
आज शनिवार है और शनिवार के दिन होती है शनि देव जी की पूजा। हम आपको बताने जा रहे हैं कि शनिवार के दिन शनि भगवान की पूजा करने से क्या फल मिलता है। इस आर्टिकल में शनि भगवान के लाभदायक मंत्र हैं। आरती है, और शनि चालीसा भी है। जिन्हें पढ़कर आप अपने जीवन को कष्टों से दूर कर सकते हैं।
तो आइए जानते हैं शनि भगवान की महिमा और उनकी पूजा की विधि :
शनि देव कौन हैं?
शनि देव को हिंदू धर्म में न्याय का देवता माना गया है। वे नवग्रहों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। भगवान सूर्य और छाया (संवर्णा) के पुत्र शनि देव अपने कर्मों के अनुसार फल देने वाले देव हैं। वे धीरे-धीरे चलते हैं और इसी कारण उन्हें ‘शनि’ कहा गया है (शनि = शनैः शनैः)। उनका वाहन कौवा या काला कौआ होता है और वे हाथ में धनुष-बाण या गदा लिए होते हैं।
शनि देव की पूजा विधि (Shani Puja Vidhi)
पूजा का श्रेष्ठ दिन: शनिवार
समय: सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बीच
स्थान: शनि मंदिर, पीपल के पेड़ के नीचे, या घर के पूजाघर में

पूजा सामग्री:
- काले तिल और सरसों का तेल
- नीले/काले फूल
- काले कपड़े
- लोहा या लोहे का पात्र
- धूप-दीप, अगरबत्ती
- काले चने, उड़द
- शनि चालीसा और आरती पुस्तक
- भगवान शनि की मूर्ति या चित्र
पूजा की विधि:
- प्रातः स्नान करके साफ वस्त्र पहनें, विशेष रूप से काले वस्त्र।
- शनि देव की मूर्ति/चित्र को स्वच्छ जल से धोकर स्थापित करें।
- शुद्ध घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- काले तिल, नीले फूल और लोहा अर्पित करें।
- “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करें (कम से कम 108 बार)।
- शनि चालीसा और आरती का पाठ करें।
- अंत में शनि महाराज से अपने पापों की क्षमा मांगें और न्याय की याचना करें।
शनि पूजा के लाभ
- शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कुप्रभावों से राहत मिलती है।
- व्यापार, नौकरी और कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलता मिलती है।
- न्यायप्रिय जीवन और संयम में वृद्धि होती है।
- जीवन में अनुशासन, कर्मठता और धैर्य आता है।
- बुरे कर्मों के फल में शमन होता है और अच्छे कर्मों के द्वार खुलते हैं।
शनि देव के प्रमुख मंत्र
- बीज मंत्र:
“ॐ शं शनैश्चराय नमः” - नवार्ण मंत्र:
“नीलांजन समाभासं, रवि पुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड सम्भूतं, तं नमामि शनैश्चरम्॥” - कष्ट निवारण मंत्र:
“ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।”
मंत्र जाप की संख्या: कम से कम 108 बार

शनि देव की आरती
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी। जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी॥
श्याम अंक वक्र‑दृष्टि चतुर्भुजा धारी।
नीलांबर धार नाथ गज की आसवारी। जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी॥
क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी। जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त है सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी। जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरित नर‑नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण है तुम्हारी। जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी॥
पूरा पाठ शनिवार को करें, विशेषकर सूर्यास्त के समय।

शनि चालीसा
👉 संपूर्ण शनि चालीसा शनिवार को पाठ करना अत्यंत शुभ फलदायक होता है।
शनि देव की आरती (सही और पारंपरिक)
दोहा
“`
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
“`
चौपाइयां
जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारी भुजा, तनु श्याम विराजै।
माथे रत्न मुकुट छबि छाजै॥
परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।
हिय माल मुक्तन मणि दमके॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥
सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।
रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥
पर्वतहू तृण होई निहारत।
तृणहू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥
बनहूँ में मृग कपट दिखाई।
मातु जानकी गई चुराई॥
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।
मचिगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गति‑मति बौराई।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।
चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महं कीन्हयों।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी।
भूंजी‑मीन कूद गई पानी॥
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।
पार्वती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।
बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो।
युद्ध महाभारत करि डारयो॥
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।
लेकर कूदि परयो पाताला॥
शेष देव‑लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी॥
तैसहि चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥
समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
दोहा
पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥
चालीसा : लगातार 40 दिन तक, विशेषकर शनिवार को जाप अत्यंत फलप्रद है।

विशेष सुझाव और सावधानियां:
- शनि देव को झूठ, धोखा, और कर्म में असत्यता बिल्कुल पसंद नहीं।
- किसी गरीब, विकलांग या बुजुर्ग को काले तिल, कपड़े, और तेल का दान करें।
- कौवे को रोटी या भोजन देना अत्यंत पुण्यकारी होता है।
- पीपल के पेड़ की जड़ में जल और दीपक अर्पण करें।
निष्कर्ष
शनि देव कर्मों के अनुसार न्याय करते हैं। यदि आपका जीवन कठिन दौर से गुजर रहा है, तो घबराएं नहीं — अपनी सोच, व्यवहार और कर्मों को सुधारें, नियमित शनि पूजा करें और निःस्वार्थ सेवा अपनाएं। शनिदेव की कृपा से जीवन की हर रुकावट हट सकती है।
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