कहते हैं कि रुद्राक्ष की अनेकों विशेषताएँ हैं, अगर असली रुद्राक्ष राशि के मुताबिक कर्मकांडों के साथ पहनते हैं तो जीवन में वो सब मिल जाता है जिसके सफल होने की कभी कल्पना तक नहीं की होती है।
जैसा कि आपको बताया कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शंकर की आँखों के जलबिंदु से हुई है। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। रुद्राक्ष शिव का वरदान है, जो संसार के भौतिक दु:खों को दूर करने के लिए प्रभु शंकर ने प्रकट किया है।
एकमुखी रुद्राक्ष भगवान शिव, द्विमुखी श्री गौरी-शंकर, त्रिमुखी तेजोमय अग्नि, चतुर्थमुखी श्री पंचदेव, पन्चमुखी सर्वदेव्मयी, षष्ठमुखी भगवान कार्तिकेय, सप्तमुखी प्रभु अनंत, अष्टमुखी भगवान श्री गेणश, नवममुखी भगवती देवी दुर्गा, दसमुखी श्री हरि विष्णु, तेरहमुखी श्री इंद्र तथा चौदहमुखी स्वयं हनुमानजी का रूप माना जाता है। इसके अलावा श्री गणेश व गौरी-शंकर नाम के रुद्राक्ष भी होते हैं। रूद्राक्ष प्रत्येक हिन्दू को पहनना चाहिए
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-रूद्र वैदिक देवता है यानि सबसे पहले वेदों में वर्णित पूज्य देव और इन्हीं का कुण्डलिनी जागरण का मूलाधार चक्र चित्र शिवलिंग है,यो ये रूद्र का मूलाधार चक्र में स्थापित वीर्य बीज का जागरण ही रुद्राक्ष का रुद्राभिषेक कहलाता है,जब कुण्डलिनी जागरण होता है और रूद्र यानि पुरुष का बीज रुद्राक्ष में प्रस्फुटन से लेकर नवीन सृष्टि होती है,तब तक के चौदह से सोलह कला या चक्र तक जो ऊर्जा का परस्पर वक्री गति होती है,तब ऊर्जा एक तांड़व नृत्य करती उठती है,जिसमें सप्त नाँद से लेकर अलख आनन्द घोष आदि कलाओं का विस्तार ही रूद्र का तांडव नृत्य है।यो वेदों का रूद्र देव वाल्मीकि की रामायण और महाभारत तक आते आते शिव बन गए और पूज्य हुए।
ये वेसे पुरुष साधना ही है।फिर भी प्रत्येक मूल बीज में स्त्री शक्ति (+) और पुरुष शक्ति(-) का प्रेम संयोग सुप्त होता है, जो कोई भी स्त्री या पुरुष कर सकता है,पर पुरुष को ये सभी रुद्राक्ष उपयोगी है,पर स्त्री को केवल -2-6-8-9-11-और 14 तथा-इनमें तीन बीज मूल बीज ही है-3-5-7 रुद्राक्ष,इन्हें बड़ी विकट गुप्त गुरु ज्ञान साधना से ही जाग्रत किया जा सकता है।और 1-4–8-9-11- और 13 व् 14 पुरुष के लिए है।ये रूद्र विज्ञानं है।
यो इसे मंत्र जप और ध्यान की विधि से जाग्रत करना पड़ता है और यही है-रुद्राभिषेक का अनुष्ठान..जो जाने वहीं इसे या इससे रूद्र की अद्धभुत शक्तियां प्राप्त करके अजेय और अमर बन सकता है,यानि यथार्थ योगी..
