
आज भी जब हम महिला और पुरुष के चरित्र की बात करते हैं तो समाज का तराजू हमेशा महिलाओं के खिलाफ झुकता दिखाई देता है। हाल के दिनों में आपने ऐसी कई खबरें देखी होंगी कहीं पत्नी ने अपने पति की हत्या कर दी, कहीं किसी महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर घर उजाड़ दिया। मीडिया इन्हें सनसनीखेज बनाकर पेश करता है, और समाज तुरंत महिलाओं पर सवाल उठाने लगता है।

अभी हाल ही की एक घटना आपको बता दें अयोध्या में एक 21 साल की मानसिक विक्षिप्त लड़की का रेप हुआ उसकी बॉडी बहुत बुरे हाल में मिली, लड़की की आँखें निकाली हुई थीं। प्राइवेट पार्ट में डंडा डाला था, जिससे कि युवती का मल तक निकल गया था। शरीर पर काटने के निशान थे, ऐसे निशान जैसे लड़की को किसी आदमखोर ने खाया हो। जब लड़की का शव गांव वालों ने निर्वस्त्र अवस्था में नाले में पड़ा देखा तो कोई देख नहीं पा रहा था इतनी वीभत्स तरीके से लड़की के साथ हैवानियत हुई कि देखने वालों के रौंगटे खड़े हो गए। यहां तक कि शव देखकर महिलाएं बेहोश हो गईं।

ये ऐसी पहली घटना नहीं है। और अब आप सोच रहे होंगे कि ये मनगढ़ंत कहानी होगी। तो आपको एक बार इस स्टोरी को सर्च कर लेना चाहिए। चूंकि घटना एक आम घटना थी यहां महिला ने पुरुष को नहीं मारा था बल्कि एक लड़की शिकार हुई थी। हो सकता है ये खबर आपने सुनी भी न हो। अयोध्या में बहुत सारे पत्रकार हैं, महिला पत्रकार भी हैं लेकिन उनकी डीपी पर ये खबर नहीं दिखी। ये फरवरी 2025 की खबर है। इसके बाद अभी हरियाणा के भिवानी में भी एक 17 साल की लड़की के साथ भी हैवानियत हुई। लेकिन पुलिस उसे आत्महत्या बता रही है।
और हां एक और बात… पश्चिमी बंगाल की खबर पूरे देश में वायरल होती है। (हम इस खबर को राजनीतिक खबर नहीं बनाना चाहते हैं। आप खुद समझदार हैं।) जब कोलकाता की बिटिया के लिए आवाज उठ सकती है तो अयोध्या की बिटिया भी तो किसी की बिटिया थी। लेकिन मामला राजनीतिक हो जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें कैसी राजनीति तो आप इतने भी भोले नहीं हैं।

ऐसी न जाने कितनी खबरें हैं जो दब जाया करती हैं। और सबसे ज्यादा खबरें दबती हैं छोटी गरीब बच्चियों की… जो न बता पाती हैं और न कुछ कह पाती हैं। ये भारत है जहां लड़कियों को देवी समझा जाता है। ये वही भारत है जहां नदियों को मां समझा जाता है। अब आप सोच रहे होंगे नदी और लड़कियों का क्या संबंध… तो संबंध है..। हम हिंदू जिस चीज में दैवीय शक्ति का रूप देख लें उसे बर्बाद कर देते हैं। यमुना मां मतलब यमुना नदी अपने अस्तित्व को रो रही है, नदी को नाला बना दिया गया है। गंगा के हाल भी कुछ खास अच्छे नहीं हैं। हम नदियों को मां मानते हैं और जबरदस्त कचरा डालते हैं, उन्हें खूब गंदा करते हैं। वैसे ही भारत में महिलाओं का हाल है। हम महिला को देवी मानते हैं और उस देवी के हाल उनके ससुराल में देखिए, उनके खुद के घर में देखिए। लड़की छोटे कपड़े पहने तो उस पर गंदी नजर, पूरे कपड़े पहने तो उसके अंदर झांकने की कोशिश। वहीं पुराने विचार वाले कहते हैं कि बेटी घर में ही अच्छी… फिर वो बेटा जो लड़की को गन्दी नजर से देखता है… उसका क्या? संस्कार केवल बेटी के हिस्से में आते हैं… बेटों से तो गलतियां हो जाया करती हैं।

खैर ज्यादा लिखा तो आप बुरा मान जाएंगे।
समाज की सोच: औरत ही दोषी क्यों?
आज भी महिलाएं अगर नौकरी करती हैं, स्कूटी या कार चलाती हैं, तो समाज को नागवार गुजरता है। छोटी ड्रेस पहनकर बाहर जाएं तो लोगों की मानसिकता बदलने की बजाय औरत को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
असल में यह सब महिलाओं के रोज़ाना के संघर्ष की कहानी है।
नीले ड्रम वाला केस सुर्खियां बनता है, लेकिन 3 साल की बच्ची के साथ बलात्कार की खबर अखबार के एक कोने में दब जाती है।

यूपी, दिल्ली, हरियाणा, बिहार, राजस्थान से लेकर देश के हर हिस्से से महिलाओं पर जुल्म की खबरें आती रहती हैं। रेप, गैंगरेप और हत्या के ऐसे मामले सामने आते हैं कि सुनने वालों का कलेजा कांप उठता है।
पुरुष प्रधानता का असली चेहरा
जब भी किसी महिला का चरित्र सवालों में घिरता है, समाज उसका पूरा चरित्र चित्रण करने बैठ जाता है। लेकिन जब पुरुष हैवानियत की सारी हदें पार कर देता है, तब उसकी करतूत को अक्सर दबा दिया जाता है।
ये सिर्फ पुरुष प्रधान सोच नहीं है, बल्कि हमारे भीतर गहराई से बैठा अहंकार है। मर्द का अहंकार यह स्वीकार ही नहीं कर पाता कि औरत उससे बेहतर कैसे हो सकती है? यही वजह है कि महिलाएं अक्सर अपने ही घर में सबसे ज्यादा दुश्मन पाती हैं। कई बार तो महिला ही महिला की दुश्मन होती है।

बदलाव की जरूरत
महिलाओं को लेकर हमारी सोच बदलनी होगी। हमें सिर्फ सुर्खियों वाली घटनाओं पर नहीं, बल्कि हर उस महिला की आवाज़ उठानी होगी जो अन्याय का सामना कर रही है। चाहे दहेज हो, रेप हो या घरेलू हिंसा, समाज को मिलकर इनके खिलाफ खड़ा होना होगा।
और अंत में…
“आदमी कितना भी चरित्रहीन हो लेकिन दोषी सिर्फ औरत को माना जाता है।”
अब वक्त है इस सोच को बदलने का। महिलाएं सिर्फ चारदीवारी या पर्दे तक सीमित रहने के लिए नहीं बनी हैं। उन्हें बराबरी का हक़ देना और उनकी आवाज़ बनना हमारी जिम्मेदारी है। तभी समाज सच्चे मायनों में आगे बढ़ पाएगा।
Exclusive Article : Manish Kumar Ankur
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Manish Kumar Ankur and his wife Poonam Singh
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