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प्रतिपदा से पूर्णिमा तक सौलह देवी की षोढ़ष कला शक्तियों की उपासना कैसे करें? शक्ति के साधक भक्तों को साधना व् मन्त्र जप को बता रहे हैं-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी

 

 

 

 

प्रतिपदा से पूर्णिमाँ तक सौलह देवी की षोढ़ष कला शक्तियों की उपासना इस प्रकार से करें और सिद्धि पाये(पूर्णिमाँ पुराण से):-इस विषय में शक्ति के साधक भक्तों को साधना व् मन्त्र जप को लेकर संछिप्त में बता रहें हैं-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी……

 

 

 

 

अमावस्या से आगामी का प्रतिपदा यानि प्रथम दिन की कला शक्ति:-
अरुणी देवी की पूजा करनी चाहिए।ये पुरुष के पैरों से मूलाधार तक और स्त्री के पैरों से श्रीभगपीठ चक्र तक इनका स्थान है और प्रातः के प्रभात भौर की देवी है,इन्हें सूर्य की और जल अर्पण करते में “”सत्य ॐ सिद्धायै नमः अरुणियै ईं फट् स्वाहा”” मंत्र को सात बार बोलते हुए सूर्य के सप्त रश्मियों को जल में सिंदूर मिलाकर चढ़ाने से व्यक्ति का भाग्य सदा उज्ज्वलता और उन्नति को प्राप्त होता है,उसके सभी रात्रि के किये पाप,दोष इस प्रकार से किये गए जल अर्पण से नष्ट हो जाते है।इस दिन नीम के पेड़ पर जल चढ़ाया जाता है।

द्धितिया को:-
यज्ञई देवी की पूजा करनी चाहिए।ये सभी पहरों में जलायी गयी पूजा की सभी ज्योति और सभी पहरों में किये गए समस्त प्रकार के यज्ञ अनुष्ठानों की अधिष्ठाता देवी है।सभी यज्ञों में इनको इस मंत्र से-सत्य ॐ सिद्धायै नमः यज्ञई देव्यै ईं फट् स्वाहा”” से दी गयी सात आहुतियों से समस्त प्रकार के सामान्य अंगारी और छोटे से विशाल यज्ञ और अनुष्ठानों में सम्पूर्ण सफलता और उसका मनोवांछित फल,वरदान की प्राप्ति होती है।आंके पर जल चढ़ाना या श्रीभगपीठ पर जल चढ़ाना चाहिए।

तृतीया को:-
तरुणी देवी की पूजा करनी चाहिए।ये देवी सभी प्रकार की युवा और यौवन और हरित प्रकर्ति खुशहाली की देवी है,इन्हीं से सभी जीव से समस्त प्रकर्ति को पल्लवित होने की शक्ति प्राप्त होती है,यो इनकी इस मंत्र-सत्य ॐ सिद्धायै नमः तरुणियै ईं फट् स्वाहा”” से व्रक्षों में,विशेषकर आमलताश के वृक्ष पर जल या ओषधि पर जल या किसी देव्य शिला पर या नदी में स्नान करते हुए या स्वयं पर नित्य जल अर्पण करते हुए स्नान करने से सदा निरोगी और स्वस्थ रहने की यौवन शक्ति की प्राप्ति होती है।स्वाधिष्ठान चक्र में इनका स्थान है।

चतुर्थी को:-
उरूवा देवी की पूजा करनी चाहिए।ये देवी सभी चार धर्म कर्मो को मनुष्य में प्रारम्भिक रूप में उद्धभव यानि प्रकट करती है और पृथ्वी से लेकर प्रकर्ति में भी ये सभी प्रकार के बीजों और शाखाओं में नवीन सृष्टि की प्रथम फुटेर को प्रस्फुटित करती है।यो जो भी भक्त “सत्य ॐ सिद्धायै नमः उरूवा देवी ईं फट् स्वाहा”” मंत्र से कृषि के बीज को भूमि में सिंचित या किसी भी पोधे विशेषकर आम और पीले पुष्प का कनेर आदि को लगता है,तब इस मंत्र को बोलते हुए कर्म करें,तो उसकी फसल,व्रक्षादि सभी सम्पूर्ण उपजता और पोषित होकर प्राप्त होते है।यो तुलसा या गुड़हल या विल्व या पीपल या बड़ के व्रक्ष पर जल चढ़ाते पूजा करने से इनकी अतुलित कृपा प्राप्त होती है।नाभि चक्र में इनका स्थान है।

