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स्त्रियों का कुण्डलिनी जागरण (भाग 2) क्या है “रेहि क्रिया योग”? इसको जानें और ईश्वरत्त्व को प्राप्त करें : श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

 

“श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने स्त्रियों के कुण्डलिनी जागरण के बारे में बताया था यह उसी का दूसरा भाग है। कुण्डलिनी जागरण के दूसरे भाग में स्वामी जी रेहि। क्रिया के बारे में बता रहे हैं।”

 

 

 

स्त्रियों का कुण्डलिनी जागरण और बीज मंत्र (भाग 1), श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज द्वारा स्त्रियों के लिए “सत्यास्मि धर्म ग्रंथ” एक अपूर्व भेंट

(कुण्डलिनी जागरण का पहला भाग पढ़ने के लिए दिए लिंक पर क्लिक करें “स्त्रियों का कुण्डलिनी जागरण और बीज मंत्र, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी माहारज द्वारा स्त्रियों के लिए “सत्यास्मि धर्म ग्रंथ” एक अपूर्व भेंट”)

 

रेहि क्रिया से कैसे ईश्वरत्त्व को प्राप्त किया जा सकता है, स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज इस क्रिया के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। स्वामी जी हर एक ऐसी चीज के बारे में विस्तारपूर्वक बताते हैं जिसे कोई ज्ञानी विद्धवान बताना नहीं चाहता है।

क्या है रेहि क्रिया इसको जानें :-

 

 

 

रेहि–दो शब्दों से बना है1-रे-2-हि।
इसका सामन्य सा अर्थ है-1-रे-अपनी आत्मा और-2-हि-का साक्षात्कार करना।
रेहि-मूल रूप से चार अक्षर से बना है-र+ऐ+ह+ई=रेहि।
र-आत्मा-ऐ-आत्मा की आनन्द ऐच्छिक यानि समस्त आनन्द इच्छाये और उनका समहू,जिसे योग में मन कहते है और-ह-हम यानि स्वयं व्यक्ति की साकार उपस्तिथि यानि शरीर, जो स्त्री(+,धन शक्ति) और पुरुष(-,ऋण शक्ति) के रूप में आत्मा के दो भाग है,जिन्हें मिलाकर ही परमात्मा बनता है और- ई – ईश्वर यानि प्रत्येक आत्मा का सर्वोच्चत्तम स्वरूप और उपलब्धि होना।

यो रेहि का अर्थ है-अपनी आत्मा की समस्त आनन्द इच्छाओं के सूक्ष्म शरीर मन के द्धारा इस प्रत्यक्ष स्त्री और पुरुष के साकार शरीर के माध्यम से एक करके ईश्वरत्त्व को प्राप्त करना। और इस प्राप्ति के सभी भागों में जो एक होने की स्थिति आती है-वह रेहि योग के दो भाग-1-सूक्ष्म यानि आध्यात्मिक मिलन की क्रिया जिसे योग रमण कहते है और-2-स्थूल यानि भौतिक मिलन की क्रिया जिसे भोग रमण कहते है।
यानि भोग माने कर्म करना और योग माने किये गए कर्म को अपने व्यवहार में लाना ही भोग+योग=रमण यानि रेहि क्रिया कहलाती है।

रेहि का और अर्थ है:-रमण..यानि आत्म मन्थन करना। और-चक्र चलना। इसे ही साइकिक चक्र यानि आत्म ऊर्जा के चक्र को चलना यानि कुण्डलिनी जाग्रत करना है।
यो संसार में इस रेहि के दो चक्र चलाने के क्रिया योग रूप है,जो केवल सर्वप्रथम सत्यास्मि मिशन और उसके धर्म ग्रंथ-सत्यास्मि में वर्णित है, जो आज तक वेदकाल से वर्तमान ग्रंथों में कहीं भी जरासा भी वर्णित नहीं है, ये उनका सञ्छित ज्ञान और चित्र आगे बताये और दिखायें जायेंगे:-

 

 

