किसी भी विश्व धर्म इतिहास में स्त्रियों के कुण्डलिनी जागरण की चर्चा नहीं है लेकिन सत्यास्मि धर्मग्रन्थ में सम्पूर्ण चित्र एवं बीज मंत्रों की चर्चा है।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज द्वारा लिखा गया “सत्यास्मि धर्म ग्रन्थ” एक ऐसा ग्रन्थ है जो आजके ज्ञानी विद्धवान सोचने पर मजबूर हो जाते हैं। स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने जीवन की सम्पूर्ण व्याख्या इस धर्मग्रन्थ में लिख दी है। जिसने भी इस ग्रन्थ को पढ़ा उसने अपने जीवनकाल को जान लिया।
स्त्रियों का कुण्डलिनी जागरण (भाग 2) क्या है “रेहि क्रिया योग”? इसको जानें और ईश्वरत्त्व को प्राप्त करें : श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज
स्त्रियों का कुण्डलिनी जागरण (भाग-1) और बीज मंत्र, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी माहारज द्वारा स्त्रियों के लिए “सत्यास्मि धर्म ग्रंथ” एक अपूर्व भेंट
[भाग-3]
हमारे योग शास्त्र में केवल तीन ही तत्वों का वर्गीकरण है-1-सत्-2-असत्-3-बीज।यानि-1-पुरुष सत् और -2-स्त्री असत् और -3-इन दोनों का प्रेम से एक होना ही बीज नामक तीसरा और मूल तत्व है।यो सत् और असत् ये द्धैत है और दोनों का एक हो जाना ही बीज नामक अद्धैत अवस्था है और यो ही बीज अद्धैत ईश्वर यानि प्रेम कहलाता है।
सत् और असत् में अनंतकाल से परस्पर एक होना और एक होकर प्रेम की उस स्थिति में अपने अपने लिंग की अनुभूति और उपस्थिति को विस्मत्र यानि भूलकर, केवल जो लिया और दिया जा रहा है यानि प्रेम..
क्योकि प्रेम ही उन दोनों का मूल स्वरूप है,यो उसी में डुबे रहना,उसी में विषय शून्य रहना ही उनकी आत्म स्थिति है,यो इसे ही वेदों में कहा गया है की-जब न सत् था और न असत् था,था केवल शून्य और उसी शून्य में शब्द हुआ और उस शब्द यानि..एकोहम बहुस्याम..यानि एक से अनेक हो जाऊ..से ये समस्त सृष्टि हुयी है।यो इस दोनों स्त्री और पुरुष रूपी सत् और असत् का अपने अपने स्वरूप में स्थित आधे आधे प्रेम को मिलाकर एक मात्र प्रेम में स्थिर होना ही वो वेदों का शून्य है और यही दोनों का विषय शून्य होक एक मात्र प्रेम में स्थित होना ही वेदों की प्रलय भी है। और इस प्रेम से फिर से अपने अपने स्वरूप में अलग होकर उस प्राप्त प्रेम के बहिर आनन्द को एक दूसरे की उपस्थिति में अनुभव करना ही इन दोनों की सृष्टि है।यो इन दोनों सत् र असत् का अनंत बार प्रेम से बंटना और फिर से उसी में लीन हो जानने की आनन्ददायक श्रंखला अनन्त है।
