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ये है गुजरात मॉडल ध्यान से देख लीजिये, न सड़के हैं, न सुविधाएं, लोग बोल रहे हैं रोड़ नहीं तो वोट नहीं

आजादी के 75 साल बाद हर घर तिरंगा तो जरूर पहुंचा लेकिन हर गांव में अभी तक सड़क नहीं पहुंची।

गुजरात प्रदेश के रोल मॉडल की वाहवाही करने वाले विश्व प्रसिद्ध यशस्वी प्रधानमंत्री जो कि सबसे लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहे एवं सबसे ज्यादा दौरा उन्होंने गुजरात के दाहोद जिले में ही किए। यहां तक कि उन्होंने दाहोद को स्मार्ट सिटी का दर्जा भी दे डाला। खैर स्मार्ट सिटी के नाम पर भले दाहोद में भले कुछ भी न हुआ हो, जिले के नाम पर दाहोद में टूटी फूटी सड़कें हैं, थोड़ी बहुत सुविधाएं हैं। लेकिन दाहोद जिले के गांवों की हालत पर आपको जरूर तरस आ जायेगा। प्रधानमंत्री मोदी के सबसे पसंदीदा जिलों में से एक दाहोद जिला आज अपनी हालत पर रो रहा है।

दाहोद जिले के आदिवासियों की सबसे ज्यादा चिंता करने वाले शुभचिंतक प्रधानमंत्री दाहोद को लगभग लगभग भुला बैठे हैं। ये हाल केवल दाहोद के ही नहीं बल्कि गुजरात के कई जिलों के हैं। यहां सड़कों की हालत आज बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंच चुकी है।

दाहोद जिले के ग्रामवासियों के बार-बार आवेदन देने पर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। यहां तक कि गांव के सरपंच ने भी आवेदन दिया लेकिन उनके आवेदन का भी कोई असर नहीं पड़ा। ऐसे में राजनीतिक पार्टियां अपना उल्लू सीधा करने के लिए गांववासियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करती हैं,ल और जब इलेक्शन आते हैं तो उस समय वोट लेने पहुँच जाते हैं। परंतु इस बार ग्रामीणों ने मिलकर वोट माँगने वालों का बहिष्कार भी किया है। “रोड नहीं, तो वोट नहीं!” यह स्लोगन भी दिया है। कोई भी राजकरणी पार्टी जीतने के बाद रोड नहीं बनवाती है। नेता चुनाव जीतने के बाद कहते हैं कि हम रोड बना देंगे परंतु पहले आवेदन दीजिये, वहीं आवेदन विकास की बाट जोहते-जोहते कूड़ेदान में चले जाते हैं।

ऐसी सड़कों पर यदि कोई इमरजेंसी हो जाए तो ग्रामीणों को हॉस्पिटल जाने में बहुत दिक्कत होती है और कोई भी इमरजेंसी सेवा उन्हें नहीं मिल पाती है। गाँव के स्कूली बच्चों को वहां से आवागमन में बहुत ज्यादा कविनाईया होती हैं। इसके चलते सभी बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है जो कि उनके लिए भविष्य में एक चिंताजनक विषय है। गाँव में अभी तक शमशान घाट भी नहीं बना है और जो बने हैं उनकी परिस्थिति बहुत दयनीय है।

ये हाल ग्राम जालोद के हैं जो कि दाहोद स्मार्ट सिटी से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर है। गुजरात में ऐसे तो ना जाने कितने गांव होंगे जो विकास की राह बेसब्री से पलके बिछाए पिछले 75 सालों से इंतजार कर रहे होंगे।

ख़बर 24 एक्सप्रेस गुजरात ब्यूरो चीफ राजेश सिसोदिया एवं दाहोद जिला ब्यूरों चीफ जैनु सिंह गणावा की रिपोर्ट

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