रुद्राक्ष के अनेक अर्थ में से दो अर्थ मुख्य है-1-रूद्र का आक्षय यानि रूद्र का आंशु और-2-रूद्र का अक्षय यानि अक्षय रूद्र,जो रूद्र कभी समाप्त नहीं होता है यानि अक्षय रूद्र शाश्वत रूद्र।और ये ही उपयुक्त अर्थ है।इस अर्थ में रूद्र के बीज यानि वीर्य से उत्पन्न रुद्राक्ष और उसके प्राकृतिक स्वरूप रुद्राक्ष वृक्ष है,यो ये बीज स्वरूप रुद्राक्ष सदा लम्बे समय या अनगिनत वर्षो तक यो ही बने रहते है,इनकी इसी अमरता के कारण इन पर किये गए मंत्र जप भी साधक को अमरता की और ले जाते है और इनमें अक्षय फल या परिणाम देने में सामर्थ्य होती है।
रुद्राक्ष को साक्षात महादेव का प्रतीक स्वरूप माना गया है. शरीर पर रुद्राक्ष और मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड धारण करने वाला मनुष्य रूपी चांडाल भी संसार सबके द्वारा पूज्य हो जाता है,ऐसा शिवपुराण में वर्णित है और रुद्राक्ष के प्रकार, उसे धारण करने का मंत्र स्वयं शिवजी ने बताये है।
*-रुद्राक्ष की उत्पत्ति को लेकर एक पौराणिक कथा आती है:-*
कहते हैं रूद्र से मिलने एक बार देवतागण आए।उस समय वे असुरों के अत्याचार से त्रस्त थे और मारे-मारे फिर रहे थे।रूद्र यानि महादेव ने सारी बात सुनी और ध्यान लगाया।उन्हें देवताओं की जो स्थिति दिखी उससे द्रवित हो गए। महादेव को इस बात का दुख था कि- असुरों में देवों को सताने और हानि करने की शक्ति स्वयं उन्हीं के वरदान से ही आ गई है।इस चिंतन से रूद्र द्रवित हुए तो- उनकी आंखों से जल की बूंद धरती पर गिरी।जिसे ब्रह्माजी ने तुरन्त उसे संभालकर अपने कमंडलु में रख लिया।उस दिन चौदस का दिन था,यो रुद्राक्ष चौदह प्रकार के बने और उससे आगामी दिन पूर्णिमाँ थी,चूँकि पंद्रहवी कला शिव और सोलहवी कला उनकी शक्ति मिलकर इन चौदह रुद्राक्षों में अंश रूप समाहित है,यो जो भक्त चौदस या पूर्णिमासी के दिन जो रुद्राक्ष को अभिमन्त्रित करके पहनता है,उस पर शिव शक्ति की पूर्णिमां कृपा सदा बनी रहती है,औरतब यह देखकर शिवजी को बड़ी प्रसन्नता हुई कि- ब्रह्माजी ने उनके आंखों से बहे जल का इतना मान किया। शिवजी ने कहा कि- इस बीज से निकले फल को मेरे समान ही समझना। रूद्र के अक्ष या अक्षय रूद्र यानी आंखों से उपजे होने के कारण ब्रह्मा ने इसे रुद्राक्ष कहा।और इस अंशु को उन्होंने अपने हाथ में लेकर हिमालय क्षेत्र में छिड़क दिया,उससे तुरन्त अनेक रुद्राक्ष के वृक्ष बन गए और तब से अब तक उन्हीं वृक्षों की श्रंखला चली आ रही है।
*-रुद्राक्ष में जो फल लगता है उसे खाया नहीं जाता, क्योंकि वह रूद्रस्वरूप है, उसे सुखाकर उससे ही रुद्राक्ष बनता है।
*-रुद्राक्ष को विधि-विधान से धारण करने वाले व्यक्ति के साथ शिवजी का अंश रुद्राक्ष में बस कर सदा उसके किये जप से बढ़ता हुआ,उसकी सभी प्रकार से रक्षा करता सभी सुख और एश्वर्य प्रदान करने में साहयक होता है।
*-रूद्राक्ष को धारण करने के कुछ नियम बताए गए हैं:-*
*-शिवपुराण में स्वयं शिवजी पार्वतीजी को रुद्राक्ष के बारे में बताते हैं:-*
भगवती पार्वतीजी ने शिव जी से रुद्राक्ष का परिचय देने को कहा-तो शिवजी ने रुद्राक्ष के तेरह प्रकारों का परिचय देते हुए इस प्रकार से कहा है की:-
*”रुद्राक्षाः विविधाः प्रोक्तास्तेषां भेदान् वदाम्यहम्। शृणु पार्वति सद् भक्तया भुक्तिमुक्तिफलप्रदान्।।”*
*-रुद्राक्ष के चौदह भेद है:-*
