
आज धर्म गुरुओं को लेकर चारों ओर एक ही शोर है और आरोपों से घिरा हुआ विशेषकर हिन्दू समाज जो हिन्दू धर्म गुरुओं की वजह से लोगों के निशाने पर आ गया है।
लोग चोर..लम्पट..औरतबाज…व्यभचारी है और एक दूसरे पर आरोप लगते फिर रहे है कि अरे..अब तुम्हारे गुरु जी का भी नम्बर आने वाला है? या ये औरते अपने सास सुसर और अपने पतियों की सेवा छोड़कर इन गुरु जी, इन बाबाओं की चरण वंदना में लगी रहती है इनसे अपने घरों में झाड़ू लगती नहीं है, लेकिन इन बाबाओं के आश्रमों में झाड़ू लगती फिरती है। अरे अपने घर बैठों अपने सास, सुसर, बच्चों और पति की सेवा करो तो ही भगवान घर बैठे मिल जायेगा ये इन चक्करों में अपनी और अपने पतियों की भी इज्जत खराब करती फिरती है। धर्म के नाम पर औरतों को ही नही बल्कि उन पुरुषों को भी बातें सुनने को मिलती हैं जो आश्रम जाते हैं जिन्होंने अपने गुरु बनाये हुए हैं।
ऐसे लोगों के लिए भी कुछ ऐसा सुनने को मिलता है कि “निक्कमे आदमी ही आश्रमों में पड़े रहते है” और इन औरतों के चक्कर में ज्यादा आते है और ये बाबा देखों लंबी लंबी जुल्फें टाइप बाल चमकदार लिये पुते चहरे जैसे रोज ब्यूटीपार्लर जाते हो आखिर ये बाबा है या फ़िल्मी धार्मिक अभिनेता जो स्टाइल में रोने के सीन में रोने का भावुकता का अभिनय करते है मुख्य बात यहाँ ये है की आखिर जो यथार्थ संत हैं उनसे जुड़े भक्त भी आहत होते-होते इन प्रश्नों का उत्तर देते अपने को बहुत आहत अनुभव करने लगते है और उन्हें अनावश्यक सफाई सी देनी पड़ती है कि “नहीं हमारे गुरु जी या महाराज तो तपस्वी हैं सहज और सरल है वे तपस्या पर ही बल देते है” पर इन आरोपियों का क्या? और ज्यादातर वे आरोपी हैं जिनके खुद के चरित्र संदिग्ध है जिनके जीवन में सदा कथनी और करनी में बड़ी भिन्नता है आदि आदि.. विचारणीय विषय ये है की आखिर उनकी पत्नियां या वे स्त्रियां इन बाबाओं और ज्योतिषियों तथा तांत्रिकों के चक्कर में क्यों पड़ती है? आखिर ये बाबाओ आदि से शोषित स्त्रियां जो ये सब आरोप लगाती है ये स्वयं में क्या है? इनका स्वयं का व्यक्तिगत चरित्र क्या है और इनका वहाँ जाने और रहने आदि का असली मकसद क्या है? क्या वे वहाँ तपस्या करने गयी थी तब उनका व्यक्तिगत धर्म ज्ञान और व्यक्तिगत विवेक और तर्क शक्ति कितनी है वे कैसे नहीं जाँच पायी की ये बाबा जो कह रहा है उसकी कथनी और करनी में भिन्नता है? चलो मान लिया की ये किसी बाबा के प्रपंच भरे सम्मोहन में आ भी गयी तब एक बार तो ठीक है फिर बार बार इनका वही शोषण कैसे होता रहा है ? इनके साथ बलात्कार बिना इनकी मर्जी से कैसे हो गया एक स्त्री जब इच्छा नही करें तो कोई भी पुरुष उसके साथ सम्भोग नही कर सकता है जरा सा पहलू बदलते रहने पर वो पुरुष उससे रिश्ता बना ही नही पा सकता है आदि-आदि और तब एक बार के बाद कब तक होता रहा उसके पीछे क्या मनसा थी? अरे तुम तपस्या के लिए आई हो धर्म के ज्ञान के लिए आयी हो? या वैभव भरे जीवन को जीने को? ऐसे अनगिनत प्रश्न उठते है समाज में जो स्वयं स्त्रियां और पुरुष भी नहीं कह पाते है क्योकि जब ये सब कांड होता है तब केवल एक ही शोर मचा रहता है की सब बाबा, संत कामुक है कलंकित हैं। सारे अख़बार न्यूज चैनल इन्हीं पे चर्चा करते दिखते हैं कोई इन तथ्यों पर चर्चा नहीं करता।
इन न्यूज वालो को फुर्सत ही नही होती है कि वो समाज को हर सच्चाई से पहले ही अवगत करा दें। इससे कितने सच्चे धार्मिक लोगों और श्रद्धालुओं को इनसे फैले अधार्मिक लोगो के भयानक आरोपों का सामना करना पड़ता है आज यह जानने की आवश्यकता भी है कि आखिर संत की परिभाषा क्या है? उसका समाज में नाप का पैमाना क्या है और क्या होना चाहिए?
