यहाँ विषय है की एक आध्यात्मिक स्त्री शक्ति के सम्पूर्णत्त्व का की-क्या स्त्री शक्ति किसी पुरुष शिष्य को अपनी आध्यात्मिक शक्तिपात के बल से सम्पूर्ण आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति करा सकती है?
या उस शिष्य को अन्य पुरुष सिद्ध गुरुओं का भी सहारा लेना पड़ेगा? जैसे की आज के इस स्त्री गुरु हजरत बाबा जान और उनके शिष्य मैहर बाबा के बीच यहां इस घटना से उदाहरण वश बताया जा रहा है। 25 फ़रवरी 1894 को जन्मे मैहर बाबा एक सम्पन्न पारसी परिवार से थे वे जब थोड़े बड़े हुए लगभग 19 साल के मई 1913 में तब एक दिन वे अपनी साईकिल से कही जा रहे थे। तो उसी रास्ते में एक नीम के पेड़ के पास अनेक भक्त गणों से घिरी एक वृद्ध महिला को देखा और फिर उन्हें अपनी और आते देख वे साईकिल से सम्मान को उत्तर गए। महिला पास आई और इन्हें अपने आलिंगन में लेकर इनके माथे पर चूमा। और इसी चूमने से बच्चे में एक अद्धभुत परिवर्तन का आरम्भ हुआ। और फिर से 1914 जनवरी को एक बार फिर स्पर्श किया। तो वे तीन दिन अचेत रहे। इसके बाद वे एक विचित्र मूर्च्छा तन्द्रा में रहने लगे। इस तन्द्रा से बाहर लाने के लिए परिजनों ने अनेक उपाय करे, पर लाभ नही हुआ। तब उसी काल में वे अपने बच्चे को 1915 में शिरडी में साई बाबा के पास लाये। प्रातः साई शौच को जा रहे थे। उन्होंने बच्चे को अपनी और आते देख उसकी आध्यात्मिक स्थिति को देख कर कहा- या परवरदिगार और एक मट्टी का ढेला उठा कर बच्चे को फेंककर मारा। जो बच्चे के वही माथे में लगा, जहाँ उस स्त्री सन्त ने चूमा था। और बच्चा तुरन्त उस तन्द्रा से बाहर आने लगा और साई को प्रणाम किया। तब साई ने उस बच्चे व् परिवार वालो को अपने एक शिष्य संत उपासनी बाबा के पास भेजा और वो बच्चा इस प्रकार उपासनी बाबा व् साई और हजरत ताजुद्दीन व् नारायण बाबा पांच सन्तों की आध्यात्मिक संगत से तप जप ध्यान करता सिद्धि अवस्था को पहुँचा। और उसने एक स्वतन्त्र गुरु परम्परा चलाई। और अनगिनत शिष्यों को प्रेम उपदेश दे कर कल्याण किया। प्रश्न ये है की- क्या मैहर बाबा के जीवन में अलग अलग गुरुओं के द्धारा आत्मिक उन्नति होनी लिखी थी? क्या एक ही स्त्री गुरु के द्धारा उन्हें जो शक्तिपात हुआ उससे उन्होंने ही क्यों नही बाहर निकाला? एक पुरुष शिष्य को पुरुष गुरु ने ही मात्र बिना शक्तिपात किये एक मट्टी का ढिला वो भी दूर से मार कर उस अनियंत्रित योग निंद्रा से बाहर निकाल दिया, यो उन स्त्री संत से ये साई ज्यादा सिद्ध थे? या वे केवल आत्मशक्ति का उत्थान की कर सकती थी? उसे सम्पूर्ण नियंत्रण नही कर सकती थी? यो वे साधक स्थिति को ही प्राप्त थी ना की सिद्ध थी? जबकि हजरत बाबाजान के विषय में ये प्रसिद्ध था की उन्हें कभी स्नान करते नही देखा। और तब भी उनसे सदा सुगंध आती थी और वे भिक्षा मांगती और एक खुले में नीम वृक्ष के नीचे ही दिन रात गुजारती थी। ये अफगानिस्तान के बुलीचिस्तान के रहने वाली थी और अंत में 25 साल यही पुणे में नीम के