
“यह कहना गलत नहीं होगा कि पत्रिकारिता आजके दौर में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पत्रकार एक सम्मानित शब्द हुआ करता था, और है भी।”
लोग पत्रकार को सम्मान की नज़रों से देखते हैं। पत्रकार में लोगों को ख्वाब दिखता है। लोगों को उनके अधिकार दिखते हैं। जब लोग हर तरफ से निराश हो जाते हैं तो वे मदद के लिए पत्रकार की तरफ आस लगाकर देखते हैं।
लेकिन आज ऐसा नहीं है। अब वक्त काफी बदल चुका है। अब कुछ लोग पत्रकारों को दलाल, बिकाऊ, वामपंथी और ना जाने कितनी-कितनी गंदी गालियों से संबोधित करते हैं।
“देश को बेचता नेता है, गालियां पत्रकार को पड़ती हैं। देश की तरक्की में बाधा खुद लोग होते हैं, गालियां पत्रकारों को पड़ती हैं। देश में सत्ता आप बनवाते हैं दोषी पत्रकार को ठहराते हैं। अपने दोषों को छिपाकर लोग पत्रकारों को गालियाँ देते हैं।”

ज्यादा वक्त नहीं हुआ है जब लोग पत्रकारों को खूब सम्मान देते थे। उनकी ईमानदारी में कसीदे पढ़ते थे लेकिन 2014 के बाद बहुत कुछ बदल गया है।
अब एक खास वर्ग के कुछ लोग पत्रकारों को बिकाऊ, दलाल वामपंथी न जाने क्या-क्या कहते हैं।
अगर पत्रकार सरकार की गलत नीतियों के ऊपर आवाज उठाये तो एक खास पार्टी से संबंध रखने वाले लोग ऐसे पत्रकारों का मुंह बंद करने की फिराक में रहते हैं और उन्हें खुल्ला ट्रोल करते हैं। उनके परिवार को निशाना बनाते हैं। गंदी-गंदी भद्दी-भद्दी गालियां देते हैं। यहां तक कि वो शर्म नहीं करते कि वो बोल क्या रहे हैं। छोटी बच्चियों के लिए भद्दी-भद्दी गालियां देना। परिवार को जान से मारने की धमकी देना, वाहियात अभद्र भाषा का उपयोग करना, मानों ये सब पहले से उनके डीएनए में हो।
हम जैसे पत्रकार ये सब 2014 से पहले भी झेलते आये हैं। लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही हद हो गयी है। ज्यादा आलोचना करने वाले पत्रकार को मार दिया जाता है या फिर उसमें इतना डर पैदा कर दिया जाता है कि वो सरकार की गलत नीतियों या योजनाओं की आलोचना ही ना कर पाए। आजकल राष्ट्रवाद के नाम पर यही सब यहाँ हो रहा है।
ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ पत्रकारों के साथ ही हो रहा है.. किसान, आम जन जो भी सरकार की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलता है वो सबसे पहले देशद्रोह के दायरे में आकर खड़ा हो जाता है। किसान अगर अपना हक मांगते है। तो कुछ लोग उनके विरोध में खड़े हो जाते हैं। उन्हें इतना ट्रोल करते हैं कि वे बेचारे चुपचाप जाकर गले में फंसी का फंदा लगाकर हमेशा के लिए चुप हो जाते हैं।
“लेकिन हम जैसे पत्रकार खुलेआम सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करते आये हैं। करते रहेंगे। जो उखाड़ना है उखाड़ लीजिये। क्योंकि जब अति हो जाएगी तो ऐसा न हो हमें उखाड़ने के चक्कर में खुद उखड़ना पड़ जाए।”
पत्रकारों का विरोध सिर्फ इस वजह से गलत है कि वो सरकार की गलत नीतियों को निशाने पर ले रहा है।
क्योंकि ज्यादातर इसी वजह से लोग हम जैसे पत्रकारों को निशाने पर लेकर कहते हैं कि पिछली सरकार की आलोचना क्यों नहीं करते? तुम उस खास पार्टी के समर्थक हो?
