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योग आयुर्वेद व अन्य चिकित्सा पद्धति और एलोपैथी पद्धति में वर्चस्व युद्ध का कारण ओर निवारण बता रहे हैं सद्गुरु स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

आयुर्वेद एक पंचतत्व के कम अधिक या संतुलित जीवंत पदार्थ के रूपांतरण से बनी ओषधि के त्रिदोष निवारण के उपयोग की अतिप्राचीन प्रमाणिक पद्धति है।
जो मनुष्य को मनुष्य ही रहने देने की ओर अग्रसारित करते हुये प्रकृति के साथ संतुलन बनाये रखने व अपनाये रखने पर जोर देती है।

ओर एलोपैथी एक जैविक रासायनिक पदार्थ के उपयोग की पद्धति के साथ साथ में वो शल्यक्रिया की विशेष उच्चता की सहायक पद्धति है,जिसका अत्याधिक विस्तार हुआ है और होता रहता है,ये मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देकर उसे असाधारण बनाने के सहयोग के नाम पर उस पर हावी होने की ओर निरंतर अग्रसर है।जिसमे मनुष्य सहित प्रकृति को भी बदला जा रहा है,परिणाम मनुष्य के अमर होने की चिकित्सा के नाम पर उसे उसके मूल से बदल कर विनाश पर समाप्त की ओर निरंतर अग्रसर है।
बाकी चिकित्सा पद्धतियां भी आयुर्वेदिक पद्धति की ही तरहां मनुष्य को सहज यथावत रखने की ओर प्रयासरत रहती है।
अब प्रश्न क्या है कि इनमें दबाब कोन बनाकर विवाद कर रहा है।
तो वो है-एलोपैथी पद्धति।
क्योकि उसकी महत्त्वकांक्षा मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देने में है।वो मनुष्य की जो संकट रोग या दुर्घटना के समय की आवश्यक चिकित्सा है,उसे करने के उपरांत,उसमें ये प्रयासरत रहती है,की उसे पूर्णतया लाभ मिले,परिणाम पूर्णतत्व के देने की सहायता के नाम क्रतिमता की व्रद्धि कराकर उसके मूल रुप की जगहां उसे पूरी तरहां कृतिम बनाने की ओर है,जिसका भविष्य परिणाम मनुष्य ही समाप्त हो जाएगा और शेष रह जायेगा कृतिम मनुष्य जो जाने क्या ओर कैसा नियन्त्रित या अनियंत्रित होगा, उस मनुष्य के बदलते अनेक रूप आप अभी के युग मे ओर एक वैज्ञानिक सोच पर बनी फैंटेसी का उपयोग करती फिल्मों में भयानक बदलाव के साथ देख रहें है।
इसका मूल कारण ये भी है कि,मनुष्य की साधन सम्पन्नता के बढ़ते वर्चस्व से प्रकार्तिक संसाधनों का भीषण उपयोग करते हुए प्रकृति वातावरण में विनाशकारी बदलाव,तो उस कैमिकल रासायनिक का मनुष्य पर भीषण प्रभाव से उसका प्रकार्तिक शरीर बिगड़ कर ओर बिगाड़ कर रासायनिक बनता व बनाया जा रहा है,यो वो स्वयं की शारारिक स्तर पर खुद से चिकित्सा को नही कर पा रहा है,ओर उसकी क्षमता को खोता जा रहा है,ओर रसायन पर निर्भर होकर दास बनता जा रहा है।तब ऐसी रासायनिक बदलाव के चलते उसे कृतिम रासायनिक दवाइयां ही चिकित्सा में चाहिए,ओर उस चिकित्सा के चलते वो ओर बदलता जा रहा है,इस सब परिवर्तनों के चलते एक दिन अपना मनुष्य रूप खो देगा,ये निश्चित है।
यो तो,निदान तो मनुष्य को अपनी आदतों को सुधारने ओर प्रकृति को नष्ट न करके उसकी संगत सहयोग लेने और देने से है,
1-सबसे जरूरी है-
जनसंख्या व्रद्धि को रोके।
2-शारारिक परिश्रम बढ़ाये।
3-प्रभुत्त्व की आदत को कम करें।
4-प्रकार्तिक संसाधनों को नष्ट न करें।
5-प्रकृति को प्रकार्तिक तरीके से ही बढ़ावा दे या ऐसा करने में सहायक हो।
