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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026: सम्मान की बातें तो बहुत हुईं, लेकिन क्या भारत में महिलाओं को सच में मिलती है बराबरी?

International Women’s Day Special | Exclusive Article Manish Kumar Ankur | Khabar 24 Express



दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी महिलाएं आज भी समान अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही हैं। 21 वीं सदी के आधुनिक दौर में क्या वाकई महिलाएं अपना अधिकार प्राप्त कर चुकी हैं?


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हर साल 8 मार्च को दुनिया भर में महिलाओं के सम्मान, अधिकार और उपलब्धियों को याद करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन महिलाओं की ताकत, उनके संघर्ष और समाज में उनकी भूमिका की चर्चा होती है।

लेकिन जब हम जमीनी हकीकत पर नजर डालते हैं तो एक कड़वा सच सामने आता है दुनिया के अधिकांश देशों में आज भी महिलाओं को वह सम्मान और बराबरी नहीं मिल पाई है, जो पुरुषों को सहज रूप से मिल जाती है।

महिलाओं के अधिकारों और समानता की बातें लंबे समय से होती रही हैं, लेकिन आज भी कई समाजों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। भारत भी इस सच्चाई से पूरी तरह अछूता नहीं है।

भारत में अक्सर कहा जाता है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। हम भारत को “भारत माता” कहते हैं, गाय को माता मानते हैं, नदियों को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा करते हैं और देवी-देवताओं की आराधना करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम अपने समाज की महिलाओं को वही सम्मान दे पा रहे हैं जिसकी हम बात करते हैं?

सच्चाई यह है कि हम महिलाओं की हिस्सेदारी की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन उन्हें वास्तव में बराबरी का हिस्सा देने से अक्सर पीछे हट जाते हैं। महिलाओं के अधिकारों की चर्चा मंचों पर होती है, लेकिन व्यवहार में कई बार उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है।

समाज में दहेज प्रथा को लेकर भी यही दोहरी सोच दिखाई देती है। हम खुले तौर पर कहते हैं कि हम दहेज के खिलाफ हैं, लेकिन शादी के समय दहेज लेने से पीछे नहीं हटते। कई मामलों में कम दहेज मिलने पर महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है और कभी-कभी तो उनकी जान तक ले ली जाती है। यह हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है।

समस्या सिर्फ दहेज तक सीमित नहीं है। समाज का एक हिस्सा आज भी महिलाओं को सम्मान और बराबरी के अधिकार से ज्यादा एक वस्तु की तरह देखने की संकीर्ण सोच से ग्रस्त है।

अगर कोई महिला छोटे कपड़े पहन ले तो उसे इस तरह घूरा जाता है जैसे उसने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो। दुखद यह है कि यहां सिर्फ छोटे कपड़े पहनने वाली महिलाएं ही नहीं, बल्कि पूरी तरह से सलीके से कपड़े पहनने वाली महिलाएं भी सुरक्षित नहीं हैं।

स्थिति इतनी गंभीर है कि कई बार छोटी बच्चियां और यहां तक कि नवजात बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं। भारत में बेटा पाने की चाह आज भी कई परिवारों में इतनी मजबूत है कि बेटियों को या तो जन्म से पहले ही खत्म कर दिया जाता है या फिर जन्म के बाद उन्हें उपेक्षा का जीवन जीने के लिए छोड़ दिया जाता है।

हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि बेटियां किसी भी मायने में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। आज भारत की बेटियां खेल, विज्ञान, शिक्षा, सेना, राजनीति और व्यापार जैसे हर क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रही हैं।

वे विश्व स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। लेकिन अक्सर यह तब संभव हो पाता है जब उन्हें परिवार का समर्थन मिलता है या फिर वे अपने संघर्ष के दम पर खुद अपने पैरों पर खड़ी होती हैं।

अगर बेटियों को सच में बराबरी का अवसर मिले, उन्हें समझा जाए, उनकी अनदेखी न की जाए और उन्हें बोझ या उपेक्षित न माना जाए, तो भारत फिर से एक ताकतवर और समृद्ध देश बन सकता है। वह भारत, जिसे कभी “सोने की चिड़िया” कहा जाता था।

समाज को यह समझना होगा कि महिलाओं को देवी बनाकर पूजा करने से ज्यादा जरूरी है उन्हें इंसान के रूप में सम्मान देना और बराबरी का अधिकार देना। जब तक महिलाओं को जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी का मौका नहीं मिलेगा, तब तक समाज की प्रगति अधूरी ही रहेगी।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इस अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम सिर्फ महिलाओं के सम्मान की बातें ही नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें वास्तविक रूप से बराबरी का अधिकार देने की दिशा में भी काम करेंगे।

जैसा कि महान समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले की पंक्तियां कहती हैं

“स्त्रियों को न देवी मानने की जरूरत है और न पूजने की,
बल्कि स्त्री का सम्मान करना और बराबरी का अधिकार देना जरूरी है।”


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