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एक शांत शहर को आग लगाने की नाकाम साजिश का पर्दाफाश, बुलंदशहर दंगों का सारा सच, सबूतों और पूरे कच्चे चिट्ठे के साथ- मनीष कुमार ने किया दंगों की साजिश का पर्दाफाश

 

 

 

 

 

 

योगी-योगी मोदी-मोदी, हाथ में पत्थर, अवैध हथियारों से लैस, हत्यारी भीड़, सीना चौढाये, बिना किसी डर, बिना किसी हिचक के, कुछ भी करने को आतुर, मानों उन्हें किसी का संरक्षण प्राप्त हो, वो कुछ भी करें, कानून उनके ठेंगे पर।

 

 

 

कुछ ऐसा ही माहौल।
एक शांत शहर में आग लगावाने की नाकाम साजिश।
क्यों और किसके इशारों पर हो रहा है यह सब? इतनी हिम्मत कहाँ से आई? कानून का भय तो छोड़िए माथे पर शिकन तक नहीं, जैसे कोई इनसे कह रहा हो.. जाओ कुछ भी करो, “हम हैं ना कुछ भी नहीं होने देंगे।”

पहले नज़र डालते हैं बुलंदशहर की राजनीति पर:

बुलंदशहर में एक लोकसभा और 7 विधानसभा सीटें हैं, और सभी पर भाजपा का कब्जा है लेकिन अब सभी सीटें कमजोर होने लगी हैं। यहां तक कि भाजपा 2019 की लोकसभा सीट बुरी तरह से हार सकती है। यहां पर किसी भी पार्टी का वर्चस्व नहीं रहा है। कभी भाजपा, कभी सपा तो कभी बसपा तो कभी कांग्रेस इसी तरह से यहां की एक लोकसभा और 7 विधानसभा सीटों का हाल, यही रहा है।

 

बुलंदशहर का इतिहास और आबादी:
बुलन्दशहर का प्राचीन नाम बरन था। इसका इतिहास लगभग 1200 वर्ष पुराना है। महाभारत काल के भी कुछ किस्से बुलंदशहर से जुड़े हैं। कहा जाता है कि यहीं पर यक्ष का तालाब था। लेकिन बुलंदशहर की स्थापना अहिबरन नाम के राजा द्वारा बताई जाती है। राजा अहिबरन ने एक सुरक्षित किले का भी निर्माण कराया था जिसे ऊपर कोट कहा जाता है (अब यह मुस्लिम बाहुल्य एरिया है।) इस किले के चारों ओर सुरक्षा के लिए नहर का निर्माण भी था जिसमें इस ऊपर कोट के पास ही बहती हुई काली नदी के जल से इसे भरा जाता था। ब्रिटिश काल में यहाँ राजा अहिबरन के वंशज राजा अनूपराय ने भी यहाँ शासन किया जिन्होंने अनूपशहर नामक शहर बसाया उनकी शिकारगाह आज शिकारपुर नगर के रूप में प्रसिद्ध है। बुलंदशहर जिले की कुल आबादी 10 लाख के करीब है।

 

अब खबर दंगों से जुड़ी हुई :-
बुलंदशहर में लगभग एक से डेढ़ करोड़ मुस्लिम समुदाय के लोग तीन दिवसीय तब्लीगी इज्तिमा में हिस्सा लेने आये थे। दंगा भड़कता तो पूरा शहर जलता बल्कि इसकी आग नोएडा, दिल्ली गाज़ियाबाद, हापुड़, मेरठ, मुरादाबाद, अलीगढ़ आदि तक जाती।
आग बुलंदशहर से शुरू होती और दिल्ली समेत यूपी के एक दर्जन से ज्यादा जिलों में फैलती और ये सहज भुझती भी नहीं।
हज़ारों लोग मारे जाते और मारी जाती इंसानियत। न जाने कितने लोग बेघर होते? ऐसा नहीं है कि इस आग में सिर्फ मुस्लिम ही झुलसते, बल्कि बुलंदशहर जिला तो पूरा तबाह हो जाता।

