
आज देश जिस दिशा में जा रहा है इसको देखकर लग रहा है कि लोगों की आत्माएं मर चुकी हैं उनके अंदर का इंसान मर चुका है। सरकार अथक प्रयास कर रही है लेकिन उसकी भी राजनीतिक मजबूरियां हैं। लोगों ने अपने आपको पढ़ाया है लेकिन वो अपने दिमाग को शिक्षित करने में असफल रहे हैं।
बिहार, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, केरल हिमाचल प्रदेश, असम, बंगाल, जम्मू कश्मीर आदि प्रदेश जहाँ आये दिन जाहिल अपने जाहिलपन का उदाहरण देते रहते हैं। महिलाएं बच्चियां इन प्रदेशों में कठपुतलियां हैं जिसका मन आया खेल लिया अच्छा नहीं लगा तो उसको तोड़ दिया। कानून व्यवस्था ना जाने कहाँ हवा हो चुकी है और अगर ज़रा आवाज उठाई तो लोग डंडे लेकर आपके खिलाफ हो जाते हैं कहते हैं आप सरकार को बदनाम कर रहे हैं, हिंदुत्व को बदनाम कर रहे हैं, आप 70 साल से सो रहे थे, आपका जमीर तब कहाँ था, आप देश द्रोही हैं फलाँ फलाँ।
सबसे पहले तो उन अनपढ़ गंवार जाहिलों से कहना चाहूंगा कि अभी मामला आपके घर का नहीं है, लेकिन ज़रा पूंछो अपने घर की महिलाओं से कि वो आप सबके बीच अपने को कितना सुरक्षित महसूस करती है? क्या आपको आपके आस पास की घटनाएं देखकर अपनी असुरक्षा का एहसास नहीं होता? उस पडोसी के लुटते घर को नहीं देखा? उस जिन्दा जलायी बच्ची को नहीं देखा? दहेज़ के नाम पर जिन्दा जल रही उस महिला की चीख आपके कानों में नहीं पड़ीं? अस्मत लूटने के बाद जिन्दा जलायी महिला नहीं दिखी? एसिड से तड़पती उस मासूम का दर्द महसूस नहीं किया? सड़क पर इज्जत बचाने की गुहार लगाती महिलाओं की चीखें आपके कानों में नहीं पड़ीं? अपने जीवन भर की कमाई को बचाने के लिए जद्दोजहद में जान गंवाते उस इंसान को नहीं सुना?
हाँ वाकई नहीं सुना! सच में आपने कुछ नहीं सुना, जब किसी इंसान के अंदर की आत्मा पूरी तरह से मर चुकी हो तो वो सुन कैसे सकता है। वो वही हैं ना जो कहते हैं, साली कम कपडे पहनती थी जो हुआ अच्छा हुआ, वो उड़ बहुत ज्यादा रही थी बहुत अच्छा हुआ, बड़ी मटक मटक कर चलती थी सही हुआ उसके साथ, बड़ा मेकअप करके उड़ती थी चेहरा ही उड़ा दिया अच्छा हुआ, बड़ा माल कमाया था अच्छा हुआ, साला दलित था मर गया धरती का बोझ कम हो गया, मुसलमान तो ख़त्म ही हो जाने चाहिए सालों ने पाप बढ़ा रखा है। 70 सालों से तुम्हे नहीं दिखा अब सवाल उठा रहे हो देश द्रोही, 70 साल से देश लुट रहा था तब कहाँ थे बड़े मैजे ले रहे थे।
जी यही सब जबाव आपको मिलते हैं, आप सवाल करिये, सिस्टम के ख़िलाफ़ आवाज उठाइये वो आपके खिलाफ़ हो जायेंगे।
उन्हें कुछ नहीं दिखता ना किसी की चीख पुकार सुनाई देती है ना किसी का दर्द महसूस होता। वो इतने नशे में हैं कि जब खुद का घर लुट रहा हो तो शायद उन्हें तब भी ना दिखे।

क्या गलती थी उस मासूम की, वो तो महज़ 12 साल की थी, उसकी अस्मत को लूटकर उसे जिंदा जला दिया, क्या गलती थी उस 7 साल की मासूम की 4 मानसिक रोगिये ने उसकी अस्मत लूटकर उसका सर कुचल दिया और नाले में फेंक दिया। क्या गलती थी उस मासूम की उसने सिर्फ पीछा करने से मना किया था, उसकी पसंद को ठुकरा दिया था बस इतनी उन 4 मानसिक रोगियों ने उसकी अस्मत तो लूटी ही उसके शरीर में वो जख़्म दिए जिन्हें देखने के बाद शायद आपके होश उड़ जाएँ।
लेकिन इस देश में महिला होना ही सबसे बड़ा अपराध है, इस देश में सवाल उठाना ही सबसे बड़ी गलती है, इस देश में सिस्टम के खिलाफ लड़ना ही सबसे बड़ी गलती है।
तो आखिर गलती का सुधार कैसे हो?
हमारा परिवार सुरक्षित कैसे हो.. किससे सवाल करें? कहाँ जाएँ।
या तब तक इंतजार करें जब तक कि उन लोगों के घर ना लुट जाएँ जो आपको सवाल करने से रोकते हैं, उनके ख़त्म होने का इंतजार करें, उनकी बहू बेटियों की इज्ज़त लुटने तक इन्तजार करें? आखिर कब तक इन्तजार करें?
सवाल पहले भी सिस्टम के खिलाफ़ उठते थे, अब भी उठ रहे हैं और सिस्टम के खिलाफ़ सवाल नहीं उठते तो सरकारें नहीं बदलतीं। याद रखिए सरकारें तभी बदलती हैं जब सवाल उठते हैं। अति हर चीज की बुरी होती है, अति से ज्यादा चापलूसी बुरी होती है और अंजाम ख़तरनाक।
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मनीष कुमार
+919654969006
manish@khabar24.co.in
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बहुत ही सुन्दर मनीष भाई। आपका ये आर्टिकल समाज के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है। आपने सारी सच्चाई बयान कर दी है। आज देश में आवाज को दबाया जाता है। आप आवाज उठाते ही देशद्रोही, गद्दार, वामपंथी, मुस्लिम ना जाने क्या क्या बन जाते हैं।
यह सत्तर साल का बोझ है। सडांध है इसमे। हानिकारक है। तभी तो अदालती आदेश के बावजूद किसी को अपराधी न कहकर उसे गरीबों का नेता ही कहा जाता है। यह दिमागी खोखलापन नहीं है , यह सब उस षडयंत्र का हिस्सा है जिसके लोग अभ्यस्त हो चुके हैं। बात तो एक अवस्था से दूसरी अवस्था में आने की है। प्रतिरोध होगा और वह भी कानून की कीमत पर जो साहस को तोड़ने वाला भी साबित हो सकता है लेकिन होगा नहीं। इसकी एक बड़ी वजह है। भारतीय राजनीति में आजतक मनोवैज्ञानिक पक्ष की अवहेलना तो की ही गई, तोड़-मरोड़ कर उसे राजनीतिक रूप दे दिया गया और वह लोगों को सच्चाई से दूर भी करता रहा। लेकिन अब तो समय बदल रहा है। संरक्षण और तुष्टीकरण को न सिर्फ तिरस्कार मिल रहा है बल्कि ऐसी ताकतें खुद भी कमजोर होने का संकेत देने लगी हैं। लेकिन यह सिर्फ शुरूआत है और काफी चैकस तथा सावधान रहने की जरूरत है।