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हमारे सनातन धर्म में ये कच्छुआ यानि कच्छप अवतार जिसे हम कूर्म अवतार भी कहते है,ये भगवान सत्यनारायण के त्रिदेवावतार यानि 1-ब्रह्मा-2-विष्णु-3-शिव में से विष्णु जी के बाद 10 वें अवतार में से दूसरे अवतार है। जो समुंद्र में जन्में और देवो और दैत्यों के द्धारा समुंद्र मंथन में अपनी पीठ पर महेंद्र पर्वत को धारण करके और मंथन के घर्षण को सहन करके चोदह रत्नों की प्राप्ति में कच्छप अवतार बनकर साहयक हुए थे।तथा और भी अनगिनत अलौकिक धर्म कथाओं से डिवॉन और मनुष्य भक्तों का कल्याण किया है। ये अतिपूज्य भी है।
इन सब कथाओं का उल्लेख निम्न ग्रंथ-भागवत पुराण, शतपथ ब्राह्मण, आदि पर्व, पद्म पुराण, लिंग पुराण में विस्तार से कहा गया है।
जन्मोउत्सव दिवस:-
कच्छप यानि कूर्म अवतार का जन्मोउत्सव यानि कूर्म जयंती को वैशाख की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
कछुए से जुडी मान्यताएं:-
कछुआ पूरी सृष्टि से जुड़ा माना जाता है, जैसे कि-
1-कछुए के चार पैर-1-अर्थ-2-धर्म-3–काम-4-मोक्ष के प्रतीक है।
2-कछुए का मुख-स्वर्ग को और ले जाने वाला द्धार माना जाता है।
3-कछुए की पुंछ-स्वर्ग से धरती की और आने वाला प्रवेश द्धार है।
4-कछुए की पीठ-सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारक करने वाली आधार पीठ मानी गयी है।
5-पीठ पर पड़ी धारियां-ब्रह्माण्ड को नो खण्डों में बांटती है।
6-कछुए की पीठ का रंग हरित प्रकर्ति का प्रतिनिधित्त्व करता है।यानि मनुष्य को सदा जीवन और सुख को देने वाला है।
7-कछुआ सबसे अधिक आयु का जीव माना जाने से इसकी संगत या इसका घर या अंगूठी में इसका चित्रण धारण करने से व्यक्ति की स्वस्थता के साथ आयु भी बढ़ती है।
8-कछुआ शांति और प्रेम की वृति वाला जीव होने से इसके चित्रण को अंगूठी में धारण करने से मनुष्य में शांति और प्रेम की वृति बढ़ती है,जिससे उसे सकारात्मक अनुभव होते है।
9-इस कछुए से दत्तात्रेय भगवान ने 24 गुरुओं में से एक मान कर ये ज्ञान सीखा की-मनुष्य को कछुए के भांति विपदा आने पर अपने खोल में, अपनी सभी इन्दियों को वशीभूत करके छिपा लेनी चाहिए।यानि अपने मन को विषय शून्य बनाकर अपनी आत्मा में लीन होकर समाधिस्थ हो जाना चाहिए।
10-कछुए की पीठ बड़ी सख्त होती है,बड़े से बड़े प्रहार करके भी इसे आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता है,यो मनुष्य युद्ध में कछुए की पीठ को अपनी सुरक्षा के लिए ढाल का उपयोग करता था,यो ये एक प्रकार से मनुष्य को बुरे विचारों से ढाल की तरहां रक्षा कवच बनती है,यो इसका अंगूठी के रूप में सभी तन्त्र मन्त्र यन्त्र के रक्षाकवच के रूप में उपयोग भी है।
वास्तु शास्त्र के उपाय:-
कछुए वाली अंगूठी और उसके चमत्कारिक लाभ:-
लक्ष्मी माता की कृपा वर्षा:-
चांदी की अंगूठी में ही पहने:-
पहनने के नियम:-
क्या सावधानियां रखनी चाहिए:-
विशेष चमत्कारिक उपाय:-
चूँकि कच्छप भगवान का जन्म बैसाख पूर्णिमां के दिन हुआ था और माता लक्ष्मी का भी समुंद्र से जन्म पुर्णिमा के दिन ही हुआ था, यो यदि आप किसी भी पूर्णिमा के दिन ही चांदी की कछुए की अंगूठी सुनार से बनवाये तो कछुए की पीठ पर लक्ष्मी बीज मंत्र “श्रीं” इस प्रकार से लिखाये की-श्रीं की ईं मात्रा बाहर की और रहे यानि ऊँगली के नाख़ून की और रहे,ताकि लक्ष्मी आपकी और आये।और अंगूठी को पंचाम्रत-गाय का दूध+दही+गंगा जल+तुलसी+शहद को एक प्लेट में करके उसमें अंगूठी को भगवान विष्णु जी और लक्ष्मी जी के नीचे दिए मंत्र से जपते हुए प्रत्येक मंत्र को बोलते हुए पंचाम्रत से धोते रहे और तब अंत में स्त्री भी और पुरुष भी अपने सीधे हाथ की मध्यमा ऊँगली में पहन ले।और पंचाम्रत को अपनी तुलसी के पोधे पर चढ़ा दे।वेसे ऐसा प्रत्येक पूर्णिमां के दिन करें,तो आपकी ये कछुए की अंगूठी मंत्र से अभिमन्त्रित होकर विशेष लाभकारी और चमत्कारिक बनकर कल्याण करेगी।मुख्य आस्था अधिक विषय है।
