खबर 24 एक्सप्रेस डेस्क | नागपुर : जहां एक तरफ हर कोना संतरे की खुशबू से महकता है, वहीं इस धरती की असली पहचान है संघर्ष और सफलता।
हाल ही में नागपुर की दो संतानें — दिव्या देशमुख और अमोल डी. वालके — दुनिया के मंच पर भारत का सिर ऊंचा करके लौटीं।
लेकिन इन दोनों की वापसी के बीच एक फर्क साफ नज़र आता है: किसे मिला जोरदार स्वागत, और किसे मिला सन्नाटा।
वर्ल्ड स्ट्रॉन्ग मैन बने अमोल वालके — स्वर्ण पदक भारत के नाम, पर कोई स्वागत नहीं
थाईलैंड के पटाया शहर में हाल ही में आयोजित हुई 12वीं वर्ल्ड स्ट्रॉन्गलिफ्टिंग और इन्क्लाइन चैंपियनशिप 2025 में भारत का प्रतिनिधित्व किया नागपुर के अमोल डी. वालके ने — और वो भी पैरा (दिव्यांग) वर्ग में।
उन्होंने कुल 108.25 किलो वजन उठाया, वो भी महज 65 किलो वज़न वाले शरीर से।
प्रतिस्पर्धा कर रहे थे 12 देशों के खिलाड़ी: भारत, नेपाल, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान…
लेकिन अंत में जब तिरंगा ऊंचा लहराया और जन गण मन बजा — तब अमोल की आंखों में आंसू थे, और सीना गर्व से चौड़ा।
अमोल को न सिर्फ स्वर्ण पदक मिला, बल्कि “वर्ल्ड स्ट्रॉन्ग मैन 2025” का खिताब और वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने का गौरव भी हासिल हुआ।

“सम्मान मिलना या न मिलना कोई मुद्दा नहीं, भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ी बात है” — अमोल वालके
जब अमोल से उनके खाली स्वागत पर सवाल किया गया, तो उन्होंने बेहद सादगी और गर्व के साथ जवाब दिया —
उन्होंने आगे कहा कि जब मंच पर राष्ट्रगान बजा, तो वो पल उनकी ज़िंदगी का सबसे अहम पल था।
दिव्या देशमुख को भव्य स्वागत, तो अमोल क्यों पीछे?
दूसरी तरफ, भारत की शतरंज चैंपियन दिव्या देशमुख, जो हाल ही में विश्व विजेता बनीं — उनका हर जगह भव्य स्वागत हुआ।
एयरपोर्ट से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह तालियां, मालाएं, फोटो सेशन्स और सम्मान की बाढ़।
और होना भी चाहिए — दिव्या ने भारत का मान बढ़ाया है।
लेकिन सवाल यही है —
क्या अमोल वालके का योगदान कम था?
क्या सिर्फ इसलिए कि वो दिव्यांग वर्ग से आते हैं?
क्या सिर्फ इसलिए कि वो किसी राजनीतिक या पब्लिक फ्रेमवर्क का हिस्सा नहीं हैं?
सम्मान की पात्रता किसी की पृष्ठभूमि से नहीं, उसकी उपलब्धि से तय होनी चाहिए
दिव्या और अमोल — दोनों ने भारत का झंडा अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऊंचा किया है।
एक ने शतरंज की बिसात पर दुनिया को मात दी, तो दूसरे ने लोहे की ताकत को हौसले से झुका दिया।
फिर, दोनों के लिए सम्मान में भेदभाव क्यों?
हमारे समाज को इस आईने में झांकने की ज़रूरत है —
जहां नायक सिर्फ वही नहीं होते जो कैमरे में दिखें, बल्कि वे भी होते हैं जो शोर से दूर, संकल्प के साथ देश को गौरव दिलाएं।
अमोल की तरफ से दिव्या को बधाई — “नागपुर की बेटी ने हम सबका सिर गर्व से ऊंचा किया”
इतना ही नहीं, अमोल ने दिव्या के लिए खुले दिल से सराहना दी
“19 साल की बिटिया ने हमारे नागपुर का नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध किया। उसे मेरा सलाम है।”
ऐसे खिलाड़ी ही असली भारत हैं — जो जीतते हैं, लेकिन सिर कभी ऊंचा नहीं करते।
खबर 24 एक्सप्रेस पर खास इंटरव्यू
आज, खबर 24 एक्सप्रेस पर देखिए —
अमोल डी. वालके का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू, जिसमें वो बताते हैं अपनी जर्नी, अपनी प्रेरणा और उस संघर्ष की कहानी, जो हर भारतीय को प्रेरित कर सकती है।
यह सिर्फ एक खबर नहीं, सोचने का विषय है
यह खबर सिर्फ एक तुलना नहीं, एक विचार का उभार है।
हम उन नायकों को भी पहचानें जो ट्रेंडिंग में नहीं, लेकिन ट्रैक पर जीतते हैं।
क्योंकि असली हीरो वे नहीं जो सुर्खियों में हैं, बल्कि वे हैं जो भारत के लिए खामोशी से इतिहास रचते हैं।
रिपोर्ट: Khabar 24 Express | Nayi Soch Naya Bharat
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