जब बीज बंटता है-तब वो ऋण यानि पुरुष यानि सत् में अलग होता है और धन यानि स्त्री यानि असत् के रूप में बटाव होता है। मूल में तो स्त्री में जो बीज है-वो धन है और पुरुष में जो मूल बीज है वो-ऋण है और इनके यानि स्त्री और पुरुष के साथ एक दूसरे को परस्पर स्थूल और सूक्ष्म रूप में ये दो विपरीत तत्व और आधा बीज भी मिलता है।यहां ये आधा तत्व मिलने का अर्थ ये नहीं है की-कोई है? जो इन्हें ये देता है,बल्कि ये इनमे ही पहले से है और इसी अतिरिक्त तत्व से ही इन दोनों स्त्री और पुरुष में आकर्षण और विकर्षण और एक बने रहना और उस एक से फिर से अलग होने की शक्ति या गुण की प्राप्ति होती है,क्योकि सदा अपने स्वरूप को भूलकर एक अलिंग में रहने में भी आनन्द है और इस अलिंग स्थिति यानि प्रेम से बाहर आकर अपने अपने लिंग में आकर उस प्राप्त प्रेम का आनन्द लेना भी व्यक्तिगत आनन्द लेना अर्थ है।
तभी मूल बीज से बंटवारें में- ये पुरुष में मूल ऋण या Y और साथ में धन-(1 से लेकर 1/2 प्रतिशत तक-इस दोनों अर्द्ध तत्व के वर्गीकरण को और स्थान पर समझाऊंगा) और आधा-1/2 प्रतिशत बीज प्राप्त होता है।और ऐसे ही स्त्री को उसका मूल तत्व धन या X, और (1से लेकर 1/2 प्रतिशत तक) ऋण Y यानि पुरुष तत्व मिलता है, ( आज के विज्ञानं में इसे धन या X कहा गया है) और विपरीत लिंग रूपी पुरुष का आधा बीज यानि आधा ऋण y मिलता है।यो स्त्री में ये X यानि अतिरिक्त धन की स्थिति ही उसे पुरुष के बीज में स्थित आधे X से मिलकर पुरुष के Y बीज को अपने में आकर्षित कर रचित करती है और इस आकर्षित Y को अपने में ग्रहण करके नवीन स्त्री या पुरुष की सृष्टि करती है।यो यहाँ यदि स्त्री का आकर्षण बल कम रहा,तो उसे उस Y तत्व के साथ आकर्षित अपना ही आधा तत्व X से योग होकर अपने स्वरूप की यानि पुत्री की सृष्टि प्राप्त होती है,यो ही स्त्री में इस X और X के मिलाप से ही अतिरिक्त आकर्षण शक्ति का बल और अपनें में नए जीव की सृष्टि को पालने का बल और उस आंतरिक लालन और पालन का बल के वेग यानि दर्द को झेलने की शक्ति भी प्राप्त होती है।इस लिए ही स्त्री को अपने अंदर के इस आकर्षण बल की शक्ति को समझना होगा और उसपर अधिकार करना होगा,उसे क्रतिम सौंदर्य को त्याग कर,उसको जो ये शक्ति प्राप्त है,उसे ही अपने अंदर से और भी अधिक प्रकट करनी होगी,तब ये ही शक्ति उसे उस असाधारण सौंदर्य और असाधारण शक्ति को देगी,जिसके बल से सभी कुछ तत्व और उसकी ऊर्जा को अपने में आकर्षित करके उस ऊर्जा का उपयोग कर पुरुष से भी बलशाली बनती है।
यही उसका “स्त्रित्त्व योग” है,तब उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं होगा।ये बड़ा रहस्य है।
तब स्त्री में इस सृष्टि की क्रिया और प्रतिक्रिया से उसका मूल बीज धन फट् कर अपने साथ प्रतिक्रिया और आधा पुरुष ऋण के साथ स्त्री में उल्टा यानि नीचे की और मुख वाला त्रिकोण बनता है।यो ही जो संसार में एक योग प्रचलित है की-विश्व ऊर्जा को अपने में आकर्षित करके अपने 7 या 9 चकों को जाग्रत करने की कला है,वो ये स्त्री शक्ति का ही योग है।
