
इंदौर-देवास हाईवे जाम पर मौतें… जिम्मेदारी से बचने के लिए NHAI की दलील
इंदौर-देवास हाईवे पर जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक ट्रैफिक जाम नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही और संवेदनहीनता का आईना है।
40 घंटे तक हाईवे पर हजारों वाहन फंसे रहे। बच्चे, बुजुर्ग, बीमार लोग बेहाल रहे। कई लोग भूखे-प्यासे घंटों सड़क पर खड़े रहे। तीन लोगों ने इस जाम में अपनी जान तक गंवा दी।
लेकिन जब जिम्मेदारी तय करने का वक्त आया तो NHAI ने एक ऐसा बयान दिया, जिसे सुनकर हर आम नागरिक हैरान रह गया। अदालत में NHAI की तरफ से कहा गया –
“लोग आखिर घर से बिना काम के जल्दी क्यों निकलते हैं?”
अब सवाल यह है कि क्या सड़कें सिर्फ सरकार और ठेकेदारों के लिए बनी हैं? क्या आम आदमी का सड़क पर चलना अब अपराध हो गया है?
मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए NHAI, कलेक्टर, पुलिस और ठेकेदारों से 7 जुलाई तक जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा – सड़कें जनता के लिए होती हैं, प्रयोगशाला नहीं।

कलेक्टर ने इस जाम के लिए खराब सर्विस रोड और उज्जैन रोड पर चल रहे निर्माण कार्य को जिम्मेदार ठहराया। वहीं NHAI अधिकारियों ने जाम के बाद कुछ देर में डायवर्जन का रास्ता खोलने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब निर्माण कार्य हो रहा था तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? जब सर्विस रोड की हालत खराब थी तो उसकी मरम्मत क्यों नहीं हुई?
NHAI का ये बयान सिर्फ एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं, बल्कि जनता की परेशानी पर किया गया तंज है। सवाल जनता से नहीं, खुद सिस्टम से होना चाहिए।
काम तो आपका था… सड़कें बनाने का… जाम रोकने का… लोगों की जान बचाने का… वो क्यों नहीं किया?
अगर आम लोग घर से निकलना ही बंद कर दें… तो अगली बार चुनाव में वोट डालने भी न निकलें… यही उम्मीद रखनी चाहिए क्या?
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