अंजय…
क्या किया स्वामी नव जन्म लेकर
सुख नाम संग्रहित किया दुःख सहकर?
क्या है जीवन का उद्धेश्य?
जीवन के चक्रित नवीन नाम प्राचीन भेष??
बार बार प्रेम पाने की अभिलास.
प्रियतमा को कंठ लगाने की रागमय आशा.
क्या आशा ही जीवन का भ्रमित सुख है?
नहीं प्राप्य हो तो,यहीं निराश बनती क्यों दुःख है?
ऐसी अनगिनत व्यथा कथा बनती इस भू पर.
प्रेम के चरम में यातना निहित इस भू पर.
केवल पुष्प बनने से काम नहीं सधता है.
यहाँ पुष्प से फल और बीज भी जनना होता है.
सदा युवक बन भोगे, यौवन की मादकता को.
सहना होता इसी भोग के और भी,परिणामों की अग्नि धधकता को.
तन गलित हो जाता,यौवन लुभाभ दान में जाता.
प्राण छोड़ते संग,पर ममता रस रह जाता.
खिलती कलियों के प्रभात में,उन्मुक्त घूमने की चाह.
कामना बन मेघ खेल कर रिस, बूंद बहती बन अनगढ़ राह.
अमरता नाम रोग दोष शाप ताप
सब झंझावत बनते.
इस धरा पे आकर क्यों विषाद हम पाते रहते.
क्षण भर सुख,कण भर मधु का लोभ संग विपत्तियाँ इतनी.
आह! ये घृणित जीवन भूमि,नरक दिखलाती कितनी??
क्यों क्यों ले हम जन्म कारण बतलाओ?
सत्य क्या है,मेरे ये प्रश्न सुलझाओ!!
स्वामी जीवन
अमरता अखंडता का तुम अर्थ ये?
सदा रहे एक शाश्वत अवस्था।
भाव आभाव स्वभाव रहित
रसता विहीन एक मात्र नीरसता।।
आकाश तारें स्थिर रहे
और स्थिर रहे सूरज और चाँद।
गंधहीन पुष्प कृतिम सौंदर्य रहे
बिन भाषा अभिलाषा बिन मोन नाँद।।
ना प्रश्न ना उत्तर वाला
ना कोई मध्य साक्षी भान।
अखंडता एक मात्र विखंडित रहित
आदि अनादि अनंत अंतहीन शून्यतावान।।
जबकि-ऐसा क्यों नहीं है,हुआ जानना चाहो….
पढ़ो-सत्यास्मि ग्रन्थ
जपो-सत्य ॐ सिद्धायै नमः।
करो-आत्मरत ध्यान
पाओ-आत्मसाक्षात्कार अल्प समय।
दर्शित हो जन्म का शुभता कारण
और सत्य उत्तर ह्रदय हर्षित हो।
मैं की अक्षय अवस्था मोक्ष पाओ
अहम् सत्यास्मि उद्धघोषित हो।।
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🙏जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः🙏
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