और वेसे ही पुरुष के मूल बीज Y में सृष्टि क्रिया से फट कर उसकी प्रतिक्रिया रूप धन X और आधा स्त्री बीज 1/2-X-धन मिलकर पुरुष में सीधा यानि उर्ध्व या ऊपर की और मुख वाला त्रिकोण ∆ बनता है।यो ही अंदर से बाहर की और अपनी अंतर ऊर्जा को विकर्षित करके उठाना और सभी 7 या 9 चक्रों में प्रवाहित करके उन्हें जाग्रत करना ही “पुरुष योग” है।
यो स्त्री के मूलाधार चक्र में-उल्टा त्रिकोण होता है.जो- पहला कोण-X1,
दूसरा कोण:-X2 और तीसरा कोण आधा बीज-y से बना होता है।
और इसमें साधक पुरुष के शरीर के साथ विशेषकर मन के भोग और योग होने से अथवा गुरु में मन और आत्मा के मेल यानि योग होने से इन तीनों अथवा ढाई बीजों में मूलाधार चक्र में से क्रिया+प्रतिक्रिया घटित होता है।
तब स्त्री के मूलाधार चक्र में पहले स्त्री के X1 में क्रिया होती है(वेसे यो सबमें एक साथ क्रिया और प्रतिक्रिया होती है,पर यहां एक क्रम से समझाया जा रहा है)
तब X1की क्रिया की प्रतिक्रिया X1बनकर आज्ञाचक्र में होती है।
यहाँ स्मरण रहे की-तभी ये आज्ञाचक्र में दो भाग होते है-क्रिया की प्रतिक्रिया के क्षेत्र।
जो प्रारम्भ में सीधे होते-<•> और जाग्रत होने पर ऊपर की और (•) दिव्य आँख जेसे बन जाते है।
तब मूलाधार चक्र में त्रिकोण के पहले कोण यानि X1की क्रिया की प्रतिक्रिया आज्ञाचक्र में X1 नाम से होती है।पर स्मरण रहे की- ये स्त्री का जो असल X2 है,ये वो नहीं है,बस X1 का दूसरा भाग प्रतिक्रिया X1 नाम मानो।
ऐसे ही स्त्री के मूलाधार चक्र में त्रिकोण का दूसरा कोना है, जो दूसरा X2 है, ये X2 मूलाधार चक्र के दूसरे कोने से स्फुरित होने के बाद ये स्वाधिष्ठान चक्र में अपना स्थान बनाता है या यहाँ इस X2 की विशेष और स्वतंत्र रूप में जागर्ति होती है और तब इस स्वाधिष्ठान चक्र से ही X2 की क्रिया की प्रतिक्रिया-X2 कण्ठ चक्र में होती है।यो स्वाधिष्ठान क्रिया चक्र है और स्वाधिष्ठान चक्र का प्रतिक्रिया चक्र है-कण्ठ चक्र।
स्वाधिष्ठान चक्र का अर्थ है:-स्वयं या अहम-मैं यानि जो स्त्री या पुरुष है,उसका पहला पहला अहंकार की जागर्ति होना।अपनी उपस्थिति का पहला बोध होना ही स्वाधिष्ठान चक्र है।इतने ये नहीं जागता है,तब तक मनुष्य केवल खाना पीना और मैथुन करके सो जाने जैसा पशुवत व्यवहार में जीवन जीता और मरता है।
यो इसी चक्र में व्यक्ति को अपने “कच्चे अहंकार” का बोध होता है यानि की मैं अभी दूसरे के होने से पूरा होऊंगा।तभी वो दूसरों पर अधिकार करने की इच्छा करता है और दूसरे से वासना से लेकर अधिकारिक प्रेम प्राप्ति की इच्छा करना और दूसरे को परास्त करने के लिए उससे युद्ध करता है।इसी चक्र की जागर्ति होने तक ही संसार में अनगिनत योद्धा और राक्षस और देवता तक हुए है।
यो स्वाधिष्ठान चक्र से X2 की प्रतिक्रिया कण्ठ चक्र में होती है,तब इस प्रतिक्रिया के फलस्वरुप मन अंतर्मुखी होने से ही पहले हलके स्तर का,फिर मध्यम स्तर का,फिर प्रगाढ़ स्तर का जालंधर बन्ध लगता है।