पंचमी को:-
मनीषा देवी की पूजा करनी चाहिए,ये देवी सभी प्रकार की विद्याओं में जो उनके अर्थ और मनन करने की शक्ति है,यो जो इनकी इस मंत्र से सत्य ॐ सिद्धायै नमः मनीषै ईं फट् सवाहा”” आराधना करता है,उस विद्यार्थी से लेकर विद्धान तक को उसके अध्ययन की प्रत्येक विषय विद्या के सभी सत्य अर्थ मनन आदि का ज्ञान और चित्त की एकाग्रता की प्राप्ति होकर सफलता मिलती है।वो इन देवी की कृपा से पंचतत्वी सिद्ध बनकर सिद्ध मनीषी हो जाता है।कमल पुष्प और कमलगट्टा इन्हें प्रिय है।ह्रदय चक्र इनका मूल स्थान है।

षष्टी को:-
सिद्धा देवी की पूजा करनी चाहिए।ये सभी प्रकार की सिद्धि की अंतिम अवस्था की प्राप्ति की देवी है,की जब सामान्य व्यक्ति हो या किसी भी लक्ष्य,पद प्रतिष्ठा या परीक्षा के अंतिम चरण में पहुँच का सफलता पाने का समय हो या साधक की सिद्धि की प्राप्ति का अंतिम स्तर हो,वहां इन्हीं की कृपा से ही अंतिम लक्ष्य में सफलता की प्राप्ति होती है,अन्यथा व्यक्ति अपने जीवन परिणाम को प्राप्त नहीं कर पाता है।यो देवी को इस मन्त्र से कम से कम सात बार पढ़ना चाहिए-सत्य ॐ सिद्धायै नमः सिद्धा देव्यै ईं फट् स्वाहा”” से नमन करना चाहिए।इससे सूर्य की गायत्री व् सविता और सावत्री शक्ति की सिद्धि की प्राप्ति होता है।इस विषय में शेष गुरु या विद्धान ब्राह्मण से विधि पूछनी चाहिए।गेंदा पुष्प इन्हें प्रिय है।इनका हाथों में स्थान है।

सप्तमी को:-
इतिमा देवी की उपासना है,ये देवी किसी भी संसारी हो या आध्यात्मिक कार्य उसके समापन को अपनी शुभता और सम्पूर्णता प्रदान करने की शक्ति देती है,  जो भी भक्त सत्य ॐ सिद्धायै नमः इतिमा देवी ईं फट् स्वाहा”” से जपकर इन्हें स्मरण करता है,तो उसका कोई भी कार्य बिन विध्न के सम्पूर्णता को प्राप्त होता है।इन्हें सरसों की पुष्प कली बड़ी प्रिय हैं।इनकी विशेष पूजा को शीशम का वृक्ष पर जल चढ़ाना चाहिए।इनका आध्यात्मिक ह्रदय चक्र में स्थान है।