यहाँ पुरुष और स्त्री के सूक्ष्म से लेकर स्थूल शरीर तक में अलग अलग बीजमन्त्र और चक्र है:-

 

 

 

“पुरुष कुंडलिनी बीजमंत्र और चित्र:-“”

पुरुषवादी ये 5 बीज मंत्र का अर्थ इस प्रकार से है,जो आज तक किसी भी धर्म ग्रंथ में नहीं दिया गया है आओ जाने:-

1-लं – पुरुष लिंग का संछिप्त अर्थ रूप।

2-वं – पुरुष वीर्य का संछिप्त अर्थ रूप।

3-रं – रमण यानि पुरुष में व्याप्त विकर्षण शक्ति(-) का संछिप्त अर्थ रूप है।यानि स्त्री में जो आकर्षण शक्ति(+) है, उससे मिलकर जो क्रिया योग को सम्पन्न होता है,वह रमण है।

4-यं – यानि पुरुष योनि यानि लिंगभेद अर्थ का संछिप्त रूप है-की ये आत्मा पुरुष योनि में जन्मी है।

5- हं – हम् यानि पुरुष की स्वरूप की उपस्तिथि का संछिप्त अर्थ रूप है।

समझ आया की ये 5 बीज मंत्र केवल पुरुष और उसकी शक्ति को ही दर्शाते और प्रकट करते है।
बाकी 7 चक्र-मूलाधार चक्र से सहत्रार चक्र तक का अर्थ दोनों के लिए लगभग समान ही है।यानि मूलाधार का अर्थ है-स्त्री हो या पुरुष इन दोनों का मुलेन्द्रिय स्थान अर्थ है।यही और भी मानो।

 

 

2-“स्त्री की कुंडलीनी के बीज मंत्र और चित्र दर्शन””:-

*-मूलाधार चक्र:–का चित्र-~()~ यानि मध्यम प्रकाशित पूर्णिमा जैसा चंदमा और उसके दोनों और दो श्वेत पत्तियां – बीज मंत्र है-भं- अर्थ है-भग या योनि-भूमि तत्व।

*-स्वाधिष्ठान चक्र:-हरित पृथ्वी पर बैठी हरे रंग की साड़ी पहने सांवले रंग की स्त्री-बीज मन्त्र है-गं-अर्थ है-गर्भ-भ्रूण-ग्रीष्म-अग्नि।

*-नाभि चक्र:- ये भी हरित प्रकाशित पृथ्वी पर अर्द्ध लेटी हुयी सांवले रंग की स्त्री में ही संयुक्त है-बीज मंत्र है-सं-अर्थ है-सृष्टि-सत्-जल।

*-ह्रदय चक्र-गुलाबी रंग से प्रकाशित पृथ्वी पर गुलाबी रंग की साड़ी पहने अर्द्ध तिरछी लेटी हुयी गौरवर्ण वाली स्त्री-बीज मंत्र है-चं- अर्थ है-चरम-चन्द्रमाँ-मन-वायु।

*-कंठ चक्र-ये गुलाबी रंग वाली पृथ्वी और स्त्री के ही अधीन है-बीज मंत्र है-मं- अर्थ है-मम् यानि स्वयं-ज्ञानी मैं-माँ-महः तत्व-आकाश।

*-आज्ञा चक्र-यहाँ केवल स्निग्धता लिए दुधिया रंग का प्रकाशित चन्द्र की पूर्णिमा से चारों और अनन्त में बरसता हुआ अद्धभुत प्रकाश-बीज मंत्र है-गुंजयमान ॐ –अं+उं+मं=बिंदु से अनन्त होता सिंधु जैसा चपटा चक्र।निराकार।

*-सहस्त्रार चक्र-केवल स्त्री का स्वयं आत्म स्वरूप साकार जो प्रकाशित चन्द्र का पूर्णिमा प्रकाश से दैदीप्यमान होकर अनन्त से अनन्त तक शाश्वत बनकर आलोकित है।