स्मरण रहे की-इन्ही क्रिया और प्रतिक्रियाओं के चलते बाहरी स्थूल शरीर पर तो रोमांच आता है,जिससे स्त्री और पुरुष में एक दूसरे के प्रति आकर्षण और विकर्षण बनता रहता है और इससे दोनों में शारारिक भोग घटित होता है और अंतर यानि सूक्ष्म स्तर पर पहले धीमी साँस का चलना और बाद में गहरी और तेज भस्त्रिका के होने की क्रिया होती है।
ऐसे ही मूलाधार चक्र में निर्मित त्रिगुण का त्रिरूप त्रिकोण का जो अंतिम तीसरा कोना है, और इस तीसरे कोने में जो आधा बीज- जो आधा पुरुष बीज है-1/2-Y है,और जब आधा बीज में भी मूलाधार चक्र में से आधी क्रिया और प्रतिक्रिया होती है,तब इस स्फुरण से उत्पन्न पहली क्रिया का पहला क्षेत्र नाभि बनाता है और फिर यहाँ से ही वो अपनी प्रतिक्रिया ह्रदय चक्र में करता है।
यहाँ इस आधे बीज की प्रतिक्रिया केवल उसका आधा आकर्षण और विकर्षण बल का विस्तार मात्र है,यो वो यहाँ बंटता नहीं है।बस उसका ये बल ही अपना प्रवाह या प्रतिक्रिया मात्र करता है।
और जब ये अर्ध बीज की ह्रदय चक्र में प्रतिक्रिया घटित होती है,तब नाभि चक्र से लेकर ह्रदय में और उसके आसपास क्षेत्र यानि पेट में सामान्य और मध्यम और प्रगाढ़ यानि पूर्ण रूप का उड्डियान बंध लगने लगता है।और समाधि होती है। पहले जड़ फिर चैतन्य या द्रश्य दर्शन आदि यानि विकल्प समाधि और फिर निर्विकल्प समाधि की और समाधि की गति होती है।तब यहाँ ह्रदय चक्र के भी दो भाग हो जाते है-1-सामान्य ह्रदय चक्र जिसमे धड़कन चलती है और जब ये ह्रदय चक्र रुक रुक यानि यहां निरन्तर तेजी से स्फुरण होने के कारण एक संघर्ष की स्थिति बनकर धीमी और शांत होने लगती है,तब यही ह्रदय में भावजगत का ह्रदय बनता है।और तभी सच्ची भावनाएं मनुष्य में बढ़ती और सुधरती जाती है और तभी इसी क्रिया और प्रतिक्रिया से सीधे हाथ की और भी एक ह्रदय चक्र का बनना और खुलना प्रारम्भ होता है।
उसी में प्राणवायु स्थिर होकर समाधि पाती है।यहाँ प्राण वायु के पीछे और उसे नियंत्रित करने वाली इच्छा और उसका समूह यानि मन भी स्थिरता की प्राप्ति करता है यानि शुद्धता की प्राप्ति करके केवल प्रेममयी ह्रदय बन स्थिर हो जाता है।तभी प्रेम समाधि की प्राप्ति होती है।
मूल ज्ञान ये है की- X1की क्रिया का क्षेत्र मूलाधार चक्र ही रहता है,क्योकि ये X1 मूल बीज है। ये यहीं रहकर स्त्री के मूल शरीर की बनाये रखता है।तब यहीं मूलाधार चक्र से X1 की क्रिया की प्रतिक्रिया आज्ञाचक्र में होती है,यहाँ पहले ऊपर बताया है,वो स्मरण रहे की-तभी ये आज्ञाचक्र में दो भाग होते है-1-आज्ञाचक्र से ऊपर की और जाने वाला मार्ग और एक यहाँ से नीचे की और जाने वाला मार्ग।