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वजूद की लड़ाई लड़ता सैनिक का परिवार : श्याम बांगरे, जितेंद्र पटले की संयुक्त रिपोर्ट

एक तरफ तो सेना के नाम पर नेता खुलेआम वोट मांग रहे हैं, देशभक्ति के नाम पर दिखावा कर रहे हैं। लेकिन सेना के जवानों की हालत कोई नहीं देख रहा है।


2019 के लोकसभा चुनावों में सेना के मुद्दे को खूब भुनाया जा रहा है, नेता सेना के नाम पर राजनीति करने से नहीं चूक रहे हैं।
सेना से बर्खास्त जवान तेज़ बहादुर ने ऐसे ही आवाज उठायी थी लेकिन उनके साथ हुआ क्या? उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद तेज़ बहादुर ने अपने गुस्से का इज़हार करने के लिए पीएम मोदी को बनारस से चुनौती दी लेकिन उनका नामांकन भी रद्द कर दिया गया।

खैर हम यहां तेज़ बहादुर की बात नहीं कर रहे हैं हम एक ऐसे परिवार से मिलवाना चाहते हैं जो एक सैनिक का परिवार है, जिसने नौकरी के दौरान अपना मानसिक संतुलन खो दिया, ऐसे में जहां उस जवान का इलाज करवाना चाहिए था उसे उल्टा नौकरी से निकाल दिया।
आज वह परिवार अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है।

1991 से 2003 तक केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में रैपिड एक्शन फ़ोर्स के यूनिट 107 बटालियन में कार्यरत रहे उद्दव तांडेकर किसी बड़ी घटना के शिकार हुए, जिसके बाद उन्होंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया, इसके बाद विभाग ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। करीब 12 वर्षों तक सेवा देने के बावजूद उद्धव तांडेकर को मुआवजे के रूप में कुछ भी नहीं दिया गया। यहां तक कि विभाग की तरफ से उनके हाल चाल जानने भी कोई नहीं आया।
अब ऐसे में तांडेकर का परिवार इस लड़ाई को लड़ रहा है।
तांडेकर के परिवार वाले सरकार के पास गुहार लगाने भी गए लेकिन आश्वासन के अलावा उन्हें वहां से कुछ हासिल न हो सका।

सैनिक उद्धव तांडेकर के परिवार से बात की हमारे संवाददाता श्याम बांगरे ने।

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