 

अब नज़र डालते हैं गौकशी की घटना पर:
इतनी मात्रा में गौकशी किस वजह से हो रही थी पुलिस इसे दंगा फैलाने की साजिश बता रही है। पुलिस खुद कह रही है कि यह साजिश सिर्फ दंगा भड़काने की थी लेकिन सुबोधकांत सिंह जैसे जाँबाज पुलिसवालों ने अपनी जान दे दी, वो शहीद हो गए लेकिन दंगे नहीं होने दिए।

जिस गांव में हिंसा हुई उस गांव महाव के पूर्व प्रधान का कहना है कि हमारी पुलिसवालों से सुलह हो गई थी। हमारे गांव वालों ने पथराव नहीं किया, बल्कि पथराव करने वाले लोग बाहर के थे। पूर्व प्रधान प्रेमजीत सिंह ने बताया कि, ‘पुलिस के साथ हमारी सुलह हो गई थी। पुलिस ने आश्वासन दे दिया था कि आरोपियों के खिलाफ एफआईआर हो जाएगी। हमारे गांव के लोग भी मान गए थे, लेकिन अचानक बजरंग दल के लोगों ने ट्रैक्टर पर कब्ज़ा कर लिया। हमने बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माने। ‘ अवशेष वाला हमने ट्रैक्टर हटा लिया था। लेकिन जब हम ट्राली हटाने गए तो पथराव शुरू हो गया। पथराव करने वाले गांव के नहीं थे। मुझे नहीं पता कि अचानक से इतने पत्थर कहां से आ गए। मैं तो सुलह करवा रहा था, अचानक भीड़ ने पत्थर मारना शुरू कर दिया, ये सब बाहर के लोग थे, जब पत्थर चलने लगे तो हम जान बचा कर भागे, ये लड़का योगेश राज आगे था, इसका हमसे कुछ लेना देना नहीं है, मुझे नहीं पता कि जब पुलिस एफआईआर कर रही थी तो पत्थर क्यों चले? ये सुनियोजित लगता है।

इसके अलावा एक अन्य गांव वाले का कहना है कि “मैं खेत के बिल्कुल पास में रहता हूँ। पिछले दिन, यानी 2 दिसंबर को वहां मरी हुई गाय नहीं थी। सोमवार 3 दिसंबर को ही हमें वहां जानवर के शरीर के हिस्से दिखाई दिए। मैंने किसी को भी गाय काटते हुए नहीं देखा। अगर इतनी संख्या में गाय काटी जाती तो आवाज होती, कोई तो हरकत या हलचल होती। ग्रामीणों का शक है कि गायों को जैसे यहां पहले से मारकर लाया गया हो।

ग्रामीणों के मुताबिक कटी हुई गाय के टुकड़े गन्ने के खेतों में टंगे हुए थे। गाय की चमड़ी और उसका सिर ऐसे टांगा गया था, जैसे लोग हैंगर पर कपड़े टांगते हैं। ये बहुत अजीब बात है, गौकशी करने वाला कोई आदमी इस तरह उसका प्रदर्शन क्यों करेगा? उत्तर प्रदेश में जिस तरह के हालात हैं, उसे सब जानते हैं। कोई इस तरह अपनी जान की बाजी लगाकर डिस्प्ले में क्यों लगाएगा? मांस के टुकड़ों को यूं टांगा गया था कि वो दूर से ही नज़र आ रहे थे।

 

