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1 जनवरी 2019 मंगलवार को स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज द्वारा सत्य ॐ सिद्धाश्रम में अंखण्ड श्री महायज्ञ का आयोजन, इस महायज्ञ में भाग लेने वालों के कट जाएंगे सभी दुःख, जाने क्या है इस यज्ञ की महिमा

नयी साल के पहले दिन यानि 1 जनवरी 2019 दिन मंगलवार को सत्य ॐ सिद्धाश्रम में 19वें अंखण्ड श्रीमहायज्ञ का आयोजन होना है। हर साल पहली जनवरी को होने वाले इस महायज्ञ का आयोजन श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज करते हैं और इस महायज्ञ की महिमा बहुत बड़ी है। भारत के हर हिस्से से लोग इस महायज्ञ में हिस्सा लेने आते हैं। और नारियल की आहुति देकर जाते हैं। इस श्री महायज्ञ में हिस्सा लेने वाले भक्तों के दुःख दूर हो जाते हैं।

बुलंदशहर में कचहरी रोड़ पर स्थित सत्य ॐ सिद्धाश्रम है जिसे स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने स्थापित किया है। यही बगल में एक शानि भगवान का मंदिर भी है। स्वामी जी के इस आश्रम की महिमा बहुत बड़ी है। स्वामी जी के पास बड़ी संख्या में भक्त अपनी परेशानियों को लेकर आते हैं। खासतौर पर स्वामी जी के आश्रम में शनिवार और रविवार को 2 बजे से 6 बजे तक भक्तों का तांता लगता है। जो भी भक्त स्वामी जी के आश्रम में अपनी समस्या लेकर जाता है उनकी सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं।

इसी से संबंधित स्वामी जी हर साल नई साल के पहले दिन यानि 1 जनवरी को महायज्ञ का आयोजन करवाते हैं। भक्तों के जीवन की शान्ति के लिए और उनके दुखों को दूर करने के लिए यज्ञ का आयोजन होता है।

1 जनवरी को गॉड ब्लेसिंग डे यानि ईश्वरीय आशीर्वाद दिवस के रूप में भी जाना जाता है।

नववर्ष-1-1-2019 मंगलवार को सत्य ॐ सिद्धाश्रम पर होने वाले 19 वें अखंड श्रीमहायज्ञ महिमा कथा:- इस श्रीमहायज्ञ की महिमा कथा की महत्ता और सभी कल्याणकारी शुभ लाभों के विषय में स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी बता रहें है।

प्राचीन चतुर्थ पुरुषवादी युगों की यज्ञप्रणाली और उसके इष्ट मंत्र तंत्र और यंत्र विधियों में आयी विभिन्नताओं के साथ उन यज्ञों की शक्तियों और उनसे मिलने वाले प्रत्यक्ष वरदानों के अभावों पर देवी यज्ञई और देवी मनीषा तथा सिद्धा देवी में बड़ा ही चिंतनीय धर्मवार्ता चल रही थी, की-पहले युगों में यज्ञों के माध्यम से सभी दैविक और भौतिक कार्य सफलता पूर्वक सिद्ध होते थे और धीरे धीरे ये चमत्कार समाप्ति की और बढ़ते जा रहे है। इसका कारण है की- यज्ञ प्रणाली के रहस्य को जानने वाले यज्ञकर्ता देवभाषा संस्कृत के जानकर तो है, परन्तु उसमे छिपी शक्तियों को अपने अधिकार में करने की क्षमता नही है।ये तपस्यार्थी नही है मात्र सामान्य साधक है। और साथ ही उन मंत्रों में अनगिनत दोष भी समयानुसार बढ़ते गए है। मंत्र वर्ण अक्षरों में त्रुटियाँ बढ़ती और मनचाहे परिवर्तन आदि के साथ उस चतुर्थ युगों का स्माप्तिकरण भी है। जिससे आज प्राचीन यज्ञप्रणाली भी निष्प्रभावी सिद्ध हुयी है। और इस स्त्री युगों में जिसमें सिद्धयुग का प्रारम्भिक प्रथम चरण चल रहा है। उसमे किस प्रकार के यज्ञानुष्ठानों और उनकी नवीन व् सम्पूर्ण प्रभावी यज्ञविधि को प्रकट और प्रचलित किया जाये। यही विषय अति विस्तृत होकर अतिविचारनीय हो चला था। तभी भगवती सत्यई पूर्णिमाँ का वहाँ आगमन हुआ और उन्हें सभी ने प्रणाम करते हुए उनके पूछने पर ये विषय को उनके सामने समाधान हेतु रखा। तब भगवती सत्यई पूर्णिमा बोली की जब युग परिवर्तन होता है। तब सभी उन कालों की ज्ञान ध्यान विधियों का भी नवीनकाल में समाहित होना निश्चित होता है।