सामान्य दिनों में शुक्रवार को भी ऐसे ही अभिमन्त्रित करके पहनी जा सकती है।
शुक्रवार को कैसे पहने:-
शुक्रवार के दिन ही इस कछुए की अंगूठी को खरीद कर घर लाये और घर लाकर लक्ष्मी जी की तस्वीर या मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाकर इसे केवल दूध और पानी के मिश्रण से धोते हुए,इस महामंत्र का 108 बार जप करें-
ॐ भगवते कुर्मायै ह्रीं नमः
और इसके बाद ऐसे ही धोते हुए ही महा लक्ष्मी जी का महामंत्र जपे-
ॐ श्रीं श्रीं कमले कमलायै प्रसीद प्रसीद श्रीं महालक्ष्मी नमो नमः।।
और जिन्हें इतना बड़ा मन्त्र याद नहीं रहे, तो कोई बात नहीं।वे केवल महालक्ष्मी जी के बीज मंत्र-श्रीं..का ही 108 बार जप करें।
और अब दूध जल से निकाल कर अपने सीधे हाथ की मध्यमा ऊँगली में पहन लें।
-जो अपने गुरु मन्त्र या अपने इष्ट मन्त्र के जपने में विश्वास करते है,वे भक्त इस कछुए की अंगूठी को अपने गुरु और इष्ट के मंत्र से जपते हुए धोते हुए पहने तो और भी अधिक कल्याण होगा।मूल में श्रद्धा ही सभी सकारात्मक लाभों का मुख्य आधार है।
और हमें क्या नहीं करना चाहिए:-
अंगूठी पहनने के बाद इसे बार बार बात करते हुए बेचैनी में घुमाते रहना बिलकुल भी ठीक नहीं है। यदि आप इसे घुमाते रहेंगे तो- उसके साथ कछुए का सिर भी अपनी दिशा बदलता रहेगा जिससे कि इसके पहने के आकर्षण बल से आने वाले धन में भी ऐसे बदलाव के साथ रुकावट आती रहेगी और सम्भव है होता होता काम भी बिगड़ जायेगा।यो बिलकुल भी व्यर्थ में नहीं घुमाया करें।
यदि किसी कारण जैसे- शौच या नहाने या आटा गूँथने आदि के कारण उतारनी भी पड जाये,तो उतार कर अपने पूजाघर में रख दे और अपने काम से निपटने के उपरांत स्नान करके या हाथ धोकर फिर से लक्ष्मी जी के चित्र या मूर्ति को छुलाकर पहने ले।
किन राशियों वालो को कछुए की अंगूठी पहननी नहीं चाहिए:-
परन्तु ऐसा कोई विशेष कारण पता नहीं चला है की-मेष,कन्या,वृश्चिक और मीन राशि की कछुए से क्या वैर है या अन्य राशियों से मित्रता है,बल्कि इन राशियों को सोने में कछुए की अंगूठी शुभ रही है,चांदी की विशेष लाभकारी नहीं रही है।
और मछली की आकृति से बनी चांदी या सोने की अंगूठी यानि मछली की अंगूठी शुभ रही है,क्योकि ये राशि भगवान सत्यनारायण के मध्य अवतार श्री विष्णु जी के मत्स्य अवतार के अधीन राशियाँ है,जिस पर अन्य लेख मछली की अंगूठी के चमत्कारिक लाभ विषय में कहूँगा।यो सब कछुए की अंगूठी पहन सकते है,बस सही से बनवाकर सही विधि और मन्त्र उच्चारण से जपते हुए श्रद्धापूर्वक पहने,तो सर्वत्र लाभ होता है।
“श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज”
“जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः”
“इस लेख को अधिक से अधिक अपने परिचितों पर शेयर करके धर्म सहित पूण्य लाभ कमाएं”
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Namaskar ji meri rashi mean hai or Maine galti she kachuye ki angithi pehen li iska koi upay h