स्वामी जी को-सम्पूर्ण सिद्धासिद्ध महामंत्र के साथ सत्यास्मि क्रिया योग-“रेहि” योग की उत्पत्ति और उसके रेहि चित्र का अवतरण दर्शन होना:-

12-10-2007 सोमवार प्रातः तक सिद्धासिद्ध महामंत्र जप करता इस विषय पर ध्यान किया की-मनुष्य को सबसे सीधा सरल क्रिया योग और उसे समझने समझाने का मार्ग क्या है?इसी मंत्रतात्मक चिंतन के चलते मुझे ध्यान में दिखा- तब मुझे अपने वर्तमान जीवन के शैक्षिक काल में गांव के समय का एक पुराने समय का दर्शन हुआ-जो की उस काल की सत्य घटना है-उस दिन मैं नहर पर दौड़ आदि व्यायाम करता घर लौटा,मेरी दादी कैलाशी जिन्हें माँ कहते थे,वे बोली की-तू आज दही ही बिलो दे!!मैं थोड़ा ये विचार करता की-क्या काम दिया है? और बोला ठीक है!!तब मैं दही बिलोने बैठा और सोचा इसे जल्दी बिलों का छुट्टी करता हूँ! यूँ तेजी से रेही चलाने लगा,जिसे देख माँ बोली-अरे ऐसे तो सब टूट जायेगी! बेटा धीरे सही से चला!! तब मैं उस सब दही बिलोने की क्रिया को देखता हुआ चलाता हुआ खो सा गया कि- देखो ये क्या निर्माण है? और धीरे धीरे अर्थ बनते समझते चले गए.की-मैं पीढ़े के आसन पर बैठा हूँ और सामने दही भरा मटका है,वो ढका हुआ है,साथ ही वो एक लकड़ी के चोकोर आसन पर स्थिरता को रखा है ताकि हिले नहीं और उसमें से रेहि जो अनेक गोल से घुमावधार चक्रों से भरी है और चार कोनेदार फलों से उसका अंत है और वो मटके में स्थित है और ऊपर की और से रेहि दीवार के पास गढ़े मजबूत खम्बे से रस्सी से बन्धी है तथा मटके का ऊपरी किनारे के नीचे का भाग भी उसी खम्बे की एक और रस्सी से बंधा है,ताकि मटका खिसके नहीं और इधर मेरे पैर मटके पर जमे है जिससे मटका मेरी और को नहीं खिसके और रेहि के मटके से बाहर निकला ऊँचा भाग एक ढाई लपेटे लिए दो छोर वाली एक ही रस्सी से जो मेरे दोनों हाथों में है,और अब जेसे ही मेने अपने दोनों हाथ को अपनी और खींचा तो रेहि अपने चारों कोनेदार फलों के साथ उठकर मटके के मध्य भाग में स्थिर हो गयी,अब मेरे एक एक आगे पीछे को हाथों को क्रम से धीरे धीरे चलने से रेहि मटके में जमे रखी दही को तोड़कर विलोने लगी और प्रारम्भ में कुछ जोर पड़ा और घरर घरर..शब्द के साथ धीरे धीरे सब सरल होता चला गया,अब मैं बीच बीच में रोककर मटके को ढके ढक्कन को हटा देखता की-कितना मक्खन निकला और क्या हुआ ? प्रारम्भ में तो ऐसे देखना पड़ा,आगे चलकर फिर देखना नहीं! क्योकि अनुमान हो जाता है की इतनी देर में मख्खन निकल आएगा।अब धीरे धीरे देखा झांग बने फिर कण कण इकट्ठा होते मक्खन का लोंदा सा दही के बिलने से बनी छाय में और रेहि पर इकट्ठा होता चला गया।जिसे मैने माँ को आवाज लगा बता दिया की- तुम्हारी दही बिल गयी और मक्खन निकल आया है,तब उन्होंने आकर देखा और बोली ठीक!! अब तू जा!! बाकि मैं कर लुंगी।
यही सब उस समय घटित हुआ और तब भी मुझे व्यक्तिगत ज्ञान समझ आया और इस दिन भी ज्ञानानुभूति दर्शन से समझ आया की-ठीक यही साधक के साथ घटित होता है-साधक मटका है और रेहि उसकी मेरुदंड और स्वास् और प्रस्वास् को दो छोर, जो विश्व व्याप्त सूक्ष्म और सदा हमारे आसपास नित्य विद्यमान सर्व परम् आत्मा स्वरूपी एक ही जीवन शक्ति रूप रस्सी के दो छोर है।जो हममे आती जाती है और हमे जीवन देती है, वे जीवन शक्ति के दो छोर साधक ज्यों ही अपने हाथ में लेता है और गुरु द्धारा स्थिर ज्ञान दंड जो मटके और रेहि को दो रस्सी-1-नितमित अभ्यास-2-गुरु द्धारा बताई और सिखाई विधि को सही से पकड़कर करता है तो कभी विफल नहीं होता है और एक स्थिर आसन पर बैठकर, यहां ध्यान रहे की लेटकर नही!! अपनी कमर और मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए बैठता है और धीरे धीरे अपने अंदर आते जाते स्वास् और प्रस्वास् पर ध्यान धरता हुआ अपने ह्रदय में दृष्टि जमाये रखता है की-इस स्वास् और प्रस्वास् का मिलन कहाँ हो रहा है(यहाँ अनेक गुरुओं ने स्वास् और प्रस्वास् के मिलन बिंदु को मूलाधार या नाभि या आज्ञा चक्र में माना है और नवीन पंथियों ने यहाँ अपने अपने मंत्रों को तोड़कर जपने का विधान रखा है और बुद्ध में केवल साक्षी रहने को किया ओर कहा है)और दोनों स्वासों की गति जिस पर ध्यान देने से वो घरर घरर करती परस्पर संघर्ष से उत्पन्न स्वर करती है,जिसका साधक में पहले जोर पड़ते स्वास् का अनुभव और बाद में भस्त्रिका के चलने का अनुभव होता है।