सभी कुछ नवीनीकरण के साथ प्रारम्भ होता है, जैसे-जो सतयुग में यज्ञ पद्धति और मंत्रसिद्धि और ऋषि थे, वे आगामी युगों में नही थे, और जो थे भी वे वही दीर्घजीवी ऋषि ही यज्ञकर्ता रहे और कलियुग में आते आते सभी ध्यान यज्ञ मंत्र विद्याओं में बड़ा परिवर्तन आता गया और मन्त्रों की वैदिक स्वरलहरी उच्चारण भिन्न और लुप्त प्रायः हो गए। और साथ ही अनेक साधक मनुष्यों ने प्राचीन मंत्रों के स्थान पर उस काल के देवों देवियों के नाम के ही मंत्र बना डाले। जो केवल व्यक्तित्त्व मंत्र कहलाते है। जो नाम गीत कहलाते है। जो जपने और सुनने में तो बहुत सच्चे अच्छे लगते है। परन्तु उनसे सिद्धि और आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति नही होती है। यो उन सबका नविनयुगों में शब्द मंत्रादि का प्रलय होना निश्चित है। यो वे विधि इस स्त्री युग में प्रचलित होने पर भी निष्प्रभावी सिद्ध होंगे। इस युग में चन्द्र शक्ति की प्रबलता रहेगी और सूर्य शक्ति का मात्र सहयोग होगा। और यहाँ चन्द शक्ति का अर्थ चन्द्रमा से नही लगाना है। ये चन्द्र शक्ति विशुद्ध स्त्री शक्ति ही है और सूर्य शक्ति पुरुष शक्ति का शब्दार्थ है। जैसे-प्राचीन पुरुषयुगों में सूर्यावतरण सूर्य वंशी पुरुष शक्ति का वर्चस्व था और चंद्रावतरण चन्द्रवँशी पुरुष शक्ति का वर्चस्व था और तब स्त्री शक्ति सहयोगी मात्र थी। ठीक यही इस वर्तमान स्त्रियुग में सूर्यावतरण और चंद्रावतरण की स्त्री शक्ति का अवतरण मानो।तब देवी सिद्धा ने जिज्ञासा से एक प्रश्न किया की हे-महादेवी क्या? जैसे-इस ब्रह्मांड में पुरुष युग चल रहे थे। तब इसके विपरीत किसी और ब्रह्मांड में स्त्री युग चल रहे थे? जैसा की क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। तभी सन्तुलन भी बनता है। तब भगवती बोली की- ये सत्य है की मूल ब्रह्माण्ड में तीन मुख्य ब्रह्मांड है। एक पुरुष तत्व से परिपूर्ण और दूसरे ब्रह्माण्ड में स्त्री तत्व का वर्चस्व और तीसरे ब्रह्मांड में बीजयुग चलता है। और इन तीनों ब्रह्मांडों के तीन तीन तीन कुल मिलाकर नो ब्रह्मांड सक्रिय है। उन्ही के ये नो प्रतीक ओर प्रतिनिधि ग्रह प्रत्येक ब्रह्मांड में सक्रिय रहते है। और यही त्रिगुण ब्रह्मांडों की क्रिया की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप परस्पर स्वभाविक रूप से परिवर्तित होते रहते है, जिसे प्रलय कहा जाता है। इसी से मूल ब्रह्म का सन्तुलन बना रहता है। यो इस वर्तमान स्त्री युग के इस ब्रह्माण्ड में प्रारम्भ होते ही दूसरे ब्रह्माण्ड में पुरुष युग का प्रारम्भ हो गया है। और बीज युग की क्रिया अभी वही है। वो एक प्रकार से सन्तुलन प्रदान करता है। तब देवी मनीषा बोली की- तभी इस स्त्री युग में सभी प्राचीन मंत्रों का नवीनीकरण और उन्हें सम्पूर्णता का अर्थ देने वाला महामंत्र कौन सा है? और वो परमसिद्ध यज्ञप्रणाली कौन सी है? जो सभी फल देने वाली हो? तब देवी बोली- वो यज्ञ “श्री यज्ञ” कहलाता है और उसके करने में केवल स्त्री शक्ति ही प्रमुख मंत्रज्ञ व् यज्ञकर्ता होंगी और पुरुष उस यज्ञ में सहयोगी होगा। तब स्त्री शक्ति की वृद्धि से पुरुष शक्ति स्वयं सम्पूर्णता का दिव्य अनुभव करेगी। यो पुरुष को किसी प्रकार की चिंता करने के आवश्यकता नही है। क्योकि स्त्री उसी के लिए ये सब करती आई और अब अपने साथ साथ पुरुष की सार्वभोमिक उन्नति को करती हुयी संसार में सन्तुलन करेगी। जो अभी पुरुष सहयोग का श्रीयज्ञ में स्त्रियों को प्राथमिक सहयोग है तब मनीषा ने पूछा की-हे देवी इसका विश्व में किस प्रकार विस्तार और लाभ मिलेगा व् नववर्ष ही क्यों जबकि सनातन धर्म और ज्योतिष गणित से चैत्र माह से वर्ष आरम्भ होता है, तो ये श्रीमहायज्ञ भी तभी प्रारम्भ होना चाहिए था? ये सुन महादेवी बोली की सम्पूर्ण विश्व में वर्तमान में जो वर्ष प्रारम्भ है, वो प्रथम जनवरी से ही समस्त कार्यों के लिए चुना गया है और प्रचलित भी है। यो अपने सनातन धर्म का भी इसी समय से प्रचार का प्रारम्भ किया है तथा चैत्र माह में प्रथम नवरात्रि और उससे आगामी पूर्णिमा जो ईश्वर ईश्वरी के प्रथम प्रेम और उससे उत्पन्न समस्त जीव जगत की प्रेम सृष्टि का महाव्रत “प्रेमपूर्णिमा” के रूप में पुरुषों द्धारा अपनी स्त्रिशक्ति की सभी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति को मनाने की पहल के साथ प्रारम्भ किया जा चूका है। और सनातन धर्म केवल भारतवर्ष में ही नही है, बल्कि वो सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित था और उसे इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व में सभी स्त्रियों व् पुरुषों के आत्म उत्थान को करना है। अतः इस नववर्ष के श्री महायज्ञ के साथ साथ श्रीभगपीठों की सम्पूर्ण देश प्रदेशों विदेशों में स्थापना के फलस्वरुप उस महान महाशक्ति का अवतरण होने जा रहा है। जिसकी सदियों से मनुष्य साधक और सिद्ध अपनी साधना सिद्धि में प्रत्यक्ष और परिकल्पना करते हुए निरन्तर भविष्यवाणियां करते आये है की- नवयुग यानि सतयुग आएगा, जो की स्त्रियुग का प्रथम युग सिद्धयुग ही है। और महाशक्ति कुंडलिनी का प्रत्यक्ष स्त्री शक्ति के रूप में सम्पूर्ण मानवजाति में अवतरण होगा और जो भोग योग विद्या से प्रकट ऋद्धि और सिद्धियां केवल देवताओं व् देवियों में देवलोकों में स्थित थी। वही सम्पूर्ण सौलह कलाएँ सिद्धियां इसी धरती पर पुनः प्रत्यक्ष और प्रकट होंगी और तभी सम्पूर्ण स्त्री शक्ति का सभी प्रकार से विश्व में भौतिक और आध्यात्मिक धर्म कर्म में श्रद्धा भक्ति की सिद्धि की प्राप्ति होगी। और जिस दिव्य प्रेम महारास की मनुष्य परिकल्पना करता जंगल जंगल तीर्थों पर भटकता रहता था, वो उसे उन व्यर्थ मृत स्थानों की जगह अपने परिवार में ही प्राप्त होने के साथ साथ आत्मसाक्षात्कार की भी प्राप्ति होगी। यही मूल अनादि सनातन जीवन्त और प्रत्यक्षवादी धर्म है। जिसकी पूर्वत सभी धर्म अवतार घोषणा करते रहे है और इसी का पुनः अवतरण सत्यास्मि धर्म का मूल उद्धेश्य है।


