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Pandit Pradeep Mishra का रुद्राक्ष और कावड़ यात्रा भक्ति की आड़ में मौत का कारोबार?

पंडित प्रदीप मिश्रा के पाखंड ने ले ली 7 लोगों की जान

सीहोर के कुबेरेश्वर धाम में आस्था की नहीं, अब लाशों की भीड़ लग रही है।
श्रद्धा की चादर ओढ़े ये कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा… कहने को तो कथा करते हैं, लेकिन असल में लाखों की कमाई और लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करते हैं।

टीवी और सोशल मीडिया पर पैड प्रोग्राम चलाकर प्रसिद्ध हुए पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपना अलग ही साम्राज्य खड़ा कर लिया है। लोगों को जैसे चाहे वैसे बरगला लेते हैं। और लोग भी इनकी बातों में आकर भेड़चाल का हिस्सा बन जाते हैं। ये पंडित खुद को भगवान का भेजा हुआ बताने वाले इस कथित बाबा की सच्चाई क्या है?
सच्चाई ये है कि बीते तीन दिनों में कुबेरेश्वर धाम में सात श्रद्धालु अपनी जान गंवा चुके हैं।
कोई भगदड़ में मरा, कोई दम घुटने से और कोई हार्ट अटैक से।
लेकिन न बाबा को फर्क पड़ा, न सिस्टम को।
कहा जा रहा है कि रुद्राक्ष वितरण और कावड़ यात्रा के नाम पर भीड़ को इस कदर इकट्ठा किया गया कि धाम एक मेला नहीं, मौत का कुंभ बन गया।
मंगलवार को रुद्राक्ष लेने की अफरा-तफरी में दो महिलाओं की मौत हो गई।

बुधवार को पंडित प्रदीप मिश्रा ने सीहोर की सीवन नदी से अपने धाम तक 11 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा निकाली, जिसमें दो लाख से ज्यादा लोग झोंक दिए गए।

कहने को ये कांवड़ यात्रा भक्ति थी… लेकिन हकीकत में ये थी एक और मार्केटिंग स्कीम।
एक और तरीका भीड़ इकट्ठा करने का, एक और रास्ता चढ़ावे की कमाई का। करोड़ों की कमाई का जिसका न टैक्स जाता है और न ही कोई अन्य सरकारी शुल्क… बल्कि बाबा को तो सरकारी नुमाइंदों से मदद और मिलती है। नेता इनके चरणों में नमस्तक होते हैं।

वहीं कावड़ यात्रा के दौरान लोग नंगे पांव, उमस में, बिना सुरक्षा के सड़क पर दौड़ते रहे… और बाबा माइक पर कथा करता रहा।

कोई नहीं पूछता कि ये सब किसके कहने पर हो रहा है?
किसने बुलाया लाखों की भीड़ को?
किसने किया इंतज़ाम?

असलियत ये है कि कोई इंतज़ाम था ही नहीं।

यहां तक कि सड़क किनारे नहाने के लिए भी पचास रुपये वसूले जा रहे थे।
धाम के पास बनी ऊंची इमारतें भक्तों के लिए नहीं, बाबा के धंधे के लिए बनी हैं।

लोग सोचते हैं कि रुद्राक्ष मिलेगा तो दुख कट जाएंगे…
लेकिन यहां तो रुद्राक्ष लेने गए, और जान से हाथ धो बैठे।

प्रदीप मिश्रा ने धर्म को कारोबार बना लिया है।
इनकी कथाओं की फीस लाखों में है।
चढ़ावे में करोड़ों आते हैं।
बच्चे ऐश में हैं, लेकिन जो भक्त इन्हें भगवान मान बैठे हैं, वे सड़क पर दम तोड़ते हैं।

सवाल ये है – क्या इस देश में अब भक्ति जान लेकर ही मिलेगी?

पूर्व मंत्री कुसुम महदेले खुद कह चुकी हैं – रुद्राक्ष वितरण बंद किया जाए।
सरकार के मंत्री जांच की बात कर रहे हैं।
लेकिन क्या इतना काफी है?

क्या सिर्फ जांच से 7 मौतें वापस आ जाएंगी?

प्रशासन को पहले से पता था कि लाखों लोग आएंगे,
तो फिर क्यों नहीं थे सुरक्षा के इंतज़ाम?
क्यों नहीं थी डॉक्टरों की टीम?
क्यों नहीं थी कोई इमरजेंसी प्लानिंग?
और सबसे बड़ा सवाल की इस बाबा को इतना बड़ा आयोजन करने की परमिशन आखिर किसने दी, किसके कहने पर ये कथित बाबा इतना बड़ा आयोजन करता है?

क्योंकि ये पूरा खेल बस एक ही मकसद से किया गया – भीड़ दिखाकर बाबा की ब्रांडिंग और बैंक बैलेंस दोनों बढ़ाना।

लोग सुख-शांति की तलाश में इस ढोंगी के पीछे चल पड़ते हैं…
लेकिन भूल जाते हैं कि असली सुख परिवार में है, माँ-बाप के आशीर्वाद में है,
न कि ऐसे पाखंडी के ‘कथा’ के बहाने चढ़ावे में।

पंडित प्रदीप मिश्रा अब कथावाचक नहीं, बल्कि करोड़ों की मशीन बन चुका है।
जो आस्था के नाम पर आपके भरोसे, आपके पैसे और अब आपकी जान तक से खेल रहा है।

ध्यान से सुनिए… ये भक्ति नहीं, ये धंधा है।
और अगर अब भी नहीं चेते, तो अगली लाश शायद आपके परिवार से भी हो सकती है।

इस पाखंड का पर्दाफाश जरूरी है।
अब सवाल पूछिए, श्रद्धा नहीं – समझदारी दिखाईए।
क्योंकि धर्म कभी जान लेकर नहीं मिलता।

हो सकता है ये हमारी खबर प्रदीप मिश्रा के अंधभक्तों को बुरी लगे, लेकिन एक बार अपने मां बाप, सास ससुर, अपने परिवार के प्रति इतनी आस्था दिखाएं, लगाव दिखाएं, अपने बच्चों को अपने बड़ों को प्रेम दें,परिवार में सच्ची आस्था रखें, मां बाप के चरणों में स्वर्ग माने। आप यकीन मानिए आपको ऐसे पाखंडियों की जरूरत नहीं पड़ेगी। महादेव को पंडित प्रदीप मिश्रा में मत ढूंढिए। महादेव तो आपके इर्द गिर्द ही हैं। उन्हें पाखंड की नहीं बल्कि आपकी सच्ची भक्ति की जरूरत है। महादेव को मानना है, उन्हें पूजना है तो आप अपने परिवार के साथ अपने घर में पूजिए, अपने पड़ोस के मंदिर में जाकर पूजिए। लेकिन ऐसे पाखंडियों के बहकावे में मत आइए।

ब्यूरो रिपोर्ट : खबर 24 एक्सप्रेस


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