*-एकमुखी यानि प्रथम रूद्र अश्रु होने से इसको साक्षात शिव का रूप समझना चाहिए। उसके तो दर्शन होने मात्र से ही सभी दरिद्रताओं का नाश होकर चतुर्थ धर्मों-अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष सुलभ होता है।जिसकी जन्मकुंडली में प्रथम घर में कालसर्प दोष हो या ग्रहण दोष बना होने से शुभ फल नहीं मिलते हो,तो उसे ये एकमुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।जिसकी जन्मतिथि-1-10-19-28 हो वो मनुष्य इसे रविवार की प्रातः अभिमन्त्रित कर सोने में जड़वाकर अवश्य पहने।ये माणिक्य से भी अधिक शुभ फल देगा।
*-मेष राशि को:- एक या तीन मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
*-द्विमुखी का नाम देवदेवेश है, जिसके धारण करने से सभी देवताओं की कृपा और उनके समस्त साधन सुलभ हो जाते हैं।
और जिसकी जन्मकुंडली में दूसरे घर में कालसर्प या ग्रहण दोष यानि एक दूसरे के शत्रु ग्रहों का मेल हो,भाई कुटुंब से विरोधो का निरन्तर सामना करना पड़ता हो,तोउसे ये रुद्राक्ष पहनना चाहिए।जिसकी जन्मतिथि-2-11-20-29 हो वो सोमवार को अभिमन्त्रित कर अवश्य पहने।ये गजमुक्त और सच्चे मोती से अधिक शक्तिशाली है।
*-वृष राशि को:-छः मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
*-त्रिमुखी रुद्राक्ष त्रिदेवों और त्रिदेवीयों का बीज स्वरूप है,उसपर जप करके पहनने से मनुष्य के त्रिगुणों-तम् रज सत की शुद्धि होकर मनवांछित कृपा प्राप्त होती है।दर्गासप्तसति का जो पाठ करते हो,उन्हें ये रुद्राक्ष अवश्य पहनना चाहिए।इस पर ऐं-ह्रीं-क्लीं जप जपने से त्रिदेवी की सिद्धि प्राप्त होगी।जिसकी जन्मतिथि-3-12-21-30 हो वो गुरुवार को अभिमन्त्रित कर अवश्य पहने।ये पुखराज से भी शुभ है।इसे सोने में पहने।
*-मिथुन राशि को:- तीन-पाँच या तेरह मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
*-चतुर्मुखी रुद्राक्ष को ब्रह्माजी का प्रतीक समझना चाहिए और चारों वेदों के ज्ञान को समझने अपनाने की शक्ति भक्ति की प्राप्ति होती है और जिसके दर्शन से चौतरफा फल की प्राप्ति होती है।यो गायत्री मन्त्र के चार पहर जप करने वाले को ये रुद्राक्ष पहनना चाहिए।और जिसका 4-13-22-31 जन्म तिथि या अंक हो वह शनिवार या रविवार को अभिमन्त्रित कर अवश्य पहने।राहु का प्रभाव समाप्त होगा।ये गोमेद से अधिक लाभकारी है।इसे चांदी में पहने।
*-कर्क राशि को:- दो मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
*-पंचमुखी रुद्राक्ष का नाम कालाग्नि है, जो पंचमुखी शिव के द्धारा उत्पन्न पंचतत्वों की शक्ति का बीज स्वरूप है।यो उस साधक को जप द्धारा पंचतत्व पर अधिकार होता है।जिसकी जन्मतिथि-5-14-23-हो वो बुधवार को अभिमन्त्रित कर अवश्य पहने।ये शुद्ध महंगे पन्ने से ही शक्तिशाली फल देता है।इसे सोने में पहने।
*-सिंह राशि को:- बारह मुखी रुद्राक्ष शुभ है।
*-षड्मुखी यानि छः मुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय जी का प्रतीक है और इसे दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए।ये षट्कोण यन्त्र की सिद्धि देता है।और जिसकी जन्मतिथि-6-15-24-हो वो शुकवार को इसे मंत्रित कर अवश्य पहने।ये हीरे से भी उच्चतम फल देता है।इसे चांदी में पहने।
*-कन्या राशि को:-दो या तीन मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
*-सप्तमुखी रुद्राक्ष का नाम अनंगी है और यह कामदाहक शिव का प्रतीक है।और इस पर साधक के जप तप करने से सातों चक्रों के जागरण की शक्ति मिलती है।जिसकी जन्मतिथि-7-16-25-हो वो गुरुवार को इसे अभिमन्त्रित कर पहने।ये पुखराज से उत्तम प्रभाव देगा।केतु ग्रह की सभी अशुभता को काटकर शुभता देगा और लहसुनियां से उत्तम है।इसे चांदी या सोने में पहन सकते है।
*-तुला राशि को:- छः या आठ मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