यहां से तकरीबन 30-40 किलोमीटर की दूरी पर मुस्लिमों का एक कार्यक्रम चल रहा रहा जैसा को ऊपर मैंने लिखा है, तीन दिनों के इस प्रोग्राम का आखिरी दिन 3 दिसंबर था। यहां लगभग एक से डेढ़ करोड़ मुस्लिम जमा हुए थे। वहां से लौटने वाले बहुत से इस रास्ते से भी जाते यानि मुरादाबाद, देबबन्द, रामपुर इत्यादि शहर के लोग बुलंदशहर-गढ़मुक्तेश्वर हाई-वे से लौटते। ऐसा होता, तो रास्ते में उनकी मुलाकात इस भीड़ से जरूर होती। तो क्या ऐसे में किसी दंगे जैसी स्थिति की आशंका से इनकार किया जा सकता था? अगर ऐसा है, तो क्या ये मुमकिन नहीं कि ये सब बहुत सोच-समझकर किया गया हो? क्योंकि गौकशी के अवशेषों को ट्रैक्टर ट्रॉली में डालकर इसी रास्ते पर लाया गया और इस हाइवे को जाम किया गया।

इसके अलावा साजिश वाली बात में इसलिए भी दम लगता है क्योंकि भीड़ के पास ईंट-पत्थर, लाठी-डंडे और यहां तक कि अवैध हथियार पहले से मौजूद थे। अगर प्रदर्शन ही करने का इरादा था, तो हथियार साथ लेकर आने की क्या जरूरत थी? क्या वो हिंसा करने की ठानकर आए थे?

 

 

साजिश में शामिल लोग :
इस साजिश में जो लोग शामिल थे उनमें चमन, देवेंद्र, आशीष और सतीश नामक चार अभियुक्तों को पुलिस ने अभीतक गिरफ्तार किया है, जबकि योगेश राज की गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें से सभी किसी न किसी दल से जुड़े थे। जैसे बजरंगदल और भाजपा। जिसमें भाजपा के एक नेता का भी नाम था जिसे पकड़ तो लिया लेकिन बाद में छोड़ भी दिया गया। योगेश राज बजरंग दल का जिला संयोजक बताया जा रहा है।

बुलंदशहर में भड़की हिंसा के दौरान इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या के मामले में 27 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज की गई है। उसमें पहले नम्बर पर बजरंग दल का जिला संयोजक योगेश राज का नाम है। दूसरा नाम बीजेपी युवा मोर्चो स्याना के नगराध्यक्ष शिखर अग्रवाल का है इसके साथ ही विहिप कार्यकर्ता उपेंद्र राघव को भी किया नामजद किया गया है। इसके अलावा 60 अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

 

 

“पुलिस द्वारा हिंसा को लेकर दर्ज की गई रिपोर्ट में योगेश राज को नामजद किया गया था। योगेश राज ने ही इससे पहले गौ हत्या का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी।”

 

 

प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा बताया जा रहा है कि इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या बड़े ही निर्मम तरीके से की गई। पहले तो उन्हें पकड़कर खूब मारा, इसके बाद उन्हें पेड़ से लटकाया गया और फिर उन्हें गोली मारकर पुलिस जीप के पास फेंक दिया गया। उनके ड्राइवर का कहना है कि वो इंस्पेक्टर सुबोध को अस्पताल ले जाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन भीड़ ने ऐसा नहीं करने दिया।
इसके अलावा जिस सुमित की मौत गोली लगने से हुई है। उसका वीडियो भी सामने आ गया है, सुमित भी उन पत्थरबाजों में शामिल था और वीडियो में वह पत्थरबाजी करते हुए साफ दिख रहा है। वह पुलिस की गोली का शिकार हुआ या दंगाईयो की, इसका अभी तक पता नहीं चला है।

