
राजस्थान के अलवर जिले से सामने आया एक ऐसा मामला, जिसने पूरे प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में चिंता और सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिक्षा और परवरिश का नाम लेकर बच्चों को कैद कर उनका धर्म बदलवाने का रैकेट उजागर हुआ है। यह कोई एक शहर का मामला नहीं, बल्कि संगठित नेटवर्क का हिस्सा है, जो करोड़ों की फंडिंग, छद्म शिक्षा संस्थानों, धार्मिक प्रशिक्षण और मानसिक प्रभाव के माध्यम से मासूम बच्चों को निशाना बना रहा है।
हॉस्टल की दीवारों के पीछे छिपी सच्चाई
अलवर के एमआईए थाना क्षेत्र की सैय्यद कॉलोनी में स्थित एक ईसाई मिशनरी हॉस्टल बाहर से साधारण दिखता है, लेकिन अंदर की कहानी भयावह है।
पुलिस की छापेमारी में सामने आया कि यहां 60 से अधिक बच्चों को रखा जाता था। उन्हें सरकारी स्कूलों में दाखिला देकर दिखावा किया जाता था, लेकिन वापस हॉस्टल लौटते ही उनकी पहचान बदल दी जाती थी।
ब्रेनवॉश का सुनियोजित तरीका
पुलिस जांच में पता चला कि बच्चों को प्रतिदिन धार्मिक ग्रंथ पढ़ाए जाते थे, विशेष प्रार्थना कराई जाती थी और सप्ताह में एक बार उनके माता-पिता को बुलाकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता था। बच्चों को बताया जाता था – “तुम्हारा असली धर्म गलत है, इस रास्ते पर चलोगे तो नरक में जलोगे।” यह मानसिक दबाव और डर पैदा कर उनका मन बदलने की कोशिश की जाती थी।
नेटवर्क की जड़ें चेन्नई से बेंगलुरु तक
जांच में पता चला कि यह मामला किसी स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। इसका संचालन चेन्नई के धर्मगुरु सेल्वा और एफएमबीपी नामक संस्था के माध्यम से किया जाता है। बच्चों का ब्रेनवॉश करने की ट्रेनिंग, फंडिंग और रणनीति चेन्नई से भेजी जाती थी। गुजरात, बीकानेर, श्रीगंगानगर, अनूपगढ़, सीकर जैसे जिलों में भी इसकी सक्रियता रही है। आरोपियों में अमृत सिंह और बोध अमृत सिंह शामिल हैं, जिनकी गिरफ्तारी के बाद कई और खुलासे हुए हैं। अमृत सिंह पहले गरासिया समुदाय से था, बाद में स्वयं धर्म परिवर्तन कर नेटवर्क से जुड़ गया।
पैसों का लालच और मानसिक नियंत्रण
पुलिस को आरोपियों से बैंक ट्रांजैक्शन की जानकारी मिली है, जिससे स्पष्ट होता है कि बच्चों के माता-पिता को पैसों का लालच दिया जाता था। गरीब परिवारों को झूठे वादे कर फंसाया जाता था। विहिप का आरोप है कि बच्चों के मन में हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ नफरत भरने का प्रयास किया जा रहा था और उन्हें स्लीपर सेल के रूप में तैयार किया जा रहा था।
राजस्थान में विधायी पहल और बढ़ते सवाल
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब राजस्थान सरकार ने धर्मांतरण रोकने के लिए कड़ा विधेयक विधानसभा में पेश किया है। इसमें आजीवन कारावास जैसे प्रावधानों का प्रस्ताव है। सवाल उठता है कि इस नेटवर्क को किसकी शह प्राप्त थी? क्या इसमें स्थानीय नेताओं, समाज के प्रभावशाली लोगों या विदेश से आने वाले धन की भूमिका है? क्या बच्चों की सुरक्षा और मानसिक विकास पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है?
मासूमों की सुरक्षा – हमारी जिम्मेदारी
यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि बच्चों को शिक्षा और संरक्षण का अधिकार दिया गया है, लेकिन अगर वही अधिकार उनका नुकसान करने के लिए इस्तेमाल हो तो समाज, प्रशासन और कानून को कितनी तत्परता से हस्तक्षेप करना चाहिए। क्या हमें ऐसे छद्म संस्थानों की पहचान कर सख्त कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? क्या मानसिक ब्रेनवॉश को रोकने के लिए विशेष निगरानी तंत्र की आवश्यकता नहीं है?
आगे क्या?
पुलिस चेन्नई की संस्था एफएमबीपी की भूमिका की जांच कर रही है। बैंक ट्रांजैक्शन, डिजिटल सामग्री, प्रशिक्षण केंद्र और नेटवर्क की जड़ें खंगाली जा रही हैं। यह मामला एक चेतावनी है कि धार्मिक आड़ में समाज को विभाजित करने की कोशिशें किस हद तक जा सकती हैं। सामाजिक संरचना में तलाशे जाने वाले इन गुंजलक तत्वों की पहचान और उनका पर्दाफाश अत्यंत जरूरी हो गया है, ताकि हम एक अधिक समरस और सुरक्षित समुदाय की ओर बढ़ सकें। सवाल यह भी है – क्या हमारे बच्चे सुरक्षित हैं? क्या हर माता-पिता अपने बच्चों को सच में सुरक्षित माहौल में शिक्षा दिला पा रहे हैं? इस संदर्भ में, यह आवश्यक है कि हम एक सजग और सक्रिय समुदाय का निर्माण करें जो बच्चों की सुरक्षा और उनकी शिक्षा को प्राथमिकता देता है, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याओं का पुनरावृत्ति न हो।
ब्यूरो रिपोर्ट : जगदीश तेली, अलवर, राजस्थान
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