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50 प्रतिशत रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, महाराष्ट्र में निकाय और पंचायत चुनाव का रास्ता साफ

Report | Akash Dhake | Mumbai : महाराष्ट्र में लंबे समय से अटके हुए निकाय और पंचायत चुनावों को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत की खबर सामने आई है। 50 प्रतिशत रिजर्वेशन की संवैधानिक सीमा को मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को चुनाव प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दे दी है।

हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि जिन निकायों में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा है, वहां फिलहाल चुनाव नहीं होंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किन इलाकों में तुरंत चुनाव होंगे और किन पर अब भी संकट बना रहेगा। पूरी जानकारी के लिए वीडियो में बने रहिए।

महाराष्ट्र में नगर निगम, जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनाव लंबे समय से टलते आ रहे थे। इसकी सबसे बड़ी वजह थी आरक्षण को लेकर जारी कानूनी विवाद। सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।

अब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को यह अनुमति दे दी है कि जिन निकायों में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर है, वहां चुनाव प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। राज्य चुनाव आयोग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में से दो नगर निगम ऐसे हैं जहां कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा है। वहीं 32 जिला परिषद और 336 पंचायत समितियों में आरक्षण की अंतिम गणना अभी जारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जिन निकायों में आरक्षण सीमा के भीतर है, वहां चुनाव की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाए। इसमें मुंबई की बृहन्मुंबई नगर निगम भी शामिल है, जहां काफी समय से चुनाव रुके हुए हैं। राज्य चुनाव आयोग ने कोर्ट को भरोसा दिलाया है कि वह जल्द ही चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करेगा।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि 2 दिसंबर को जिन 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों में मतदान होना है, उनमें से 57 निकाय ऐसे हैं जहां कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक है। इनमें 40 नगर परिषद और 17 नगर पंचायत शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन सभी जगहों पर मतदान तो तय कार्यक्रम के अनुसार ही होगा, लेकिन इन 57 निकायों के नतीजे कोर्ट के अंतिम फैसले पर निर्भर करेंगे।

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ पहले ही तय कर चुकी है कि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि अगर किसी क्षेत्र में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक भी हो, तब भी ओबीसी आरक्षण बढ़ाकर कुल सीमा को 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं ले जाया जा सकता।

वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने इस तर्क का विरोध किया। उनका कहना था कि इस तरह के फैसले से स्थानीय निकायों में ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व लगभग खत्म हो जाएगा और पिछड़े वर्गों के अधिकार प्रभावित होंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि आरक्षण की गणना करते समय सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में 21 जनवरी को अंतिम सुनवाई की तारीख तय की है। माना जा रहा है कि इसी दिन यह तय होगा कि महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण का अंतिम फार्मूला क्या होगा।

कुल मिलाकर फिलहाल महाराष्ट्र में उन सभी निकायों में चुनाव का रास्ता साफ हो गया है, जहां आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर है। वहीं जिन जगहों पर यह सीमा पार हो चुकी है, वहां अगला फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की अंतिम सुनवाई के बाद ही होगा।

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