26 मार्च 922 ईo को मंसूर अल हल्लाज की “अन अल फ़ना दिवस” की याद में उन्हें सत्यास्मि मिशन की ओर से स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी की एक कविता से शुभकामनाएं…
मंसूर अन अल हक़्क़ ए मंजूर
परवाना सारी रात भर
शमा के इर्दगिर्द घूमता फ़िजूल।
जा सुबह बताता दोस्तों को
शमा संग लफ्फेबाजी ए हुलुल।।
आगे चल कर खुद यही
शमा ए रोशन हो परेशान।
कूद पड़ता शमा की लपट में
मिटा अपने पन की शान।।
खुश नही था रौशन की गर्मी
ना लौटने का था इंतजार।
ये कौन मैं कौन तजुर्बा लेने
हुआ एक में एक कर दीदार।।
झुलसा टुकड़े टुकड़े जिस्म के
बची शक़्ल ना सूरत अक़्ल।
मिल गयी खुद की नजर एक
अब दुरी का नही यहाँ दख़ल।।
अपनी नजर का दीदा हुआ
उस अंदर तो हूँ मैं।
ये मैं खुद ना और खुदा है
ये मैं ना अब कभी जब मैं।।
ये मुहम्मद ना पैगम्बर खुदा
ना कोई मैं और।
कुछ कहने को यहाँ बचा नहीं
ये बिन कहे परे मैं और।।
ना ये कोई रूतबा ए रूह
ना ये कोई है हक़।
ये कहूँ तो अधूरा सब
बस है एक अन अल हक़्क़।।
🙏जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः🙏
मैं ही सत्य हूँ अन अल हक़्क़ का आत्मसाक्षात्कार करने वाले पहले मुस्लिम सिद्ध थे मंसूर अल हल्लाजको आज के दिन 26 मार्च 922 ईo को शहीद किये जाने पर सत्यास्मि मिशन का सह्रदय नमन
मंसूर अल हल्लाज का जन्म बैज़ा के निकट तूर (फारस) में 858 ईo में हुआ। ये पारसी से मुसलमान बने थे। अरबी में हल्लाज का अर्थ धुनिया होता है – रूई को धुनने वाला। आपने कई यात्राएं कीं – ३ बार मक्का की यात्रा की। ख़ुरासान, फ़ारस और मध्य एशिया के अनेक भागों तथा भारत की भी यात्रा की। सूफ़ी मत के अनलहक (अहम् ब्रह्मास्मि) का प्रतिपादन कर, आपने उसे अद्वैत पर आधारित कर दिया।
आप हुलूल अथवा प्रियतम में तल्लीन हो जाने के समर्थक थे। सर्वत्र प्रेम के सिद्धांत में मस्त आप इबलीस (शैतान) को भी ईश्वर का सच्चा भक्त मानते थे। समकालीन आलिमों एवं राजनीतिज्ञों ने आपके मुक्त मानव भाव का घोर विरोध कर 26 मार्च 922 ईo को निर्दयतापूर्वक बगदाद में आठ वर्ष बंदीगृह में रखने के उपरांत आपकी हत्या करा दी। किंतु साधारणत: मुसलमान मानवता के इस पोषक को शहीद मानते हैं। आपकी रचनाओं में से किताब-अल-तवासीन को लुई मसीनियों ने पेरिस से 1913 ईo में प्रकाशित कराया। इनके और भी फुटकर लेख और शेर बड़े प्रसिद्ध हैं।
परंपरागत इस्लामी मान्यताओं को चुनौती देने की ख़ातिर इनको इस्लाम का विरोधी मान लिया गया। लोग कहने लगे कि वे अपने को ईश्वर का रूप समझते हैं, पैगम्बर मुहम्मद का अपमान करते हैं और अपने शिष्यों को नूह, ईसा आदि नाम देते हैं। इसके बाद उनको आठ साल जेल में रखा गया। तत्पश्चात भी जब इनके विचार नहीं बदले तो इन्हें फ़ाँसी दे दी गई।
फांसी से पहले उन्हे तीन सौ कोड़े मारे गए, देखने वालों ने पत्थर बरसाए, हाथ में छेद किए और फिर हाथों-पैरों का काट दिया गया। इसके बाद जीभ काटने के बाद इनको जला दिया गया। इन्होने फ़ना (समाधि, निर्वाण या मोक्ष) के सिद्धांत की बात की और कहा कि फ़ना ही इंसान का मक़सद है। इसको बाद के सूफ़ी संतों ने भी अपनाया।
सत्यास्मि दर्शन-लेकिन उन सभी सूफियों ने कहीं न कहीं द्धैतवाद को भी पकड़े रखा है और संत मंसूर में भी जो भी अद्धैत की सम्पूर्णता दिखाई देती है उसमें भी एक स्तर भेद है जिसे भारतीय अद्धैतवाद में ही सम्पूर्ण रूप से देख सकते हो जिसे आगे समझाया जायेगा।
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
🙏जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः🙏
www.satyasmeemission.org
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