ये श्वासों में जोर पड़कर खींच कर चलना और भस्त्रिका तब तक चलेगी जब तक की साधक के शरीर में जो विभिन्न स्थानों पर प्राण शक्ति के कण है और उनके बीच में जो प्रारब्ध के बुरे और शेष भोग संस्कार रूपी कर्मो का मल है,वो शुद्ध होकर सहज नहीं हो जाता है।तब तक ये अवस्था चलती है यो लगे रहो!! और ज्यों अन्नमय कोश रूपी जमी दही में शुद्धि होकर फिर छाय यानि मट्ठा जिसे प्राणमय शरीर कहते है उसमें जो मक्खन के शेष कण निकलने रह गए है,वे नहीं निकल आते है,तब तक ये प्राणों का संघर्ष की क्रिया से पेट में भस्त्रिका और फिर रीढ़ की हड्डी में चढ़ते या ह्रदय चक्र या आज्ञा या सिर के ऊपरी भाग में कम्पनात्मक प्राणों का दबाब का संघर्ष और उससे दर्द चुभन आदि परिणामों का प्रभाव सूक्ष्म शरीर में होता अनुभव होगा।यो लगे रहो। इतने इस प्राणों के संघर्ष से जन्मों का कर्म मेल शुद्ध नही होगा, तब तक चन्द्र और सूर्य स्वर या इंगला पिंगला नाड़ी के मिलन बिंदु द्धार नही खुलेगा जिसे सुषम्ना यानि मन और उसका जगत कहते है और इतने साधक जो ध्यांन में दर्शन देखता है,वो सब मस्तिष्क में स्म्रति के जो संस्कार कर्म है, उनका ही दर्शन और अनुभूति करता है,जो कभी सत्य तो कभी अनुमान द्रश्य ही होते है,यो इन्हें मायावादी मिथ्या दर्शन ही कहते है।ये संसारी ह्रदय चक्र के आकाश यानि संसारी प्रकर्ति में होते है और सत्य दर्शन और अनुभूति केवल सुषम्ना यानि मन में प्रवेश के उपरांत नीलवर्ण आकाश के मध्य पीतवर्ण आभायुक्त शून्य जगत के मध्य दीखते है,इसी का नाम है बिंदु भेदन।।
यहाँ रैहि क्रिया योग में पहले दो स्तर घटित होते है-प्रथम जब दही फट कर पतली दही बन जाती है और मलाई व् झांग से एकत्र होने लगते है,तब शरीर से प्राण शरीर में प्रवेश होता है और जब झांग समाप्त होकर कण बनने लगते है तब प्राण शरीर से मन शरीर में प्रवेश होता है,तब रेहि बड़ी आसानी से चलने लगती है! यही अवस्था में साधक को सहज ही बैठते ही देह भान समाप्ति और सहज ध्यान और दर्शनों का प्रारम्भ रुक रुक कर होना और टूटना मानो।सब जब मक्खन कुछ रेहि पर और अधिकतर मट्ठे में स्वतंत्र तैर रहा होता है।तब साधक में सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से अलग होकर भ्रमण करने की और दर्शन और ज्ञान के अर्जित करने की शक्ति को प्राप्त कर लेता है।पर अभी स्थूल शरीर और मेरुदण्ड से सम्पर्क बना रहने से अधिक देर तक बाहरी जगत में विचरण की शक्ति की प्राप्ति नही होती है।ये बहुत बाद में मिलती है।(इसी काल में मेरे तीर्व शक्तिपात और उसके अत्यधिक ध्यान करने के फलस्वरुप- यहाँ भक्त मोनिका विकल को विवाह से पूर्व सूक्ष्म शरीर का अपने कमरे से निकल कर घूमने का अलौकिक दर्शन हुआ था जिसे पृथक कहूँगा)
यहां से सभी प्रकार की क्रिया योग का अंत हो जाता है,यानि जितनी इच्छाएं है वे शुद्ध होकर एक ही इच्छा बन रह जाती है और अब इन इच्छाओं की शुद्धि को कोई क्रिया करनी नहीं पड़ती यो क्रिया समाप्त होती है।अब सब उपलब्ध ज्ञान नामक मक्खन को एकत्र कर उसे छाय यानि मट्ठे से अलग करके रखना और उस मख्खन को अग्नि पे ता या गर्म करके स्थायी बनाने की क्रिया मात्र रह जाती है,यहाँ की गयी क्रिया का अर्थ अति सूक्ष्म स्वाभाविक योग कहलाता है।यो यहाँ इच्छा+क्रिया+ज्ञान एक अवस्था में शेष रह जाते है-जैसे घी!!और उसका विभिन्न खाने के कार्यों में उपयोग होना!! ये आज्ञा चक्र में घटित होता है और घी या धि यानि प्रज्ञा का उपयोग सहत्रार चक्र का विषय है।ये ही निर्विकल्प समाधि स्तर है।जहाँ विचार या इच्छा और क्रिया या कर्म और इनका शुभ अशुभ परिणाम यानि ज्ञान एक हो जाता है,यो इस अवस्था में योगी जो सोचता है वही क्रिया बन होता है और उसका परिणाम सत्य यानि धर्म कहलाता है यही है अवतार की लीला कर्म और निष्पक्ष परिणाम।।