1-एलोपैथी की एक विश्वव्यापी संस्था है,जिसकी अनेक शाखाएं होते हुए भी वे मेडिशन के सम्बन्ध मे अनिश्चितता को लेकर व उसके बदलाव को लेकर चलते हुए एकरूप बनी रहती है,बस अपनी खोजो के प्रयोगों के कभी उचित लाभ और तो कभी अनुचित हानियों को लेकर एकमत न रहते हुए भी एक ही बैनर के तले एक रहते है।यो इस पैथी का अत्याधिक विस्तारीकरण ओर धनिक संगठन है।जिसकी गिरफ्त में सम्पूर्ण विश्व मनुष्य है ओर इसी लिये ये सब पैथियों पर हावी होकर उन्हें अपनी पद्धति के आगे दबा देती है और अपनी चिकित्सा के प्रभुत्व को लागू रखती है,जैसे-who,,जो चाहे जहां चाहे एक अत्याधिक बड़े स्तर पर अपने स्वास्थ्य नियमो को ही लागू कराती वर्चस्व बनाये है,जिसकी लगभग कोई देश या सत्ता अवहेलना नही कर सकता है।
2-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति :-,
ये एक मूल में भारत ओर अन्य देशीय स्तर पर बहुत बंटाव के साथ एक स्थिर सिद्धांत पर चलने वाली लगभग स्थिर पद्धति है।
यो इसी अपने अपने व्यक्तिगत स्तर पर बिखराव के चलते ये एक पुर्णतया संगठित नहीं है और न ही हो पाती है।सरकारी स्तर पर भी इसमें दो भेद है-1-व्यक्तिगत आयुर्वेद चिकित्सक व उनकी व्यक्तिगत चिकित्सा पद्धति का जनकल्याण को अपनी शर्तों पर उपयोग।
2-सरकारी की अपने इस आयुर्वेद ज्ञान की क्रमबद्ध चिकित्सा पद्धति का जनकल्याण को अपनी शर्तों पर उपयोग है।
यो दोनों में एक दूसरे के तहत नहीं चलने का अपना मतभेद रहता है और जब मतभेद बना रहता है,तो इस पद्धति का विश्वव्यापी स्तर पर,न उपयोग ओर न विस्तार ओर न ही देशकाल परिस्थिति के अनुसार चिकित्सा के व्यक्तिगत अनुभवों का लेन देन नहीं होने से प्रयोगों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता बढ़ती है,नतीजा लोगो का खूब विश्वास होकर भी,यो इसका नाम जड़ीबूटी का तुक्का विज्ञान तक सिमटकर रह जाता है।
साथ ही वैसे तो आयुर्वेदक ज्ञान तो सबसे प्राचीन है,जब औषधियां भी उस समय की प्रकृति के अनुसार बिल्कुल विशुद्ध रही थी,तो थोड़ी मात्रा में ही वे सीधा रोग को मिटा देती थी,ओर अब ज्ञान तो वही प्राचीन है,पर औषधियां अपनी प्रभाव की प्रकृति से वातावरण की संगत यानी प्रदूषण और खाद के बदलाव आदि से पूरी तरहां से बदल गयी है,तब ये कैसे उतना लाभ दे पायेगी,ये एक बड़ा भारी प्रश्न है।
जैसे कि घर मे लगाई गई तुलसी के पौधे को बस हम सादा पानी देते है और सूरज की किरणें ओर खाद के नाम पर “जीरो बंटा” या बहुत कम असल गौबर आदि का खाद डालते है,तो अधिकतर भक्त कहेंगे,सही है,हम तो नही डालते है।तब वो केवल वही पुरानी मट्टी जो खनिजों व तत्वों को खा चुकी ओर अब केवल सदा पानी और सूरज की रोशनी से पल रही है,तब वो तुलसी कैसे देगी हमे असाधारण कहे गए लाभ,यानी लाभ नही मिलेगा,बस जरा नामचारे का लाभ हो सकता है।ऐसे ही ओर घरेलू मसाले औषधियों के बार मे माने,तो हम मारे गए पुराने आयुर्वेदिक कथनों के आधार पर,ये भी एक बड़ा स्वास्थ्यवर्द्धि सफल नहीं होने का कारण है।
