कर्नाटक में कांग्रेस सरकार एक बार फिर बड़े राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ी है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सियासी संघर्ष खुलकर सामने आ चुका है। ढाई साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद अब डीके शिवकुमार के समर्थक उन्हें तुरंत मुख्यमंत्री बनाने पर अड़ गए हैं। दिल्ली में शक्ति-प्रदर्शन से लेकर विधायकों के सामूहिक पहुंचने तक, हर कदम संकेत दे रहा है कि कर्नाटक कांग्रेस में बगावत अपने चरम पर है।
कांग्रेस में खत्म न होने वाली खींचतान – और BJP से तुलना
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यही है कि उसके नेताओं की आपसी खींचतान सत्ता को ही खा जाती है। हर राज्य में यही संघर्ष दोहराया जाता है। कांग्रेस में नेताओं की लड़ाई पार्टी से भी बड़ी हो जाती है।
इसके उलट, BJP में चाहे कितनी भी नाराज़गी हो—वह हाईकमान के सामने बैठकर हल कर ली जाती है। BJP में पार्टी शीर्ष है, नेता बाद में; जबकि कांग्रेस में नेता पहले और पार्टी बाद में दिखती है। कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब आदि इस राजनीति का ताज़ा उदाहरण बन चुका है।
दिल्ली में धमाका: शिवकुमार समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन
सियासी हलचल उस समय तेज हुई जब सिद्धारमैया ने अपना ढाई साल का कार्यकाल पूरा किया। इसी के साथ पूरे कर्नाटक में एक ही सवाल गूंज उठा—क्या अब सत्ता परिवर्तन का समय आ गया है?
गुरुवार को शिवकुमार खेमे से जुड़े मंत्री और विधायक अचानक दिल्ली पहुंच गए। इनमें प्रमुख हैं:
- मंत्री एन. चलुवरायसामी
- विधायक इकबाल हुसैन
- एच.सी. बालकृष्ण
- एस.आर. श्रीनिवास
सूत्रों के अनुसार शुक्रवार को 10–12 और विधायक दिल्ली पहुंच सकते हैं। उनका एक-सुर में दावा है कि डीके शिवकुमार को तुरंत मुख्यमंत्री बनाया जाए।
यह साधारण यात्रा नहीं, बल्कि कांग्रेस हाईकमान पर सीधा दबाव बनाने की रणनीति मानी जा रही है।
क्या रोटेशनल CM फॉर्मूला सच था?
2023 विधानसभा चुनाव के बाद सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच सीएम पद को लेकर जोरदार खींचतान हुई थी। तब पार्टी ने संतुलन साधते हुए सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया था।
उसी समय यह चर्चा चली थी कि ढाई साल बाद दोनों नेताओं के बीच “जेंटलमैन एग्रीमेंट” हुआ है, जिसके तहत अब सीएम की कुर्सी बदलनी है।
कांग्रेस ने इसे कभी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया, लेकिन शिवकुमार समर्थक शुरू से इस फॉर्मूले की पुष्टि करते रहे हैं। अब दिल्ली पहुंचकर वही मांग दोबारा जोर पकड़ रही है।
सत्ताधारी कांग्रेस सरकार पर संकट क्यों?
कांग्रेस के पास बहुमत तो है, लेकिन अंदरूनी टूट सरकार को अस्थिर कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है:
- सरकार पर “लीडरशिप चेंज” का दबाव बढ़ चुका है
- हाईकमान यदि तुरंत समाधान नहीं निकालता तो सरकार पर वास्तविक संकट खड़ा हो सकता है
- शिवकुमार समर्थकों का यह पावर शो नुकसानदेह साबित हो सकता है
- सिद्धारमैया खेमे में भी बेचैनी बढ़ रही है
कांग्रेस की यही अंदरूनी कलह BJP बार-बार चुनावी सभाओं में मुद्दा बनाती रही है—और अब फिर वही हालात बनते दिख रहे हैं।
दिल्ली में हाई-लेवल बैठकें, आने वाला समय बेहद अहम
दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के साथ होने वाली मुलाकातें तय करेंगी कि:
- क्या कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन होगा?
- क्या कांग्रेस सरकार अपनी ही अंदरूनी लड़ाई में गिर सकती है?
- क्या शिवकुमार किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं?
राजनीतिक पंडित साफ कह रहे हैं—कर्नाटक में बड़ा राजनीतिक भूकंप आने वाला है, और इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दे रही है।
निष्कर्ष: कर्नाटक में कांग्रेस की लड़ाई सत्ता की दिशा बदल सकती है
यह सिर्फ एक राज्य की लड़ाई नहीं है, बल्कि कांग्रेस की पुरानी बीमारी—नेतृत्व संकट और गुटबाजी—का एक और अध्याय है।
उधर BJP लगातार कांग्रेस की इस टूट का फायदा उठाने की रणनीति में लग चुकी है।
कर्नाटक की राजनीति में अगले कुछ दिन बेहद निर्णायक होंगे।
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