अष्टमी को:-
दानेशी देवी की पूजा करनी चाहिए।ये देवी सभी प्रकार के दानों वो चाहे-विद्यादान हो या धन या वस्त्र व् अन्नदान आदि हो, से प्राप्त होने वाले लाभ और कल्याण की शक्ति देवी है। इन्हें सत्य ॐ सिद्धायै नमः दानेशी देवी ईं फट् स्वाहा”” से स्मरण और नमन कर दानवीर बनकर कृपा पायी जाती है।लाल या काले गुलाब प्रिय है।कण्ठ चक्र से आज्ञा चक्र तक में इनका स्थान है।
नवमी को:-
धारणी देवी की पूजा करनी चाहिए।ये देवी
सभी प्रकार के शुभ अशुभ कर्मो और उनके फलों को धारण करने वाली ओर उन्हें क्रमानुसार और कर्मानुसार देने वाली है।ये धर्म के तीनों शक्तियों-धारण-रमण-मर्मज्ञ की प्राप्ति करता है और धर्म, धैर्य साधक के ध्रुव केंद्र को धारण करने वाली देवी शक्ति है।
यो इन्हें ““सत्य ॐ सिद्धायै नमः धरणी देवी ईं फट् स्वाहा”” से स्मरण और नमन कर कृपा पायी जाती है।इन्हें विशेषकर हरशृंगार पुष्प की माला व् पौधा प्रिय है।इनका आज्ञा चक्र से उर्ध्व चक्र में स्थान है।
दशमी को:-
आज्ञेयी देवी की उपासना करनी चाहिए।ये देवी सभी प्रकार मनुष्य की इच्छाओं की पूर्ति यानि उन्हें क्रिया यानि आज्ञा में बदलने की शक्ति देने वाली है।इनकी कृपा से ही आज्ञाचक्र में स्थिति होकर सम्पूर्ण सिद्धि की प्राप्ति होती है।इनका तालव्य चक्र में स्थान है।
यो जो भक्त इनका दशमी के दिन “”सत्य ॐ सिद्धायै नमः आज्ञेयी देवी ईं फट् स्वाहा”” से जप स्मरण और नमन करता है,उसकी सभी जीव जगत के जड़ चैतन्य वस्तुऐ आज्ञा मानती और पूर्ति करती है।ब्रह्मांड में समस्त आज्ञाएं इन्हीं की कृपा शक्ति से सुचारू है।इन्हें चमेली चंपा की माला प्रिय है।
एकाद्शी को:-
ऐकली देवी की उपासना करनी चाहिए।ये देवी समस्त प्रकार के द्वन्दों को मिटाकर एकल स्वरूप यानि अद्धैत अवस्था की दाता देवी है।एकादशी के सभी व्रतों का फल इनकी ही कृपा से प्राप्त होते है। जो इनका “”सत्य ॐ सिद्धायै नमः ऐकली देवी ईं फट् स्वाहा”” से जप,स्मरण और नमन करता है,उसे और इसके समस्त प्रकार के भेदों को मिटाकर एक्त्त्व का भाव प्रदान करती है,परिणाम उसे दिव्य प्रेम की अद्धैतावस्था की प्राप्ति होती है।पंचमेवा और पँचफल या श्रीफल प्रिय है और सभी पुष्प की माला प्रिय है।गाय की पूजा से प्रसन्नता होती है।इनका सहस्त्रार चक्र के मण्डल चक्रों में स्थान है।
द्धादशी को:-
यशेषी देवी की उपासना करनी चाहिए।ये देवी समस्त प्रकार के यश प्रतिष्ठा कीर्ति की दाता है।जो इन्हें द्धादशी के दिन “”सत्य ॐ सिद्धायै नमः यशेषी देवी ईं फट् स्वाहा”” से जप,स्मरण और नमन करता या करती है,उसके किये समस्त संसारी और आध्यात्मिक कर्मो में समस्त प्रकार के यशों की प्राप्ति निर्विघ्न रूप में प्राप्ति होती है।पक्षियों को दाना चुगाने से इनकी सेवा कृपा मिलती है।इन्हें सभी वृक्षों या पौधों की कोंपल से बनी माला या किसी भी वृक्ष के 12 पत्तों पर अष्ट स्याही से या हल्दी से ईं बीजमंत्र लिखी माला प्रिय है।इनका भी सभी चक्रों के मण्डल चक्रों में स्थान है।
त्रयोदशी को:-
नवेषी देवी की उपासना करनी चाहिए।ये देवी सभी प्रकार की प्राप्त वस्तु या पदार्थ या जो भी कुछ विलुप्त हो गया है,उसे पुनः नवीनता के साथ नवरूप में साधक को प्रदान करती है।ये समस्त नवीन निर्माण या पुनर्जागरण और पुनश्चरण आदि की अधिष्ठाता देवी है,यानि जैसे मनुष्य कुंडली में हो या नव वर्ष या नवयुग के उपरांत की एक शून्य से पुनः सृष्टि हो,जिसे तेरहवीं संख्या,दिन,तिथि भी कहते है,जो जीवन को परिवतर्नशील और अतिशक्तिशाली सर्जन और विनाशक अंक है,उसकी शक्ति के देवी ये नवेषी देवी ही है।इनकी कृपा से त्रयोदशी का व्रत और उसका समस्त फल-नवीन जीव यानि संतान और नवीन विवाह के कुशल मंगलता से पूर्ण होने की कृपा और शक्ति प्राप्त होती है।
