये, ताकि प्रत्येक मतदाता अपने को मिलने वाले सरकारी सुविधाओं के लाभ हेतु अधिक से अधिक मतदान करेगा, इस सम्बंध में अपना सामाजिक चिंतन को प्रकट कर रहें हैं- स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी….

 

 

 

 

इस सम्बन्ध में मतदान केंद्रों को ऐसी व्यवस्था से जोड़ा जाये,जिसके माध्यम से पता चल सके कि-कितने प्रतिशत लोगों ने मतदान किया,यहाँ प्रतिशत मतदान का अर्थ-प्रचलित मतगणना से नहीं, बल्कि उस प्रतिशत से है, जिसमें जिस जिस ने वोटिंग की है,उसका आधार कार्ड या ऊँगली प्रिंटिंग के माध्यम से सरकारी रिकॉर्ड रहने से उसकी उपस्तिथि पता चलेगी और वही सरकारी या गैरसरकारी योजनाओं का लाभ उठा पायेगा,इस संदर्भ में वोटिंग मशीन में ही एक अतिरिक्त व्यवस्था की जानी चाहिए की-एक अतिरक्त स्थान पर वोटर को वोट कहीं भी डाले वो स्वतंत्र है,तब अपना वोट डालने के उपरांत वो वोटिंग मशीन में लगा एक “थम प्रिंट” यानि अपने अंगूठे की छाप लेने वाले बटन पर लगाये,जो की लगाना अनिवार्य है।तब वोटिंग मशीन के इस अंगूठे प्रिंटिग स्विच का सम्बन्ध सीधा सेटेलाइट के माध्यम सीधा मतदाता कार्यालय अथवा रोजगार कार्यालय से सम्बंधित कम्प्यूटर में अंकित हो जाने से एक सफल रिकॉर्ड रजिस्टर हो जायेगा!! आगे इसी सबंधित सुचना का उपयोग रोजगार कार्यालय जब भी देश के किसी भी प्रान्त में सर्विस आदि निकलेगा तभी उस रोजगार पेपर में ये लिखा अनिवार्य होगा की-जिसने चुनावों में अपना मतदान दिया है,वहीँ आवेदन भरने का अधिकारी है और जिसने मताधिकार का उपयोग नहीं किया है,वो इस प्रकार की किसी भी सरकारी या अर्द्ध सरकारी या प्राइवेट सर्विसों में भी सम्मलित नहीं हो सकेगा!!

 

 

इस प्रकार की और भी संशोधित प्रक्रिया के द्धारा की गयी व्यवस्था से मतदाताओं में 100% मतदान की जागरूकता बढ़ेगी और सही प्रतिशत में सम्पूर्ण मतदान भी होगा।
और उचित सरकार भी चुनने में साहयता मिलेगी और सरकारी साहयताओं का लाभ भी मतदाताओं को प्राप्त होगा।

 

 

 

इस विषय पर आगामी चुनावों से पूर्व सरकार को अधिक ध्यान देना होगा।और इस विचार योजना में जो संशोधन हो उसे करते हुए,अवश्य लागु किया जाना चाहिए।।
विशेष:- केवल संतों या ऐसे सन्यासियों को छोड़कर जो किसी भी प्रांत या देश से परे केवल अपनी आत्मसाक्षात्कार को ही इस संसार में त्यागी बन रहते है।यो उनका मत तो ईश्वर या स्वयं को होता है।उपयुक्त नियम सामान्य संसारिक जनों के लिए है।
और भिक्षा मांगने वाले सन्तों और भिखरियों के लिए भी ऐसी ही एक व्यवस्था से जोड़ा जाना चाहिए की-आप राशन विभाग में अपना रजिस्टेशन कराये और आधार कार्ड और अंगूठे की छाप लगा कर अपने क्षेत्र की राशन दुकान से प्रतिदिन या साप्ताहिक भोजन सामग्री प्राप्त करें।यो जन समाज में भी इन कथित माँगता बाबाओं के इस दैनिक अनावश्यक मांगने और लालच के चलते लोगो के दिए धर्म लाभ हेतु-कम्बल,कपड़े, और दवाइयों के नाम पर पैसा मांग फिर उसे कहीं बिक्री करके अपने व्यसनों पर खर्च करने की अव्यवस्था पर बड़ा अंकुश लग जायेगा।इस विषय पर भी ऐसी चिंतन योजनाओं को सरकार को लागु करना चाहिए तब कानून अधिकार होने से जन साधारण धार्मिक श्रद्धालुओं में भी जागर्ति आएगी और वे इन कथित बाबाओं से निडर अपना कथन रखते हुए की-भई तुम राशन कार्यालय से जाकर अपना राशन लो और यदि तुम लोगों को सरकारी राशन देने वाला नहीं देता है तब हम उससे जाकर इस सम्बन्ध में कहेंगे,यो अपना रजिस्टेशन दिखाओ और नहीं है चलो कराते है।तब ये अनावश्यक भिखरियों का व्यभचारी प्रपंच बहुत हद तक अंकुश में आ जायेगा।
इस विचार को अधिक से अधिक शेयर करें और जनजाग्रति में अपना सहयोग अवश्य दे।।इसी अपेक्षा के साथ-सह्रदय धन्यवाद!!

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः

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