ये तभी मैने इसी ध्यान में रेहि के वे चार कोनेदार फलों में एक एक करके अलग अलग लिखे हुए “सत्य+ॐ+सिद्धायै+नमः” मंत्र स्वरूप देखा और ईं को घी के रूप में देखा और फट् को मक्खन को पिघलकर घी बनते देखा और स्वाहा को संसार के सभी भौतिक और आध्यात्मिक कर्मो में उपयोगी होते देखा।यो मेरा ये ध्यान सम्पूर्ण होकर चैतन्य हुआ।यो जो इसे जपेगा वो अवश्य सम्पूर्ण कुण्डलिनी योग और उपलब्धि को प्राप्त होगा।
तब इस विषय का ये उपलब्ध चित्र भक्त संध्या डाँगुर(डम्मी) ने बनाया था,जबकि वो इस विषय में कोई पेंटिंग सीखे नहीं थी,केवल मेरी सोच को समझ महनत कर बनाती थी।उसने अनेक मेरे मनोरूप चित्र बनाये।इसे भविष्य में सुखद परिणाम मिले और कोई भक्त ऐसा नहीं आया।जो ऐसे चित्र बना सके।यो गुरु निर्दिष्ट योग कर्म करोगे तो सदा योगी बनोगे।
विस्तार से ज्ञान को सत्यास्मि ग्रन्थ में पढ़े।जो हमारी वेबसाइट:-www.satyasmeemission.org पर भी उपलब्ध है।