यो जब यहाँ मूलाधार चक्र में स्थित X1 की क्रिया होती है,तब इस आज्ञाचक्र में ऊपर की और जाने वाला मार्ग बन्द हो जाता है,वेसे वो मार्ग मूल में ह्रदय चक्र जहां बहुत बाद में सविकल्प की समाधि का समाप्ति होने लगती है,तब वहां से ही खुलता है।और तब तक आज्ञाचक्र में क्रिया की प्रतिक्रिया के क्षेत्र बराबर यानि सीधा होता है-जैसे इस तरहां- <-0-> और जब आज्ञाचक्र में स्थिति हो जाती है यानि ह्रदय चक्र से सभी त्रिगुण एक होकर ऊपर चढ़ते है,जिसे विशुद्ध कुण्डलिनी शक्ति कहते है,उसकी गति सहस्त्रार चक्र में होती है,तब इस आज्ञाचक्र में तीसरी आँख जैसा चक्र बनता है- यानि ऐसा–(•)
अब आगे:-तब X1की क्रिया की आज्ञाचक्र में -X2 नामक प्रतिक्रिया होती है,पर ये स्त्री का जो असल X2 है,वो नहीं है,बस X1 का दूसरा भाग प्रतिक्रिया नाम X2 द्धितीय है ये मानो।तब ऊपर लिखा बताया सब घटता है।और नीचे प्रारम्भिक यानि सहज मूलबन्ध लगता है,जिससे पैर के अंगूठों से प्रारम्भ होकर उँगलियों और एड़ियों और पिंडलियों व् जांघों और नितम्बों के खड्डों में और मूलाधार के नीचे शक्ति चक्र में मूलबन्ध लगता है।और इन सब में इकट्ठी प्राण ऊर्जा खिंचती हुयी मूलाधार चक्र में चढ़ती है और इसके बाद जब यहां से ऊर्जा ऊपर को सहज ही चढ़ जाया करती है,तब मध्यम मूलबन्ध लगता है और बाद में प्रबल मूलबन्ध लगने से बहुत जल्दी ही समाधि में व्यक्ति की गति होती जाती है।
योग शास्त्रों में वर्णित- स्त्री हो या पुरुष उनमें ढाई-ढाई चक्र मारे कुण्डलिनी शक्ति सोई रहती है।
और ये जब तक नहीं जागती जब तक की किसी भी बाहर के ढाई बीज का अपने साथ शक्तिपात नहीं होता है।तब ढाई+ढाई तत्व मिलकर ही सच्चे पँचत्वों का उदय और निर्माण होता है-जिनमें 5 गुण होते है-1-रूप-2-रस-3-गंध-4-स्पर्श-5-शब्द।और इनमें सबसे मूल तत्व है-शब्द..
और इसी शब्द रूपी बीज तत्व के निरन्तर उच्चारण से तरंगित होकर ये कुंडलिनी जागती है।यो शब्द को शब्द ब्रह्म यानि “बीज मंत्र” कहते है,ये बीज मंत्र भी स्त्री और पुरुष के ढाई+ढाई=पँचतत्व या पँच गुण के अक्षर रूप है-जो स्त्री में-1-भं-2-गं-3-सं-4-चं-5-मं…असल में ये 5 बीज स्त्री का बीज से स्वरूप तक अर्थ है।जैसे-भं का अर्थ है-स्त्री का भग या योनि या मूलाधार चक्र और उसकी शक्ति..ऐसे ही गं का अर्थ है-स्त्री का गर्भ और उसकी शक्ति।
शेष आगामी लेख में स्त्री कुण्डलिनी जागरण सम्बंधित और भी विज्ञानं योग के गूढ़ विषय का ज्ञान और उसके चित्र दिखाते समझाऊंगा। और बताऊंगा की- स्त्री के 5 बीज मंत्र-भं-गं-सं-चं-मं..बीज मंत्रो का किस प्रकार से जप करे।जिससे स्त्री की कुण्डलिनी जाग्रत हो..
या केवल सत्य ॐ सिद्धायै नमः ईं फट् स्वाहा के जप से ही स्त्री और पुरुष की कुण्डलिनी जाग्रत हो जायेगी..
“श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज”
“जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः”
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