
इस पवित्र अवसर पर मैं, मनीष कुमार अंकुर, अपने जीवन के मार्गदर्शक, मेरे आदरणीय गुरु श्री एस.एन. विनोद जी को साष्टांग नमन करता हूं।
जिन्होंने न केवल मुझे पत्रकारिता सिखाई, बल्कि एक साधारण “मनीष” से उठाकर मुझे “मनीष कुमार अंकुर” बना दिया — एक पहचान दी, एक स्वर दिया, और सबसे अहम बात, पत्रकारिता के मूल्यों से मुझे परिचित कराया।

“गुरु वो नहीं जो सिर्फ पढ़ाए, गुरु वो है जो जीवन जीना सिखाए“
श्री एस.एन. विनोद — एक नाम नहीं, एक संपूर्ण पत्रकारिता विश्वविद्यालय हैं।
प्रभात खबर के प्रथम संस्थापक और संपादक, देश प्राण जैसे जनपक्षधर समाचार पत्र के जन्मदाता, और अनेक राष्ट्रीय समाचार चैनलों में मुख्य संपादक के रूप में अपने निर्भीक लेखनी और नैतिक पत्रकारिता से देश को दिशा देने वाले महापुरुष हैं।
आज मीडिया के दौर में जहाँ TRP और ‘सूत्रों के हवाले’ ने सच्चाई को कुचल डाला है, वहाँ 85 वर्षीय श्री विनोद जी एक प्रकाशस्तंभ की तरह खड़े हैं। उन्होंने पत्रकारिता को कभी ‘पेशे’ की तरह नहीं, बल्कि ‘धर्म’ की तरह जिया है।
जब मैं भटका, उन्होंने थामा हाथ…
जब मैं पत्रकारिता की दुनिया में एक नवांकुर था, तो रास्ता अनजाना था, दिशा भ्रमित करने वाली, और अक्सर समझ नहीं आता था कि क्या गलत, क्या सही, क्या लोकप्रिय है, और क्या जरूरी है।
लेकिन मेरे गुरु ने मुझे बताया:
“लोकप्रियता के पीछे मत भागो, सच्चाई के साथ चलो — वो तुम्हें जनता के दिलों तक ले जाएगी।”
उनकी यह सीख मेरे जीवन का मूल मंत्र बन गई।

जो मीडिया को दिशा दे, वो सिर्फ संपादक नहीं — युगपुरुष है
आज मीडिया को लेकर सवाल उठते हैं — एजेंडा, प्रोपेगेंडा, झूठ और शोर।
लेकिन जब हम श्री एस.एन. विनोद जी की जीवन यात्रा को देखते हैं, तो महसूस होता है कि पत्रकारिता केवल खबर लिखना नहीं होता, बल्कि सत्य की मशाल लेकर अंधेरे में चलना होता है।
उन्होंने बिना झुके, बिना डरे, हर दौर में पत्रकारिता को जीवित रखा।
वे आज भी देश की मीडिया बिरादरी के लिए आदर्श हैं। उनके जैसे संपादकों की कमी, आज की मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती है।
पत्रकारिता में अगर आज मैं जो भी हूं, उन्हीं की देन हूं
मुझे जो मंच मिला, जो अवसर मिले, जो सम्मान मिला — वह इसलिए नहीं कि मैं खास हूं, बल्कि इसलिए कि मेरे पीछे एक महान गुरु की छाया रही।
श्री एस.एन. विनोद जी ने मुझे न केवल पत्रकार बनाया, बल्कि एक जिम्मेदार इंसान भी बनाया।
उन्होंने सिखाया कि “पत्रकार होना मतलब है” — सत्ता से सवाल पूछना, जनता के पक्ष में खड़ा रहना और कभी भी अपनी आत्मा को गिरवी न रखना।
जब भी मैं अपने गुरु आदरणीय श्री एस.एन. विनोद जी के बारे में कुछ लिखने बैठता हूं तो मेरी कलम ही नहीं रुकती है। उनके बारे में जितना लिखा जाए उतना कम है। क्योंकि ऐसे महान इंसान को शब्दों में पिरोया नहीं जा सकता है। ऐसी शख्सियत तो इतिहास में अपना नाम दर्ज करती हैं।

गुरु पूर्णिमा पर एक भावपूर्ण प्रणाम
इस विशेष दिन पर मैं खबर 24 एक्सप्रेस के माध्यम से, अपने पूज्यनीय गुरु को हृदय से प्रणाम करता हूं।
मेरी लेखनी, मेरी आवाज, मेरी हर रिपोर्ट — आज भी उनके आशीर्वाद की छाया में चल रही है।
उनका जीवन, उनके मूल्य और उनका मार्गदर्शन — मेरे लिए हमेशा एक प्रेरणा रहेगा।
जय गुरु देव।
गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं।
आपका शिष्य,
मनीष कुमार अंकुर
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