यो जो इनका त्रयोदशी के दिन या रात्रि में “”सत्य ॐ सिद्धायै नमः नवेषी देवी ईं फट् स्वाहा”” से जप स्मरण और नमन करता या करती है,वो समस्त नवीनता या नवीनीकरण से मनवांछित नवरुपों आदि करने की शक्ति प्राप्त करता है।हलदी की गांठ की माला और केवल किसी भी पुष्प की कलियों की बनी माला प्रिय है।इनका सभी चक्रों के मूल बिंदु के केंद्र चक्रों में अधिपत्य है।
चतुर्दशी को:-
मद्यई देवी की उपासना करनी चाहिए।ये देवी सभी प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक मद्य यानि मधु विद्या यानि सहस्त्रार चक्र में प्रवेश की सिद्धि हो या युगल दर्शन विद्या यानि प्रेम के मार्ग के समस्त विकार अहं से लेकर केवल अपने ही स्वार्थ के हित साधने में लगा रहने को शोधित करके यानि उसे शुद्ध करके साधक के ह्रदय में अद्धभुत आनन्द का रस जिसे मद्य कहते है,उसे प्रदान करती है।तभी साधक में रस प्रधान भक्ति का उदय और प्राप्ति होती है।तब साधक समस्त जगत को नीरसता से नही भगवत प्रेम की रसता से, उसके रास से,उसके दिव्य प्रेम से अनुभूत होकर देखता और उसका मद्यपान करता सदा आनन्दित प्रफुल्लित अनुग्रहित रहता और सबको करता है।यो इस देवी को “सत्य ॐ सिद्धायै नमः मद्यई ईं फट् स्वाहा”” से जप ध्यान स्मरण और नमन करना चाहिए।घर के द्धारों और पूजाघर में व् कार्यस्थल पर पीली हलदी से स्वस्तिक बनाना और उसके बीच में कुमकुम चावल रोली लगी बिंदी प्रिय है और अमरुद के वृक्ष पर या लीची,बादाम,सेब आदि पेड़ों पर जल चढ़ाना प्रिय है।सभी पुष्प की माला प्रिय है।
पूर्णिमां को:-
सत्यई पूर्णिमां देवी की आराधना करनी चाहिए।ये महादेवी सभी स्त्री शक्ति की मूलाधार और मुलावतार है,इन्हीं से समस्त स्त्री शक्ति की सृष्टि है,और इन्हीं के अमावस्या स्वरूप में सब स्त्री शक्ति समाहित हो जाती है।और प्रतिपदा से इसी क्रम से पुनः प्रकट होती अपनी आत्मसाक्षात्कार यानि पूर्णिमां दैविक अवस्था को प्राप्त होती है।यो इनका ध्यान अमावस्या को करने से अपने वर्तमान जन्म के पितृ हो या पूर्वजन्म के पितृ हो,जो की आप ही रहे होते हो,उस जन्म के कर्म दोषों का ज्ञान और शोघन की शक्ति प्राप्त होती है।इससे समस्त पितृदोष से मुक्ति मिलती है और पूर्णिमां में ध्यान करने से वर्तमान से भविष्य जन्मों के ज्ञान की सिद्धि मिलती है।सहस्त्रार चक्र इनका मूल चक्र है ओर वहां से अवतरण चक्र की अधिष्ठाता है। यो पूर्णिमाँ को गंगा या उसकी उपनहरों में स्नान और खीर का भोग लगाना और अधिक संख्या में खीर बांटनी चाहिए।इनकी पूजा में पानी वाला नारियल और नारियल से बने भोज्य पदार्थ मिठाई और केला केली की पूजा व् उनपर जल चढ़ाने वाला भक्त प्रिय है।इनको स्फटिक या वेजन्ती की माला शुभकारी है।

इस प्रकार सोलह कला की उपासना की जाती है और प्रत्येक स्त्री और पुरुष की करनी ही चाहिए।
इसके और भी आध्यात्मिक पक्षों के रहस्यों को आगामी लेखों में कहूँगा।

 

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org


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