विश्व का सबसे प्राचीन और सरल और सम्पूर्ण सिद्धांत दर्शन-और सत्यास्मि वर्णित “रेहि” क्रिया योग की द्धितीय विधि:-
आओ पहले इस रेहि क्रिया योग के प्रथम “नवांग स्तरों” को जाने,जो की 9 भागों में इस प्रकार से है की:-

1-नवांग योग:-

0-शून्य-1-स्थिर-2-स्थित-3-संगम-4-द्रष्टा-5-स्रष्टा-6-सर्वज्ञ-7-सर्वत्र-8-सम्पूर्ण-9-सत्य।

2-दीक्षा योग:-

दीक्षा का अर्थ:-
स्त्री और पुरुष के परस्पर प्रेम के आदान प्रदान को दीक्षा-“-द-द्धैत और इक्षा-शाश्वत प्रेम” यानि दीक्षा कहते है।

इस रेहि के द्धितीय शक्तिपात दीक्षा योग:-

-यानि जीवंत शक्तिपात और रेहि क्रिया योग से अति शीघ्र कुंडलिनी जागरण करने की विधि:-

प्रथम चरण या प्रारम्भिक प्रक्रिया यानि पार्टनर यानि साथी का चुनाव करें:-

इस रेहि योग में सबसे पहले आप यानि जो भी रेहि योग को प्रारम्भ करना चाहता है वो पहले अपना एक पार्टनर साथी चुने यानि कि- पति और पत्नी अथवा पिता और पुत्र अथवा माता और बेटी या भाई और बहिन या दो मित्र का एक जोड़ा बनाये और जिस दिन ये रेहि योग करें, उस दिन आप प्रातः शौच से निवर्त होकर एक दूसरे के सामने बैठ जाये और इस विधि में कोई एक गुरु बनेगा और कोई एक शिष्य बनेगा अर्थात जो गुरु बनेगा- वो अपने सामने बैठे व्यक्ति में अपनी शक्तिपात करेगा और सामने बेठा व्यक्ति केवल अपने में ही ध्यान करेगा।और बाद में यही दोनों पलट कर करेंगे।

द्धितीय चरण-अब इस रेहि योग को कैसे करेंगे ये जाने:-

अब ऊपर से नीचे की और ऊर्जा चक्र करने की विधि करें:-

अब जो कोई भी व्यक्ति पहले है,वह सब सामने वाले में इस प्रकार से करता हुआ अपनी ध्यान शक्ति से शक्तिपात करेगा- वो व्यक्ति अपनी आँखे बन्द करके अपने सामने बैठे व्यक्ति सहयोगी को अपनी मन की आँखों से देखे और अपनी मानसिक शक्ति को उसमे पहले देने के कारण उसके सिर को देखता हुआ ये मंत्र जपे-“सत्य ॐ सिद्धायै नमः” अब सामने वाले के चेहरे को मन की आँखों से देखते हुए,यदि स्पष्ट नहीं देख पा रहा है तो कोई बात नहीं केवल जो भी जैसा भी चेहरा दिख रहा है उसी का अनुमान लगाते हुए फिर से मंत्र बोलते हुए अपनी शक्ति उसमे प्रवाहित होने की कल्पना करे,जो अभी कम होगी, बाद में बढ़ती जायेगी, यो पहले केवल करता रहे,अब गला फिर छाती फिर पेट,फिर मूलाधार से लेकर सारे पेरो को और नीचे अंगूठों तक देखते हुए मंत्र बोले-सत्य ॐ सिद्धायै नमः।अब यही पेरो की देखता हुआ, कुछ समय टिके और लगभग 7 बार मंत्र बोले..

