
- कोरोना से भी घातक बीमारी फैलाते हैं स्ट्रीट फूड वेंडर, इनके लिए नहीं हैं कोई मानक
- क्या आपको गोलगप्पे बेहद ज्यादा पसंद हैं?
चटपटी पापड़ी चाट का नाम सुनकर मुंह में पानी आ गया? - बिरयानी वाह क्या कहने?
- क्या कहा आपने? आपको चटपटे नूडल्स बहुत पसंद हैं?
- यदि समोसे मिल जाएं तो दिन बन जाता है।
- सुबह के नाश्ते में जलेबी आलू पूरी का नाम आते ही बस खाने का ख्याल आ जाता है?
- रोस्टेड चिकिन वो भी मख्खन मारके वाह मजा आ गया।
- कबाब की वो शानदार खुशबू से मुंह में पानी आ जाता है।
- चटाखेदार जायकेदार खाने के क्या कहने।
अरे जरा रुकिए, अपने आपको थोड़ा काबू में रखिए… हम जानते हैं ये सब नाम सुनकर आपका खाने का मन कर रहा होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इनको बेचने वाले आपको कितनी ईमानदारी के साथ खिलाते हैं? बहुत सा ऐसा खाने का सामान है जो पहले से तैयार मिलता है। जैसे गोलगप्पे, बिरयानी, समोसे या जो बजी चटपटा स्वाद हो। ये अधिकतर खाने भारत में सबसे ज्यादा अनहाइजेनिक तरीके से बनाये जाते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ गोलगप्पे ही गंदगी से बनाये जाते हैं। ऐसी बहुत सी खाने पीने की चीजें हैं जिनसे आपके स्वास्थ्य के साथ न केवल खिलवाड़ किया जाता है बल्कि आपको एक धीमी मौत के रास्ते की तरफ मोड़ दिया जाता है।
भारत में इन सबको चेक करने के लिए फ़ूड सेफ्टी विभाग भी है लेकिन उसकी कार्यक्षमता पर सवाल उठाना ही बेमानी है। भारत में स्ट्रीट वेंडर स्वाद और साथ में सस्ता खाना तो परोसते ही हैं लेकिन स्वाद और सस्ते के चक्कर में लोग अपने शरीर को अनगिनत बीमारियों से भर लेते हैं।
खाना तैयार करने के लिए जो तेल इस्तेमाल होता है वो सबसे घटिया और गंदी क्वालिटी का होता है। मसाले सस्ते या बेहद पुराने होते हैं, खाना बनाने या पीने के लिए गंदे पानी का इस्तेमाल होता है।
हाथों की गंदगी आपकी पाचन क्रिया की बैंड बजा देती है।
स्ट्रीट फूड वेंडर्स का खाने पीने का सामान खुला में रहता है, जिस पर मक्खियां तो भिनभिनाती ही हैं, साथ ही रोड की धूल मिट्टी और गंदगी भी इस खाद्य सामिग्री पर जमा हो जाती है। इस तरह के खाने से बचने की जरूरत है।
सबसे बड़ी बात कि इस तरह के खाद्य पदार्थ पेट में ढेरों बीमारियों को साथ में लेकर जाते हैं। इसके बावजूद भी विभाग ‘सेहत से खिलवाड़’ करने वालों के खिलाफ न तो कार्रवाई करता है और न ही उन्हें जागरूक करने का काम करता है। यहीं नहीं विभाग कभी कभार खानापूर्ति के नाम पर फूड सैंपलिंग कर देता है लेकिन इसके बाद कुछ नहीं होता है। फूड विभाग ने यह जानने की कभी कोशिश नहीं की कि सड़कों पर जो खाद्य पदार्थ बनाकर बेचे रहे हैं वह ग्राहकों के खाने योग्य है या नहीं। फूड विभाग के कर्मचारी जांच के नाम पर खेल कर जाते हैं। फूड विभाग के अधिकारियों की जेबें इतनी गर्म हो जाती हैं कि बासी और सड़ा हुआ खाना भी इन्हें ताजी नज़र आने लगता है।
सबसे बड़ी बात तो हम भारतीयों की है जो केवल स्वाद देखती है, सस्ता देखती है लेकिन अपने अनमोल जीवन को नहीं देखती। जब बीमारियां शरीर में घर बना लेती हैं तो मरते दम तक उस चमकीले स्वाद और सस्ते का दाम अदा करना पड़ता है।
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