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PM Modi 17 September को देंगे इस्तीफा? Mohan Bhagwat की मानेंगे बात

खबर 24 एक्सप्रेस स्पेशल रिपोर्ट : “75 पार तो रिटायरमेंट तय! अब क्या मोदी भी मानेंगे संघ का इशारा?”

“जब दूसरों को नियम से हटाया गया,
तो अब खुद पर भी लागू होंगे वही नियम?
क्या मोदी लाएंगे कोई उत्तराधिकारी
या रचेंगे कोई नया अपवाद?”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के एक हालिया बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर भूचाल ला दिया है। उन्होंने सार्वजनिक मंच से स्पष्ट कहा—“समाज अपने आप इशारा करता है कि 75 की उम्र के बाद पद छोड़ देना चाहिए।”

अब इस बयान का वज़न समझना हो तो पीएम नरेंद्र मोदी की उम्र पर गौर कीजिए—17 सितंबर 2025 को वे पूरे 75 साल के हो जाएंगे।
और यहीं से सवाल उठता है जो भाजपा और RSS के गलियारों में गूंजने लगा है—“क्या अब मोदी खुद हटेंगे?”

भाजपा का इतिहास क्या कहता है?

ये कोई पहली बार नहीं जब उम्र को लेकर भाजपा में बहस छिड़ी हो। खुद भाजपा ने “75 पार = रिटायरमेंट” का एक अनकहा लेकिन ठोस नियम अपनाया है।
यही कारण रहा कि—

  • लालकृष्ण आडवाणी
  • मुरली मनोहर जोशी
  • यशवंत सिन्हा
  • शांता कुमार
  • जसवंत सिंह

जैसे कद्दावर नेताओं को 75 साल की उम्र के बाद किनारे कर दिया गया और उन्हें “मार्गदर्शक मंडल” का सदस्य बना दिया गया।

तो फिर मोदी के लिए अपवाद क्यों?

अब बड़ा सवाल यही है—अगर यही नियम और परंपरा बनी रही है, तो क्या प्रधानमंत्री मोदी खुद उस पर अमल करेंगे?
या फिर वे उस अपवाद की तरह सामने आएंगे, जिसके लिए सारे नियम बदल दिए जाते हैं?

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर मोदी खुद इस नियम को नहीं मानते हैं तो यह भाजपा और संघ दोनों के सिद्धांतों पर सवालिया निशान लगाता है।

कांग्रेस और विपक्ष का पलटवार

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मोहन भागवत के बयान के बाद तुरंत कहा—

“बेचारे प्रधानमंत्री! जैसे ही लौटे, संघ प्रमुख ने बता दिया कि वो 75 के हो जाएंगे… अब तो उन्हें अपना बैग उठा लेना चाहिए!”

शिवसेना (UBT) ने भी इसे तंज में कहा—

“आडवाणी जी को 75 पार होने पर दरकिनार किया गया,
अब क्या वही नियम ‘सेलेक्टिव’ रहेंगे?”

क्या भाजपा और संघ देंगे जवाब?

अब तक भाजपा या संघ की तरफ से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। मगर अंदरूनी हलचलें ज़रूर हैं। कई वरिष्ठ नेता यह भी मानते हैं कि अगर मोदी इस “75 रूल” को नहीं मानते, तो विपक्ष को बड़ा हथियार मिल जाएगा। और जो नैतिक ऊंचाई भाजपा ने वर्षों में बनाई है, वो खुद मिट्टी में मिल जाएगी।

क्या होगा आगे?

अगर पीएम मोदी इस नियम को मानते हैं तो उन्हें या तो उत्तराधिकारी घोषित करना पड़ेगा,
या फिर अमित शाह या किसी और नेता को अगले लोकसभा चुनाव के लिए आगे लाना होगा।

निष्कर्ष

मोहन भागवत का बयान कोई साधारण ‘कोट’ नहीं, ये संकेत है – और शायद दिशा भी।
अब फैसला नरेंद्र मोदी के हाथ में है—
या तो वो खुद हटकर “संघ परंपरा” को ज़िंदा रखें,
या फिर वही परंपरा सवालों में घिर जाए।


आपकी राय क्या है?
क्या मोदी जी को 75 की उम्र में खुद ही पद छोड़ देना चाहिए?
क्या भाजपा को अपने नियमों पर कायम रहना चाहिए?
कमेंट में अपनी बेबाक राय ज़रूर लिखें।
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आर्टिकल : मनीष कुमार अंकुर


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