पेड़ के नीचे रही और 21 सितम्बर सन् 31पुणे में मोक्ष को प्राप्त हुयी। और ये मुस्लिम धर्म सूफियाना सिद्धांत के अंतर्गत गुरु शिष्य परम्परा की सन्त थी। ऐसी स्थिति के उपरांत इस उदाहरण से क्या समझा जाये? ठीक यही आपको रामकृष्ण परमहंस के जीवन में भी देखने मिलता है। की भैरवी ब्राह्मणी ने भी अपने इस पुरुष शिष्य को केवल चोसठ कलाओं में सिद्धि प्रदान में गुरुपद निभाया। जिसका अंत सविकल्प समाधि तक ही था। और उससे ऊपर के लिए उन्होंने पुरुष गुरु तोतापुरी का ही गुरु आसरा लिया। ठीक यही यहाँ उदाहरण में भी दीखता है की- क्या इस युग में स्त्री की आत्मिक आध्यात्मिक सिद्धि केवल इतनी ही है, की वो आत्मशक्ति को उठा तो सकती है, परन्तु उसे इस आधात्मिक की सर्वोच्चता तक नही पहुँचा सकती है। ये पुरुष युग का प्रभाव है या स्त्री की आत्मशक्ति केवल पंचततत्वी प्रकर्ति तक ही पहुँच है? इससे ऊपर केवल पुरुष ही पहुँच और पहुँचा सकता है?
यही विषय सत्यास्मि मिशन ने इस विश्व धर्म में पहली बार विश्व के सामने उजागर किया।की पुरुष की कुण्डलिनी और स्त्री की कुण्डलिनी दोनों बिलकुल ही भिन्न है। जब दोनों के अंदर से बाहर तक बीज सहित शरीर भिन्न है। यो अंदर तक भिन्नता है,तो उनकी ऊर्जा और उसका उत्थान और चक्र आदि सब भिन्न अवश्य है।साथ ही जो रूढ़िवादी लोग है,वे ये कहते है की-आत्मा तो एक है शरीर भिन्न है। ये भ्रम है। तो ये प्रश्न उठता है, की जब आत्मा एक है तो दो अलग अलग स्त्री और पुरुष के शरीर कैसे हुए? वो भी एक आत्मा की तरहां एक शरीर ही होने चाहिए थे? जैसा की ऐसा बिलकुल नही है, दोनों बिलकुल अलग है, तब क्या है? ऐसी अनेक स्त्री संत हुयी है,जैसे मुक्ताबाई, जो पुरुष देव राम, कृष्ण,विठ्ठल,पंढरपुर और अपने सिद्ध पुरुष गुरु ज्ञानेश्वर भाइयों से दीक्षा पा कर भक्ति के उच्चतम मार्ग पर बढ़ी तो थी, परन्तु स्वतन्त्र गुरु पद और विशेषकर उनकी शिष्य परम्परा में कोई सिद्ध शिष्य नही हुया। इसे पढ़ कर लोग उदाहरण देंगे, पर उन्हें सोचना होगा की- ऊपर के प्रमाणित उदाहरणों में क्या कहा गया है। इसी स्त्री की कुंडलिनी पुरुष की कुण्डलिनी से बिलकुल भिन्न है। ये ही जानने को सत्यास्मि की दीक्षित ध्यानी एक महिला भक्त मोनिका ने, अपना योग प्राणायाम करते हुए अपना ध्यान मूलाधार चक्र में लगाया तो उसे स्फुरण के साथ दो चक्र दिखाई दिए नीचे वाले में रं बीज मंत्र जो अष्ट रंगीन कोणों से बना था तथा उससे एक रेखा ऊपर को जाती दूसरे चक्र से जुडी थी जिसमें हं बीज मंत्र अनेक कोणीय दलों से घिरा बना था। और अगले दिन भी उसे ध्यान में वही दिखा जो चैतन्य भी हो रहा था। जबकि पुरुष और उपलब्ध कुण्डलिनी चित्रों में लं मूलाधार में है और हं कण्ठ चक्र में दिखाया है। ऐसी भिन्नता क्यों दिखी? ये प्रश्न बड़ा गहरा खोज भरा है? लेकिन इस प्रश्न का उत्तर ये है की- हमारे ध्यान में हमे तीन आकाशों के दर्शन होते है। पहला मनो आकाश जो पैरो से मूलाधार चक्र और ह्रदय चक्र के बाहरी क्षेत्र तक उसकी