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Kartik Purnima 2025: Swami Satyendra Satyasahib Ji के अनुसार, इस दिन का हर क्षण है दिव्य त्रिपुरासुर वध से लेकर मत्स्य अवतार तक का महत्व

बुलंदशहर, यूपी: सनातन धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का दिन अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है। यह तिथि न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति भावना से ओतप्रोत होती है। Swami Satyendra Satyasahib Ji के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान, दान और दीपदान का अत्यधिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन देवताओं ने स्वयं दीपावली का उत्सव मनाया था, जिसे हम आज देव दीपावली के रूप में जानते हैं।

पंचांग के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा 2025 की तिथि 4 नवंबर को रात 10 बजकर 36 मिनट पर शुरू होकर 5 नवंबर को शाम 6 बजकर 48 मिनट पर समाप्त होगी।


त्रिपुरासुर वध और देव दीपावली का रहस्य

Swami Satyendra Satyasahib Ji ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। यह विजय केवल राक्षस पर नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय थी। भगवान विष्णु ने इस अवसर पर शिव को “त्रिपुरारी” नाम दिया। इस दिन महादेव ने प्रदोष काल में अर्धनारीश्वर रूप धारण कर त्रिपुरासुर का संहार किया, जिससे समस्त देवगण आनंदित हो उठे।

Swami Satyendra Satyasahib Ji के अनुसार, उसी रात काशी में देवताओं ने दीप जलाकर महादेव की आराधना की। तभी से देव दीपावली का उत्सव आरंभ हुआ। आज भी काशी में लाखों दीपों से सजा यह पर्व दिव्यता और मोक्ष की अनुभूति कराता है।


भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन मत्स्य अवतार लिया था। जब प्रलय के समय सृष्टि जल में डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्य रूप में प्रकट होकर वेदों की रक्षा की। Swami Satyendra Satyasahib Ji ने कहा कि यह घटना दर्शाती है कि सत्य और ज्ञान की रक्षा के लिए भगवान स्वयं अवतरित होते हैं। मत्स्य अवतार के कारण ही यह दिन विष्णु भक्तों के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है।


पांडवों का दीपदान और गंगा स्नान की परंपरा

महाभारत के बाद जब पांडव अपने परिजनों की मृत्यु से व्यथित हुए, तो श्रीकृष्ण ने उन्हें कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान और दीपदान का विधान बताया। पांडवों ने गढ़मुक्तेश्वर में स्नान कर पितरों का तर्पण किया। तब से यह परंपरा चली आ रही है।
Swami Satyendra Satyasahib Ji के अनुसार, इस दिन किया गया दीपदान न केवल पितरों को तृप्त करता है, बल्कि आत्मा को भी पवित्र बनाता है।


तुलसी विवाह और शुभ कार्यों की शुरुआत

Swami Satyendra Satyasahib Ji ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा देवी तुलसी और भगवान शालिग्राम के दिव्य मिलन का प्रतीक भी है। तुलसी विवाह के बाद ही हिंदू समाज में विवाह जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।
यह दिन दांपत्य सुख, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना गया है।


ब्रह्मा जी का अवतरण और पुष्कर तीर्थ का महत्व

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ब्रह्मा जी का अवतरण पुष्कर तीर्थ में हुआ था। Swami Satyendra Satyasahib Ji के अनुसार, इस अवसर पर पुष्कर में स्नान और ब्रह्मा मंदिर में पूजा करने से व्यक्ति को देवकृपा और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन लाखों श्रद्धालु पुष्कर सरोवर में आस्था की डुबकी लगाते हैं।


देवताओं की दीपावली – महाआरती का पर्व

Swami Satyendra Satyasahib Ji ने कहा, कार्तिक पूर्णिमा की रात भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। उनके जागरण पर देवता आनंदित होकर दीप जलाते हैं और लक्ष्मी-नारायण की महाआरती करते हैं। यह क्षण “देव दीपावली” के रूप में पूजनीय है। इस दिन किया गया दीपदान और पूजा-साधना जीवन में प्रकाश, शांति और समृद्धि का संदेश देती है।


और अंत में..

Swami Satyendra Satyasahib Ji के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह आत्मशुद्धि और दिव्य ऊर्जा का अवसर है। इस दिन स्नान, दान और दीपदान से जीवन में पवित्रता, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।


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