अब नीचे से ऊपर की और का ऊर्जा चक्र क्रम करने की विधि करें:-

अब फिर पैरों से उल्टा ऊपर को सामने वाले को देखता हुआ और मंत्र बोलता हुआ-पेट और छाती और गला और चेहरा और माथा और सिर के ऊपरी भाग तक पहुँच कर कुछ देर सिर को देखता हुआ,मंत्र जपे..
और कम से कम 7 बार तो जपे।

अब जब आप सामने वाले की सिर पर पहुँच कर मंत्र जप रहे हो,तब वहाँ से फिर से पहले जैसा ही क्रम करते हुए यानि ऊर्जा चक्र चलते हुए सामने वाले में-सिर से चेहरा-चहरे से गला-गले से छाती-छाती से पेट-पेट से सारे दोनों पैर के अंत तक नीचे तक आँखे बन्द और मन के द्धारा ध्यान से देखता हुआ मन्त्र जपे।
ऐसे ही कम से कम 51 या 108 उल्टा और सीधा रेहि के चक्र क्रम को करते हुए पूरा करें।

अब रेहि योग का दूसरे व्यक्ति द्धारा चक्र क्रम करना:-

अब सामने वाला दूसरा व्यक्ति ठीक पहले जैसा बताया रेहि ऊर्जा चक्र को,उसी क्रम से केवल अपने में, अपने सिर से प्रारम्भ करें,चूँकि उसे शक्ति लेनी है यो- वो उस शक्ति को अपने सिर से चहरे-फिर चेहरे से गले-फिर गले से छाती-फिर छाती से पेट-फिर पेट से लेकर यानि अपने मूलाधार से लेकर अपने दोनों पैरों के अंगूठो के अंत तक-गुरु मंत्र जपते हुए,उसे पहले व्यक्ति से दी जा रही ऊर्जा शक्ति को ग्रहण करता हुआ, अपनी आँखे बन्द करके आपना ही ध्यान करे और फिर से अपने में ही रेहि चक्र प्रारम्भ इस प्रकार से करें की अब- अपने पैरों से पेट तक-और पेट से छाती तक-फिर छाती से गले तक-फिर गले से चहरे तक-फिर चहरे से अपने माथे तक और फिर माथे से अपने सिर की चोटी तक-इस प्रकार नीचे से सिर तक-ऐसे ही 51 या 108 ध्यान जप क्रम को पूरा करें।

अब दूसरे व्यक्ति द्धारा पहले व्यक्ति जैसा ही रेहि चक्र का पहले व्यक्ति में शक्तिपात करते हुए 7 चक्रों का ध्यान करना:-

अब 9 दिनों बाद शक्ति देने वाला जिसे गुरु कहते है,वो केवल अपने में ध्यान करेगा और अब शक्ति लेने जिसे “शिष्य” कहते है वो शक्ति देने वाला बनकर पहले जैसा ही मन्त्र जपते हुए शक्तिपात योग करेगा।
तो आप दोनों अति शीघ्र ही इस प्रत्यक्ष शक्तिपात के निरन्तर अभ्यास से एक ज्योतिर्मय अलोक बिंदु देखेंगे और प्रकाश से भरते हुए अंत में कुण्डलिनी जागरण के सहज क्रम से गुजरते हुए आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त होंगे।
ये ही सच्चा सनातन योग का अति रहस्यमय और प्राचीन क्रिया योग विद्या रहस्य है।जो देखने में सहज है और विश्व का सर्वश्रेष्ठ क्रिया योग है।यही सत्यास्मि धर्म ग्रन्थ में विस्तार से वर्णित है।जो स्वामी जी ने संसार के कल्याण को प्रकट किया है।

 

कुण्डलनी जागरण का अगला हिस्सा तीसरे भाग में पढ़ें।

 

” श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज”

“जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः”


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