अपनी बातों को, किये कार्यों का अगर आप आत्मचिंतन करते हैं, उनका खुद से पुनः निरक्षण करते हैं, अपना खुद का आत्मसाक्षात्कार करते हैं तो जीवन की बहुत सी कठिनाइयों से हम पार पा सकते हैं।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने इस लेख के पहले भाग में भी बताया कि कैसे जीवन को सफल बनाने के लिए आत्मचिंतन (Self Realization) जरूरी है।
आत्मनिरीक्षण कैसे करें? (भाग एक) आत्मचिंतन या आत्मनिरक्षण से जिंदगी में पड़ने वाला प्रभाव? बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज..
तो आइए इसके दूसरे भाग में स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से आज जानते हैं कुछ और महत्त्वपूर्ण बातें।
आत्मनिरीक्षण यानि आत्मचिंतन कैसे करें:- [ भाग-2]
पूर्व भाग में अष्ट विकार के विषय में बताया था और अब अष्ट सुकार के विषय में नवधा भक्ति का संछिप्त ज्ञान यहाँ संछिप्त में कह रहा हूँ,
नवधा भक्ति यानि नवप्रेमा भक्ति का सच्चा भावार्थ के विषय में अपने आत्मसाक्षात्कार उपरांत स्वयं रचित पद्य और गद्य में ये लेख द्धारा भक्तों को बता रहे हैं
मैने ये सब विस्तार से सत्यास्मि ग्रन्थ के सत्संग भाग में कहा है की- ईश्वर यानि परमात्मा के दो प्रत्यक्ष भाग है-1- पुरुष और-2-स्त्री इन्ही का नो भेद ही नवरात्रि है जिसके चार भाव भाग है-1-अर्थ-2-काम-3-धर्म-4-मोक्ष और इन्हीं चारों भावो को जो अपने जीवन में ज्ञान से समझ अनुभव करता है उसी के जीवन में दिव्य प्रेम के आत्मसाक्षात्कार की प्रेम पूर्णिमाँ की प्राप्ति होती है।जो इसके अलावा किसी अन्य ईश्वरीय भाव का विचार कर साधना करता है। वह मनुष्य यानि स्त्री और पुरुष सदा नो प्रकार के अंधकारों से घिरा रहकर जीवन भर प्रेम विहीन दुखों की प्राप्ति करता है। इसके बाद के काल यानि वर्षों में जो आत्मा ही परमात्मा है। उसकी व्याख्या ये है की-एक ईश्वर है और एक जीव् है। यो इस जीव को उस ईश्वर की नो दिनों की नवधा भक्ति करनी चाहिए,यो करके इस संसार में जो जितने श्री राम और श्री कृष्ण आदि अवतार आये है। जिन्होंने किसी भी अप्रत्यक्ष अज्ञात ईश्वर की आराधना करने का कोई उपदेश नहीं दिया। बल्कि उन्होंने अपने जीवन में सभी कुछ प्रत्यक्ष कर्म करते हुए प्रत्यक्ष मनुष्य-स्त्री और पुरुष से प्रेम करने का ही संदेश दिया और वो करके दिखाया है।उनका वो महाभाव कथित प्रेमीजनों ने मिटाकर उनके उपदेशों के विपरीत इस प्रत्यक्ष स्त्री और पुरुष में सच्चे प्रेम के नवधा भक्ति उपदेशों को बदल दिया। जिसका आज वर्तमान मनुष्य प्रेमहीन वासनायुक्त अज्ञान अवस्था में रहकर दुःख पीड़ा पा रहा है।जबकि सच्चा अर्थ है। जो संछिप्त में नीचे दिया है:-उसका मंथन करें। और परस्पर सच्चा प्रेम और प्रेम की भक्ति ओर प्रेम की शक्ति को प्राप्त करें:-
यही प्रत्यक्ष दिव्य प्रेम के नवधा भक्ति, जिन्हें नवरात्रि के नवशक्ति दिवस भी कहते है। उस में कैसे नव दिवस की अमावस से नो ज्ञान के सच्चे अर्थो का पूजन करते हुए प्रेम की पूर्णिमाँ का आत्मसाक्षात्कार करें, आओ जाने:-
श्रवणं कीर्तनं प्रेमो: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम्।।
यो प्रेम सत्संग कहता है की:-
प्रेम का दीप जलाये
प्रेम की धुप सुगंध।
प्रेम का अर्चन वंदन कर
प्रेम पाइए दिव्य अबंध।
प्रेम ही भक्ति नर नार है
प्रेम ही शक्ति नर नार।
प्रेम बिन जीवन नवरात्रि
प्रेम ही पुर्णिमा नवधा सार।।
अर्थ कहे प्रेम आधार को
नार को नर,नर को नार।
काम का अष्ट शोधन कर्म है
यही धर्म ज्ञान मोक्ष चार सार।।
अर्थात:-नवधा भक्ति:-
मैं बना दो अर्द्ध मैं
और तब एक मैं बन पूर्ण।
इतने मैं हूँ तू रहे
मिले प्रेम नहीं सम्पूर्ण।।
1-श्रवण:-
मैं त्याग मैं मौन हो
तू बोल मैं सुन।
यही दोनों और घटे
यही श्रवण प्रेम का गुन।।
-1-श्रवण का भावार्थ:-दोनों पति पत्नि या जिससे भी प्रेम करते हो उस प्रेमी और प्रेमिका की सभी जीवन कथा और व्यथा में छिपे तथ्यों को अतृप्त और पिपासा भाव से, अपना अहं यानि मैं हटा कर सुनना।ऐसा निरंतर करते रहने से आपस में सच्चा राग,अनुराग बढ़ता है। यही राग अनुराग की बढ़ती वृत्ति ही श्रवण भाव का उच्चतम गुण है।
