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कश्मीर की सबसे खौफनाक कहानी, सरला भट्ट और गिरिजा टिक्कू के साथ जो हुआ उसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी

“कश्मीर की धरती… जो कभी अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती थी, 90 के दशक में खून और आंसुओं से लाल हो गई। ये कहानी है दो कश्मीरी पंडित बेटियों की—सरला भट्ट और गिरिजा टिक्कू—जिनके साथ हुई हैवानियत सुनकर आज भी रूह कांप उठती है।
“1990… कश्मीर की घाटी से उठी वो चीख, जिसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता।
हजारों साल से अपने घरों में बसे कश्मीरी पंडित, एक ही रात में बेघर हो गए।
आतंकियों की धमकियां, गोलियों की गूंज, और मौत का खौफ…
लाखों कश्मीरी पंडितों ने अपना घर, अपनी जमीन, अपनी यादें छोड़ दीं।
जो रुके, उन्होंने मौत और हैवानियत का सामना किया…
सरला भट्ट और गिरिजा टिक्कू जैसी बेटियां, जिनकी कहानियां आज भी रूह कंपा देती हैं।


सवाल अब भी वही है—क्या इन बेटियों और कश्मीरी पंडितों को कभी इंसाफ मिलेगा?”

“16 अप्रैल, 1990… शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की नर्स सरला भट्ट।
उन्हें हॉस्टल से अगवा किया गया।
पहले सामूहिक दुष्कर्म, फिर बेरहमी से पिटाई…
और आखिरकार गोलियों से छलनी कर शव को लाल चौक के पास फेंक दिया गया।
गुनाह क्या था? सिर्फ इतना कि उन्होंने आतंकियों के ‘कश्मीर छोड़ने’ के फरमान को मानने से इनकार कर दिया था।
यहां तक कि उनके अंतिम संस्कार में भी लोगों को धमकी दी गई—’अगर गए तो अंजाम भुगतना होगा’।”
“और फिर… सिर्फ दो महीने बाद—25 जून 1990।
बारामूला की लैब असिस्टेंट, गिरिजा टिक्कू।
सैलरी लेने निकली, रास्ते में अपने ही एक सहकर्मी के घर पर रुकीं…
लेकिन वह जानती नहीं थीं कि उनका पीछा किया जा रहा है।
अगवा किया गया… कई दिनों तक बर्बरता की सारी हदें पार की गईं।
लेकिन हैवान यहीं नहीं रुके…
गांव वालों के सामने… लकड़ी काटने वाली आरा मशीन से… गिरिजा को दो हिस्सों में काट दिया गया।
ये खून सिर्फ एक इंसान का नहीं… पूरी इंसानियत का था।”

“गिरिजा की कहानी में सबसे दर्दनाक बात ये थी…
साजिश रचने वाले वही पड़ोसी थे, जिन पर उन्होंने भरोसा किया था।
जिनके साथ उन्होंने सालों तक रोटी बांटी थी।”

“अब… करीब 35 साल बाद, जम्मू-कश्मीर की SIA ने सरला भट्ट हत्या मामले की जांच फिर से शुरू कर दी है।
पुराने जख्म फिर हरे हो रहे हैं…
वो दौर, जब सैकड़ों कश्मीरी पंडित या तो मारे गए, या अपना सबकुछ छोड़कर भागने पर मजबूर हुए।

उस वक्त, भाजपा के समर्थन से केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार थी, जम्मू-कश्मीर में गवर्नर रूल…
राज्यपाल थे जगमोहन।” जिन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली थी।

“सरला और गिरिजा… ये सिर्फ दो नाम नहीं, बल्कि उन हजारों मासूमों की पहचान हैं, जो नफरत की आग में जल गए।
सवाल ये है… क्या कभी इन बेटियों को इंसाफ मिलेगा?
या फिर उनकी कहानियां, कश्मीर की बर्फ की तरह… वक्त के साथ पिघलकर बह जाएंगी?”


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