अब इनसे कोई पूँछे कि पत्रकारों की आलोचनाओं की वजह से ही पिछली सरकार सत्ता से बाहर हुई। उनके घोटाले उजागर हुए तब पिछली सरकार सत्ता से गयी। लेकिन वर्तमान की सरकार क्या कर रही है, 4 साल बीत गए आजतक एक घोटालेबाज को इनसे सजा तक नहीं दिलवाई गयी। पिछली सरकार के मंत्रियों के ऊपर जितने भी केस चल रहे हैं वो सब वर्तमान की सरकार बनने से पहले के हैं। यानी वो सब केस पिछली सरकार द्वारा द्वारा करवाये गए हैं या यह कह सकते हैं कि दबाव की वजह से करने पड़े हों।
“इस सरकार ने पिछली सरकार के एक भी मंत्री या नेता के ऊपर केस नहीं किया है। या जांच नहीं करवाई है। क्यों!!”
अब वर्तमान की सरकार की गलत नीतियों की आलोचना न करें तो क्या पिछली सरकार की नीतियों की करें….वो भी 4 साल बाद? आंखों के अंधे अभी भी यही चाहते हैं कि हम इस सरकार की गलत नीतियों की अनदेखी कर पिछली सरकार की आलोचना और इस सरकार के गुण गाएँ और कुछ कथित पत्रकारों जैसे राष्ट्रवादी पत्रकार हो जाएं।
आज एक खास पार्टी सभी टीवी चैनल और अखबारों को खरीद लेना चाहती है या जबरदस्ती अपने पक्ष में करना चाहती है। अगर कोई आनाकानी करे या उनके पक्ष में न जाए, तब वो अपने आईटी सेल वालों से इस कदर उनका दुष्प्रचार करवाती है। कि जो भी कुछ इस देश में घट रहा है ऐसे पत्रकारों या संस्थानों की वजह से हो रहा है। इसके बाद आईटी सेल वाले ऐसे पत्रकार या संस्थानों को लोगों की नज़र में देशद्रोही साबित कर देते हैं।
जी यही सब हो रहा है यहाँ राष्ट्रवाद के नाम पर। पत्रकारों के पहले भी मुंह बंद किये जाते थे। पत्रकार पहले भी मारे जाते थे। लेकिन उस समय वो खुद में एक बड़ी खबर होते थे। मारने या मरवाने वाले अधिकतर पकड़े जाते थे और हम उस वक़्त मरकर शहीद हो जाते थे।
“आजके दौर में जब पत्रकार मरता है या मरवाया जाता है तो “मर गया एक देशद्रोही साला” और लोग उसकी मौत का तमाशा बना लेते हैं। उदाहरण कई हैं लेकिन देकर क्या करना।”
अपना दुःख व्यक्त करना था। सो कर दिया। आज के दौर को देखकर जी भरकर रोने का मन करता है, लेकिन यह वक़्त रोने का नहीं बल्कि कुछ करने का है। हम जैसे पत्रकार गीदड़ भवकीयों से डरने वाले नहीं हैं, बल्कि हम वो चट्टान हैं जिनसे अच्छे-अच्छे डरकर भाग गए।
अब वक्त आ चुका है इन्हें भी इनकी औकात दिखाने का। साफ शब्दों में चेतवानी है। हमारे अंदर के जानवर को मत जगाइए। हम जो कर रहे हैं करने दीजिए। आपको सुधरने का एक मौका दे रहे हैं। देश के लिए कुछ करने का मौका दे रहे हैं। करिये।
यूँ कायरों की तरह आंखों से आँसू मत बहाइये। फिल्मों में विलेन को बहुत रोते देखा है “नायक” फ़िल्म भी देखी है.. ऐसे किसी नायक को पैदा मत होने दीजिए।
हम पत्रकार हैं लेकिन कुछ गँवार नौसिखये नेता इन पत्रकारों को प्रेस्टीट्यूट साबित कर देते हैं वो खुद अपने गिरेवान में नहीं झांकते की तुम क्या हो.. तुमने देश के जवानों को मरवाया, उनकी गर्दन कटवाई, देश के दुश्मनों से मिलकर देश की अस्मिता का सौदा किया। तुम खुद गद्दार हो और प्रेस्टीट्यूट हमें बोलते हो।
देश बेचकर, दलाली करके तुम खुद आगे बढ़ गए हो.. लेकिन इतने भी नहीं बढ़े हो कि हमें कुछ भी बोलते जाओ या हम सहते जाएं..।
ऐसा न हो कि सभी पत्रकार जाग जाएं और तुम्हारे उस अंदर के उस “प्रेस्टीट्यूट” शब्द की औकात बता जाएं।
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Bahut saHi kaha sir aapne ye daur bada khatarnaak hai aur usse bhi jada khatarnaak hai logo ki ghatiya soch jo netao ko support karti hai