और वो सिद्धासिद्ध अकालसिद्ध एक मात्र दिव्य महामंत्र है-
“”सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा”” और श्रीयज्ञ है प्रतिवर्ष के प्रारम्भ में 1 जनवरी को होने वाला मनोकमनपुरक गोला आहुति यज्ञ जिसमे एक सूखे नारियल के गोले को काट कर उसमे मनुष्य भक्त अपनी एक या अधिक मनोकामनाओं की अपने हाथ से लिखी कागज की पर्ची को, जिस पर ये दिव्य महामंत्र भी ऊपर लिखा हो, उसमे दो बताशे,दो लोंग रखकर उस पर्ची को मोड़कर गोले में डाले और साथ ही उसमें छोटे छोटे जो भी मौसमी फल हो उनके टुकड़ों के साथ घी और मिठाई या बूरा भी डाले और उस गोले को कलावे से अच्छी तरहां चारों और से लपेट कर बन्द करे। अब बैठकर उसे अपने पैरों से लेकर सिर तक सात बार चलती घड़ी के विपरीत उल्टा घूमता हुआ उतारे और साथ ही अपने कष्टों व् मनोकामनाओं को मंत्र के साथ मन ही मन चिंतन करता हुआ बोले। और जब इसे कर चुके, तब आश्रम में आकर श्रीयज्ञ में यज्ञकर्ता के अनेक दिव्यमंत्रों और चालीसा के पुनश्चरणों के उपरांत स्वाहा कहने पर यज्ञ में आहुति डाले। और वहाँ का श्रीयज्ञ प्रसाद खीर को ग्रहण करे व् अपने घर प्रसाद को बाटने हेतु ले जाये। यो इस श्रीयज्ञ की महिमा शक्ति अपार है। उस श्रीयज्ञ में मैं स्वयं तुम सहित सम्पूर्ण सोलह कलाओं दिव्य शक्तियों के साथ श्रीमहाविद्या बन वरदानस्वरूप उपस्थित रहती हूँ।
ये महान कल्याणकारी महाज्ञान सुन और जानकर सभी ने महावतार महादेवी सत्यई पूर्णिमाँ की जय जयकारा करते बोली-

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा।।

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय श्रीमहायज्ञ की जय
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