आयुर्वेदिक औषधियों को प्रकार्तिक वातावरण में ही पूर्ण लाभ के साथ उत्पन्न या पनपने के कथन है,न कि आर्टिफिशियल निर्माण करने की,एक तो अब कोई ऐसी प्राकर्तिक भूमि बची नहीं ओर जो हैं भी,वे बहुत कम मात्रा में है,तब कैसे असल ओषधि पैदा ओर हमें सही चिकित्सा को मिले।
साथ ही लाखो वैद्य ओर आयुर्वेद फार्मेसियां अलग से दवाइयां बनाकर बेचती है,उनके पास कहां से इतनी असली आयुर्वेदिक औषधि आ रही या मिल या प्राप्त हो रही है?जो कि इसका विश्लेषण करने से ये बात ज्ञात होने पर सही निकलता है।
यो इनकी असलियत पर भी बड़ा भारी प्रश्न होने से,जो आयुर्वेदिक ज्ञान की महिमा है,वो वैसा कथन का लाभ नही दे पाने के कारण विश्वनीयता खो रही है,ओर साथ ही जो बीमार है,वो इनकी त्रिदोष प्रकृति के अनुसार चिकित्सा नियम भी नही अपना पाता है,कुल मिलाकर ये आयुर्वेदिक महाज्ञान,अपने देश काल प्रकृति रूपांतरण के कारण उतनी चिकित्सा नही करने में सक्षम है।ये बहुत बड़ा असफलता का कारण है।जो इसके लिए चिकित्सा जगत में सही नहीं है।
ओर महामारी आपदा होने पर आयुर्वेदिक कोईं भी महाअस्पताल नही होते है,जहां ये पद्धति सार्वजनिक रूप से प्रमाणित हो पाए।
सबसे बड़ी बात की आयुर्वेदिक औषधि बनाते समय उसमें वेद्य अपनी आध्यात्मिक आरोग्य भावना शक्ति को आने वैदिक मंत्रों के जप से प्रवाहित करने की भावना भी करते थे और कुछ करते है,जो कि आज के कृतिम फेक्ट्री सिस्टम से बनने वाली आयुर्वेदक दवाओं में होती ही नही ओर उनमें ऐसा करने के कोई चांस नहीं है,कहने को कोई कुछ भी कहे।पर ये बहुत गहरी बात है।
शल्यक्रिया चिकित्सा की आयुर्वेदक पद्धति में उच्चतम विकास की आवश्यकता है,जो कि उसमें प्राचीनकाल से वर्णित है,उसका सभी प्रकार से आयुर्वेदिक तरीके से विकास और उपयोग होने पर ही,ये पद्धति अपने सम्पूर्ण गौरव को प्राप्त करके सभी चिकित्सा पद्धतियों में सर्वश्रष्ठ बन जाएगी।यो वैद्यों ओर सरकार को इस ओर विशेष ध्यान देते सहायता करनी चाहिए।
विशेष बात:-
आज जरूरत है,सभी आयुर्वेदिक चिकित्सको को एक संगठित संस्था यूनियन बनाकर इस पद्धति के समाज मे इसके होते विरोध को मिटाने की,ताकि जब भी इस पद्धति पर कोई आंच आये,तो सब तुरन्त खड़े होकर उनका विरोध करते हुए इसकी महानता को बरकरार रखें।
परन्तु यहां जो इस विषय पर स्वतंत्रतावाद है,वो किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के झंडे के नीचे आकर काम करने वालों को अपना वर्चस्व खोने का डर बनने से ये नाम मात्र को एकीकरण है,जो किसी भी राष्टीय व अंतरराष्टीय विरोध को अपनी पैथी पर हावी होने व लागू होने नही रोक पा रहा है।ये एकीकरण की पहल पहले तो केवल प्राइवेट स्तर पर होनी बहुत आवश्यक है फिर सरकारी तंत्र के स्तर पर हो और नियंत्रित हो,तभी इस पैथी को सर्वोच्चता की प्राप्ति होगी।
इस लेख में बहुत स्तर तक बढ़ने के कारण संक्षिप्त में कर दिया है,जो आगामी लेख में कहूंगा।

ठीक ऐसे ही सनातन धर्म के धर्मज्ञों के एकीकरण पर लेख लिख व कहूंगा,की उन्हें भी विभिन्न स्तर पर भिन्नता होते हुए भी मतभेद को सही अनुपात में रखते हुए,सर्वोच्चस्तर पर एक होना ही होगा, तभी सनातन धर्म का प्रभाव होगा।

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
www.satyasmeemission.org

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