वैसे इसकी परिभाषा बेहद ही सरल है और ऐसे बाबाओं को पहचानना भी। सन्त, धर्म गुरु सभी प्रकार के सांसारिक जीवन से दूरी बनाकर रहते हैं, उनके जीवन में बड़ी-बड़ी महंगी कारों में चलना, बड़े बड़े दावे करना, वेभवशील आलीशान आश्रमों के निर्माण और अनेक पुलिस गार्डों से घिरा बेलेटप्रूफ शीशों में बैठकर प्रवचन करना आदि-आदि से भरा जीवन जीनव वाले संत दिखे उस पर सरकार तुरंत निगरानी करनी प्रारम्भ करें क्योंकि संतों को इस प्रकार के वैभव की जरूरत ही नहीं होती है। अगर इसे संत या धर्म गुरुओं से भेंट हो तो उनसे पूछताछ करें? स्वयं सरकार और राष्टीय संत परिषद को इस विषय मे संज्ञान लेना चाहिए अथवा ऐसा कोई भी बड़ा संगठन इन सब पर नियंत्रण य्य निगरानी जैसा कुछ करें जिससे ये स्थिति ही नहीं बनें।
हो सकता है इस लेख में बहुत सी बातों का सही से प्रस्तुतिकरण नहीं हो पाया हो पर सार तो सबकी समझ में आ गया होगा इसी आशा के साथ सत्यास्मि मिशन आप सभी से इस पर अवश्य सारे समाज विशेषकर हिन्दू समाज और उससे जुड़े संगठनो से अनुरोध है वे अवश्य इस पर अपने विचार करें।।
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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जी बिल्कुल सही कहा है गुरु जी आपने,,,,”संत या गुरु वो नहीं होता जो बुलेटप्रूफ़ गाड़ी में घूमे और फिल्में बनायें, जिसके पास हथियारों का ज़ख़ीरा हो शिष्य के नाम पर गुण्डे पाल रखें हो, शिष्य को गलत रास्ते पर चलना सिखाता हो, अपने शिष्यों के साथ एसी गंदी हरकतें करता हो, अपने धर्म और अपने देश को इस तरीके से बदनाम करे ये संत कैसे हो सकता है ये तो संत के नाम पर एक कलंक है —“”संत तो वो होता है जो एकदम साधारण जीवन जीता हो, अपने शिष्य को सही रास्ते पर चलना सिखाये, और एक संत तो हमेशा यही सिखाता है कि हम दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करे कभी कोई गलत काम ना करे और ऐसा कोई भी काम न करे जिससे कि कोई हमारे चरित्र, हमारे धर्म पर और हमारे देश पर ऊंगली उठाये,,एेसा होता है एक सच्चा संत.. **सरकार को एक ऐसा कानून बनाना चाहिए जिससे की कोई भी ऐसी गलत हरकतें करने का प्रयास ना करे,संत व गुरु के नाम को बदनाम न करे तथा अपने धर्म और अपने देश को इस तरीके से बदनाम ना कर सके…