*-अष्टमुखी का नाम वसुमूर्ति है और यह भैरवजी का प्रतीक है।इस रुद्राक्ष पर शिव के भैरव रूप के मन्त्र का जप करने से भैरव की सिद्धि और कृपा मिलती है।जिसकी जन्मतिथि-8-17-26-हो वो शनिवार को इसे अभिमन्त्रित कर पहने।ये शनिदेव का प्रिय रुद्राक्ष है।और नीलम से भी अधिक प्रभावी है।
*-वृश्चिक राशि को:- सात मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
*-नवमुखी रुद्राक्ष पर जो साधक नवग्रह या किसी भी एक गृह का जप करता है उसे उस ग्रह सहित नवग्रहों का संयुक्त कृपा फल मिलता है,मुख्य तोर पर ये मंगल ग्रह की शक्ति और कृपा दाता है,यो मंगली को ये रुद्राक्ष धारण करना चाहिए और ये ऋषियों में श्रेष्ठ कपिलमुनि का भी प्रतीक है।जिसकी जन्मतिथि-9-18-27-है वो मंगलवार को अभिमन्त्रित कर पहने।ये मूंगे से उत्तम फल देता है।
*-धनु राशि को:-तीन और बारह मुखी पहनना शुभ होता है।
*-दसमुखी रुद्राक्ष स्वयं भगवान नारायण का प्रतीक है।और दस महाविद्याओं का भी संयुक्त शक्ति भक्ति का बीज रूप है,यो जो भक्त दस महाविद्या में से किसी भी विद्या की साधना करना चाहता है,वह इस पर जप तप करते हुए धारण कर सिद्धि पा सकता है।जिसकी जन्मतिथि-10 है वो इसे अभीमंत्रित कर पहने।ये माणिक्य से उत्तम फल देगा।
*-मकर राशि को:-पाँच मुखी या आठ मुखी रुद्राक्ष शुभ है।
*-एकादशमुखी भगवान रूद्र का प्रतीक है और ग्यारह मुखी हनुमान जी की भी जप से कृपा सिद्धि प्राप्त कर सकता है।एकादशी का व्रत रखने वाले भक्तों को ये रुद्राक्ष अति शुभ लाभ और एकादशी व्रत का सम्पूर्ण फल प्रदान करता है।जिसकी जन्मतिथि-11 है वो इसे अभिमन्त्रित कर पहने।ये चन्द्र की ग्यारहवी कला की शक्ति कृपा देगा।और मोती ओपल से उत्तम सिद्ध होगा।
*-कुम्भ राशि को:-छः या आठ मुखी रुद्राक्ष पहनना शुभ है।
*-द्वादशमुखी यानी बारह मुख वाला रुद्राक्ष भगवान सूर्य का प्रतीक है,और जिसकी जन्मकुंडली में अनगिनत दोष भरे पड़े हो,इस रुद्राक्ष को द्धादशी के दिन पहने से ये दोष शांत होकर शुभ फल देते है।जिसकी जन्मतिथि 12 है वह अभिमंत्री कर इसे पहने।ये बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के सामना ही शुभ कृपा फल देगा।
*-मीन राशि को:- तीन या छः और 12 मुखी रुद्राक्ष पहनना शुभ है।
*-त्रयोदशमुखी यानी 13 मुख वाला विश्वदेव का प्रतीक है और त्रयोदशी का व्रत रखने वाले को भी उस व्रत का शुभ फल दिलाने में पूर्ण साहयता करता है।13 जन्मतिथि वाले इसे अवश्य अभिमन्त्रित कर पहने।13 की संख्या बड़ी शक्तिशाली होती है यानि जीवन में आर या पार का फैसला देती है।
*-चतुर्दशमुखी यानी चौदह मुखी परमशिव का प्रतीक है,जो चौदस का व्रत रखते है,उन्हें उस व्रत के साथ साथ ये रुद्राक्ष भी धारण करना चाहिए,तो चौदस का सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा।14 तारीख को जन्में लोग इसे अभिमन्त्रित कर सोने या चांदी में अवश्य पहने तो उन्हें चौदहवीं के चाँद सा खूबसूरत और गुणवान जीवन साथी मिलता है सभी कल्याणकारी लाभ प्राप्त होंगे।
*-तब शिवजी बोले- देवी रुद्राक्ष को साक्षात मेरा अंश समझो। इसे विधि-विधान से धारण करना चाहिए।
*-महादेवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से रुद्राक्ष धारण करने के विधि-विधान के बारे में विस्तार से पूछा, जो शिवपुराण, लिंगमहापुराण, कालिकापुराण, महाकाल संहिता, मन्त्रमहार्णव, निर्णय सिन्धु, बृहज्जाबालोपनिषद् में वर्णित है की- रुद्राक्ष के धारण करने संबंधी विधि-विधानों की विस्तृत ज्ञान कर्म चर्चा है।और स्मरण रहे की-रुद्राक्ष को तब तक रूद्र का स्वरूप नहीं मानना जा सकता है की- जब तक उसे मंत्र विधि सिद्ध न कर लिया जाए। सिद्ध करने के बाद ही रुद्राक्ष फलदायी होता है। इसे ही रुद्राक्ष की प्राण-प्रतिष्ठा भी कहा जाता है।