सीमा होती है। इसके बाद आता है चित्त आकाश जो ह्रदय चक्र से कण्ठ चक्र तक और आज्ञा चक्र तक की सीमा तक क्षेत्र होता है। और तीसरा केवल कण्ठ से आज्ञाचक्र तक होता है। इसके उपरांत सहस्त्रार चक्र में कोई आकाश नही होता है। वहाँ इन सब आकाशों की निर्मित कर्ता आत्मा स्वयंभू चैतन्य और प्रकाशित व् साक्षी होती है। यो मूलाधार चक्र में तम गुण प्रकर्ति के दर्शन होते है। और जो ये बीज अक्षर व् चक्र है। इनका आभास और दर्शन हमें स्पष्ट होता है। यहाँ अंतर्जगत में जो है वो प्रतिबिम्बित होता है।और प्रत्येक चक्र एक दूसरे की क्रिया और प्रतिक्रिया है। जेसे व्यक्ति को अपना चेहरा शीशे में दीखता है, पर व्यक्ति अलग और दूर होता है, यो जो चक्र मोनिका ने देखें, वे नाभि और कण्ठ का प्रतिबिम्ब मात्र दर्शन और उनका चेतना स्वरूप था। इसमें साधक में उस समय किस चक्र में शक्तिपात हुआ है? वही चक्र और उससे ऊपर के चक्र का सम्बन्ध दीखता है। जैसे मनुष्य में जो प्राण और अपान दो मुख्य मन धाराएं है। वही धाराएं मिलकर जब गुरु या पूर्व जन्म के तपोबल से सुषम्ना में प्रवेश करती है। तब साधक को भस्त्रिका होना, मन का अंतर्मुखी होना, ध्यान लगने का कुछ काल तक प्रभाव होता है, और टूटता रहता है। और किसी को अनन्त प्रकर्ति के दर्शन व् किसी को पूर्वजन्म तो किसी को पूर्वजन्म की गयी मंत्र जप साधना के देव देवी दर्शन आदि, जो मंत्र का भावार्थ मात्र दर्शन होती है। जिसको रखकर साधक ने मन एकाग्र किया होगा। उनका स्पष्ट दर्शन वाणी सुनाई आती है। ये सब अस्थायी है।ये सब अभ्यास बंद और उसके साथ ही सब ये दर्शन समाप्त। और जब साधक की चेतना शक्ति उसके ह्रदय आकाश में प्रवेश करती है,तब ऐसा होने पर उसे भाव समाधि यानि भक्ति का गहरा अनुभव आदि क्रियाएँ होती है। यो मूल विषय पर आते है की- ये उस समय ध्यानाभ्यास में जो स्वर चलता है। जेसे सूर्य तो रं बीज व् नाभि चक्र के दर्शन होते है। और जहाँ जिस चक्र में प्रवेश या दर्शन होते है। उस चक्र का प्रतिक्रिया चक्र का भी दर्शन होता है। क्योकि मेने पूर्व कहा की दो प्राण अपान का संघर्ष ही क्रिया प्रतिक्रिया करता ऊपर को चलता है। यही उसकी क्रिया प्रतिक्रिया की वक्री टेडी एक दूसरे को काटती हुयी सर्पाकार चाल ही कुण्डलिनी कहलाती है। ये बाहर से अंदर और ऊपर तक दो ही का संघर्ष मिलन विछोह चलता है। जहाँ वे मिलते है,जहाँ आकर्षित होते है। वहाँ चक्र का एक क्षेत्र बनता जाता है। जो कुण्डलिनी चक्र कहलाते है। ये स्त्री पुरुष ही है,जिन्हें चन्द्र सूर्य आदि नामों से कहा गया है।तो यहाँ देखा दर्शन मनोदर्शन भी कहा जा सकता है। जो हमने अपनी स्म्रति में पढ़कर बना रखा है की चक्र ऐसे होते है। यो उसके दर्शन होते है।इस विषय में सत्यास्मि मिशन की स्त्री की कुण्डलिनी जागरण विषय को पढ़े।इस विषय के और भी गम्भीर रहस्यों को आगे बताया जायेगा।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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