
आज का भारत तेज़ी से बढ़ रहा है। विकास की नई फसल बो रहा है। लेकिन एक पत्रकार और एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारी कुछ जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं।
हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि समय-समय पर सरकार को भारत के हर एक नागरिक से अवगत कराएं। उनके दुःख दर्द सरकार तक पहुंचाये। जो सुझाव आप मुझे देते हैं, बताते हैं.. बस इसी कड़ी में आज सरकार तक आपकी बात पहुंचाने की एक कोशिश कर रहा हूँ।
“यहाँ पर जिस कदर राजनीति हावी होती जा रही है, तो वहीं अधिकतर मुद्दे इस राजनीति में खोते से जा रहे हैं।”
भारत में 60% लोग गरीबी रेखा के नीचे या बिलकुल पास रहते हैं। यानी बात एक ही है। कि 60% लोग गरीब हैं। “रोजाना का कामना, रोजाना का खाना जैसे, कभी नहीं भी मिला तो भूंखें सो लिए।”
यहाँ पर 10% लोग अमीरी रेखा से बहुत ऊपर हैं तो बचे 30% माध्यम वर्गीय हैं।
अब बात आती है टैक्स की। तो यहाँ मात्र 15% भारतीय ही टैक्स देते हैं.. लेकिन ये मिथ्या है.. भारत में हर एक नागरिक टैक्स देता है चाहे जैसे देता हो। खैर यहां इस लेख में यह बताने का मौका नहीं है, बल्कि मैं कुछ और बात कर रहा हूँ।
मैं बात कर रहा हूँ भारत की व्यवस्था की। जी हाँ वही व्यवस्था जिसके लिए भारत सरकार हमसे टैक्स वसूलती है।
“यहाँ पर अधिकतर सरकारी योजनाएं ख़स्ताहाल हैं। ऐसा नहीं है कि 2014 से पहले ये ख़स्ताहाल नहीं थी लेकिन 2014 के बाद भी कुछ नहीं बदला है।”
किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। वही किसान जो अपनी जी जान लगाकर कड़ी मेहनत के साथ फसल को उगाता है लेकिन उसे उसकी लागत तक नहीं मिल पाती है।लेकिन उसको खरीदने वाले रातों रात 10 गुना पैसा कमा लेते हैं। यहाँ तक कि उसकी कीमत आम आदमी के पास तक पहुँचते-पहुँचते लगभग 25 गुना हो बढ़ जाती है कई जगहों पर 100% तक है।
अब यहां बात करते हैं सरकारी सुविधाओं की। आप सरकारी अस्पतालों से तो खूब वाकिफ होंगे.. वही सरकारी अस्पताल जो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शहर में 870 बच्चों की जान मात्र 7 महीनों में ले चुका है।
यहाँ सरकारी हॉस्पिटल खस्ताहाल, इलाज के लिए गैर सरकारी बेहतर लेकिन गरीबों की पकड़ से कोसो दूर।
सरकारी स्कूलों में शिक्षा सिर्फ नाम की, गैरसरकारी स्कूलों में शिक्षा तो अच्छी लेकिन गरीबों के बच्चों के लिए नहीं।
सरकारी ट्रांसपोर्ट सिस्टम की हालात दयावान.. गैरसरकारी व्यवस्था बहुत अच्छी।
भारत में रोड़ों की हालात ऐसी कि पता ही नहीं चलता कि गड्ढे में रोड़ है या रोड में गड्ढे। लेकिन टोल टैक्स वाली रोड एक दम मस्त, परन्तु टोल के नाम पर मोटा पीएस वसूला जाता है।
सरकारी होटल में व्यवस्था .. रामनाम.. लेकिन गैरसरकारी में VIP ट्रीटमेंट लेकिन महंगा।
सरकारी माकन.. जर्जर, गैरसरकारी वाह-वाह!! लेकिन कीमत हाय-हाय।
हर चीज में सरकारी सिस्टम पस्त.. लेकिन गैरसरकारी मस्त।
एक चीज समझ नहीं आती जब सरकार इन्हीं सब के नाम पर हम लोगों से मोटा टैक्स वसूलती है। (उस टैक्स के पैसे की लूट की बात मैं नहीं कर रहा हूँ) लेकिन बाबजूद इसके हम लोगों को इन सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता है और अगर ये सुविधाएँ चाहिए तो मोटी रकम चुकानी पड़ती है।
सरकार को हर कदम टैक्स देते हैं लेकिन बावजूद इसके सुविधाएँ ज़ीरो मिलती हैं और अगर मिलती हैं तो ऐसी, कि सुविधाओं का लाभ लेना न के बराबर होता है।
“नेता वही अरबों रुपये चुनावों में फूंक देते हैं लेकिन जिस पैसे से देश के लोगों का विकास होना है उसे वहाँ इस्तेमाल नहीं करते। साल दर साल चुनाव महँगा होता जा रहा है गरीब और गरीब, अमीर और अमीर होता जा रहा है। नेता बनते ही ठाठ बढ़ जाते हैं। नेतागीरी में आते ही गरीब से भी गरीब करोड़ों में खेलने लग जाते हैं। न जाने ये कैसी व्यवस्था है। सब कुछ ख़स्ताहाल है फिर भी हम महान हैं।”
सरकार किस बात का पैसा हमसे लेती है? और हम देते क्यों हैं। और अगर देना ही है। और इस गैरसरकारी तंत्र के साथ ही चलना है। तो सरकार इन गैरसरकारी तंत्रों से सुविधा शुल्क या टैक्स वसूले।
लेकिन जो सुविधाएँ इन 90% को ढंग से नहीं मिल रहीं हैं कम से कम उनके लिए कोई जबावदेह तो बनाओ।
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ख़बर24 एक्सप्रेस
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