*-कैसे होती है रुद्राक्ष की प्राण-प्रतिष्ठा:-*
चौदस या पूर्णमासी ही मुख्य दिन रुद्राक्ष की प्राण प्रतिष्ठा को सर्वश्रेष्ठ होते है।
और ऐसा ही प्रत्येक चौदस या पूर्णिमा या अपने रुद्राक्ष के प्रकार के अनुसार तिथि को ठीक यही पंचाम्रत से जप ध्यान करते पहनना होता है।और पंचाम्रत को शिवलिंग या तुलसी में चढ़ा दे।ऐसा करते रहने से आपके रुद्राक्ष में अतुलित शक्ति और वरदायी शक्ति भरती जाती है,जो आपको जब भी जरूरत होगी,स्वयं बिन कहे प्राप्त होगी।यो किसी पण्डित के ये कहने पर की नहीं नहीं ऐसा सामान्य उपाय से आपका रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित नही होता है,तो उसकी धनलोभि कथा नहीं सुनो।बस जो बताया उसे करो और चमत्कार देखों।हाँ पण्डित या मन्दिर में आप इस अनुष्ठान के बाद अवश्य जो बने अधिक दान दे सकते है।यो केवल करो।
*-एक कटोरी में पंचाम्रत-दूध-दही-गंगाजल-तुलसी-गाय का घी मिलाकर बनाकर उसमें अपना जो भी रुद्राक्ष है उसे रख दे और अब उसे देखे और आँख बन्द करते हुए उस रुद्राक्ष को ही स्मरण करते हुए महामृत्युंजय मन्त्र अथवा ॐ नमः शिवाय या अपने गुरु मन्त्र या इष्ट मन्त्र का अधिक से अधिक जप करें और जब भी आँखे खोले तब केवल उसी रुद्राक्ष को ही देखे, तो आपके जप की मंत्रशक्ति उस रुद्राक्ष में समाहित हो कर उसे जाग्रत करेगी।चूँकि रुद्राक्ष केवल रूद्र का बीज है,उसे उनके या इष्ट या गुरु मन्त्र के जप और रुद्राक्ष का ही ध्यान करके चैतन्य यानि जाग्रत करना पड़ता है,जैसे-कोई भी बीज हो,उसे भूमि में मौसम के अनुसार खाद पानी आदि देते हुए सिंचित किया जाता है और उसे तब तक रखना या देखभाल करनी पड़ती है,जबतक की वो फल देने की अवस्था में नहीं आ जाये।ठीक ऐसे ही अपने राशि या अंक के रुद्राक्ष को बीज से अपनी भूमि यानि ह्रदय में अंकुरित करते हुए उसे पेड़ बनाना पड़ता है।तब वो फल देगा यही रुद्राक्ष या अन्य मंत्रादि की प्राणप्रतिष्ठा करना कहलाती है।यो ऐसा करके उसे गले में ह्रदय तक लाल या पीली डोरी या अपनी जप माला के अंत में पिरो कर पहना जाता है।तब ह्रदय में जप से उसे शक्ति मिलती रहती है या यो कहें की-रुद्राक्ष से ह्रदय में भाव शक्ति मिलती है।
और ऐसा ही प्रत्येक चौदस या पूर्णिमा या अपने रुद्राक्ष के प्रकार के अनुसार तिथि को ठीक यही पंचाम्रत से जप ध्यान करते पहनना होता है।और पंचाम्रत को शिवलिंग या तुलसी में चढ़ा दे।ऐसा करते रहने से आपके रुद्राक्ष में अतुलित शक्ति और वरदायी शक्ति भरती जाती है,जो आपको जब भी जरूरत होगी,स्वयं बिन कहे प्राप्त होगी।यो किसी पण्डित के ये कहने पर की नहीं नहीं ऐसा सामान्य उपाय से आपका रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित नही होता है,तो उसकी धनलोभि कथा नहीं सुनो।बस जो बताया उसे करो और चमत्कार देखों।हाँ पण्डित या मन्दिर में आप इस अनुष्ठान के बाद अवश्य जो बने अधिक दान दे सकते है।यो केवल करो।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी श्री सत्येन्द्र जी माहारज की तरफ से यह ज्ञान निशुल्क दिया जा रहा है यदि आप सत्यास्मि मिशन का हिस्सा बनना चाहते हैं श्री सत्यसिद्ध शानिपीठ से जुड़ना एवं दान करना चाहते हैं। या शनिवार को होने वाले भंडारे, विशेष पूजा में योगदान करना चाहते हैं तो यहाँ दान कर सकते हैं…।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी माहारज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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