2-कीर्तन:-
तू ही मैं तेरी सदा जय
तुझ बिन नहीं विचार।
आनन्द उत्साह एक लक्ष्य तू
यहीं प्रेम कीर्तन नर नार।।
2-कीर्तन का भावार्थ:-दोनों को ही अपने प्रेमी और प्रेमिका के अतिरिक्त अन्य किसी भी परजन के चरित्र के विषय में विचार नहीं करते हुए, केवल उसके ही नाम को आनन्द और उत्साह से मन वचन से लेना ही कीर्तन कहलाता है।
3-स्मरण:-
पंच इंद्रिय के पीछे जो
वही मन तू करे सद वरण।
भूले भान निज देह भिन्न
यही अद्धभुत प्रेम स्मरण।।
3-स्मरण का भावार्थ:-दोनों को परस्पर भी यानि जिससे प्रेम है। उस में छिपे उस प्रेम अंकुर को उकेरना और उसे सम्पूर्णता तक लाने के लिए अपनी प्रत्येक प्रयत्न में जो कमी है। उसे स्मरण करना और उसे सुधारना ही सच्चा प्रेम स्मरण कहलाता है।
4- पाद सेवा:-
अहं को डाले प्रेमी चरण
और सेवक बन रहे शेष।
मिटे प्राप्ति की वासना
प्रेम मिले पाद सेवा गुण विशेष।।
4-पाद सेवा का भावार्थ:-दोनों को ही सदा अपने अहंकार को मिटाना की- ये यानि मैं- तो मेरे प्रेमिक के चरणों में ही स्थित रहना उत्तम लगता है। इसका यानि मैं या स्वयं का यहां कोई अर्थ नही है। और निरंतर यही प्रेम प्रयत्न करना ही पाद सेवा कहलाती है।
5-अर्चन:-
मन वचन कर्म सब एक रख
एक प्रेमिक ही सर्वत्र।
उसी के आश्रय सभी सुख
यही अर्चन प्रेम पवित्र।।
5-अर्चन का भावार्थ:-दोनों को ही अपने मन और वचन और कर्म से सदा अपने प्रेमिक जन के हित को प्रेम प्रयत्न करना ही अर्चन कहलाता है।
6-वन्दन:-
अधिकार भाव जब मिटे
और मिटे प्राप्ति निज भय।
मैं का नमन क्रंदन बिन इच्छा हो
तब प्रेम वन्दन पाये निर्भय।।
6-वन्दन का भावार्थ:-दोनों को ही अपने प्रेम के प्रेमिक स्वरूप को ही अपने ह्रदय में स्थापित करना और उसी का निरंतर ध्यान करना ही वन्दन कहलाता है।
7-दास्य:-
तू स्वामी मैं सेवक तेरा
जैसी इच्छा हो सो तेरी।
लेश मात्र प्राप्ति भाव नहीं
दास्य सुख प्रेम पाये बिन देरी।।
7-दास्य का भावार्थ:-दोनों को ही, मैं का भाव समाप्त करना और केवल प्रेम के भाव को ही प्राथमिकता और अंतिम मानने के भाव का सर्वोच्च विकास करने का नाम ही दास्य भाव कहलाता है।
8-सख्य:-
मेरा हित अहित तेरे हाथ
तू मेरा सखा अभिन्न।
दोनों और यहीं मित्र भाव हो
सख्य पाये प्रेम चरम दिन।।
8-सख्य का भावार्थ:-दोनों को ही यानि अपने प्रेमी और प्रेमिका को ही अपना सच्चा और परम् मित्र अनुभव करना और उस मित्रता के भाव को सदा धारण किये रहना ही सख्य भाव कहलाता है।
9-आत्मनिवेदन:-
मैं मिटा और तू शेष
दोनों और मिटे मैं अहं।
दो आत्मा प्रकट एक हो
आत्मसाक्षात्कार प्रेम तब रहं।।
9-आत्मनिवेदन का भावार्थ:- जब ऊपर के सभी भावों के पालन से दोनों प्रेमी का सम्पूर्ण मैं यानि अहंकार की समाप्ति हो जाती है।तब उसमें अपनी कोई भिन्न स्वतंत्र सत्ता की कोई अनुभूति नहीं रहती है। तब वो जिससे प्रेम करता है। उसी को अपने में अनुभूत करता है। ऐसा दोनों ही और होता है।तब केवल दोनों के बाहरी और अंतर शरीरों में केवल प्रेम का ही वास होता है। सभी अष्ट वासनाएं मिट जाती है। तब अहंकार नष्ट होकर शुद्धाशुद्ध प्रेम ही शेष रहता है।उसी अवस्था का नाम आत्मनिवेदन कहलाता है।
यही है-प्रत्यक्ष दिव्य प्रेम के नवरात्रि के नवधा भक्ति का प्रेमव्रत का प्रेम दर्शन फल की अतुलनीय प्राप्ति। यानि प्रेम आत्मसाक्षात्कार कहलाता है।।
नवधा भक्ति का जीवंत पति पत्नी रूप में प्रेम आचरण करने पर कैसे उच्चतम दिव्य प्रेम की प्राप्ति की जाती है।जिसे कथित भक्ति मार्गियों ने भक्त और भगवान में बदल कर मनुष्य को जीते जी दिव्य प्रेम से विमुख बना डाला।यो इस विषय में आपको आगामी और भी भाग-3 में बताऊंगा।
इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”
अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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