अब बात आती है मेरी और मेरे बुलंदशहर ज्ञान की..
मैं इसी शहर में लगभग 1997 से रह रहा हूँ मेरा गांव भी इसी जिले में है। जहां गौकशी की अपवाह उड़ी वहां से मेरे गांव की दूरी 12-15 किलोमीटर की है। जहां से मैंने पढ़ाई की है वहां से 5-6 किलोमीटर की दूरी है। ये दूरियां इसलिए गिना रहा हूँ क्योंकि यहां के इलाकों से मैं अच्छी तरह से वाकिफ हूँ।
इनके आस-पास मुसलमानों की संख्या कम और जाटों की ज्यादा है। यहां मुसलमानों का बोलना तो छोड़िए सर उठाने तक कि हिम्मत नहीं होती है। लेकिन एक बात जरूर है कि भले आपसी मतभेद हों लेकिन लोगों में प्यार है, एकता है।
इसके अलावा जिस जगह की वो घटना है उसकी दूरी जिला मुख्यालय से महज 30 किलोमीटर की है। और यहां शहर से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर मुसलमानों का तब्लीगी इज्तिमा जमात का बड़ा प्रोग्राम चल रहा था जहां लगभग डेढ़ करोड़ मुस्लिम या उससे ज्यादा बुलंदशहर में इकट्ठा हुए थे।

अब कुछ फालतू की बातें..जो दंगों को सजिश बताती हैं:
बुलंदशहर में कसाईवाड़ा नाम की भी एक जगह है जहां पर मुर्गा, बकरा और बाकी मांसाहारी चीजें बिकती हैं और यह एरिया काफी बड़ा है, यानी अगर यहां पर कुछ भी काटा जाए तो पता नहीं चलेगा।
ऐसे में गाय काटना वो भी जाटों के बीच? वो भी चंद डरपोक मुसलमान? गाय भी एक नहीं बल्कि कई? (जैसा सुनने में आ रहा है।) कैसे काटने की कोशिश की जाएगी? फिर गौकशी की भी जाएंगी तो क्या उन गायों के सर पेड़ से लटकाए जाएंगे? योगेश राज और उसके अन्य साथी जो बुलंदशहर या शहर के आस पास रहते हैं वो सबसे पहले 30 किलोमीटर दूर पहुंचे और गौकशी की सूचना पुलिस को न होकर सिर्फ उन्हें ही हाथ लगती है और वे निकल पड़ते हैं अपनी गौमाता की रक्षा के लिए।
गौकशी की खबर गांव वालों को न लगकर इन्हें लगी? अब खुद सोचिये आप समझदार हैं। दुनियाभर के वीडियो वायरल हो रहे हैं।
मेरा शहर है मैं इस शहर से अच्छे से वाकिफ हूँ। जिसकी गलती होगी उसी की बात की जायेगी। यहाँ पर हिन्दू मुस्लिम एकता बहुत है। यहां के मुस्लिम होटल मंगलवार को बंद रहते हैं। या बहुत कम मांस बनाया जाता है, मेरे शहर की बिरयानी फेमस है। मैं खुद शाकाहारी हूँ लेकिन खाने वालों की भीड़ को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। कसाईवाड़े में मंगलवार को ताज़ा मांस नहीं मिलता अगर कटता भी है तो थोड़ा बहुत। अब ये मत कहने लग जाना कि मैं बात कहां से कहाँ तक ले गया। बात दंगों की हो रही थी बिरयानी बीच में कहां से आ गयी।
दरअसल यहां पूरे जिले की बात की जाए तो हिन्दू मुस्लिम का रेशो जो सामने आएगा वो 80% और 20% होगा या इससे भी कम। शहर में सिर्फ 2-3 जगह ऐसी हैं जहां मुसलमानों की संख्या है। वरना यहां चारों तरफ हिन्दू हैं और जाट बाहुल्य इलाके हैं।

अब वापस आते हैं दंगों की जगह:-
जिस जगह दंगों की आग भड़की उस गांव का नाम चिंगरावठी है। और यहां आस-पास के इलाकों में मुसलमानों की आराम से गिनती की जा सकती है। अब अगर मुसलमान “तब्लीगी इज्तिमा” के लिए गौकशी कर भी रहे थे तो वो ऐसी जगह क्यों चुनेंगे? “जहां पर उन्हें जान का खतरा तो छोड़िए पूरे परिवार का पता नहीं चलेगा इस बात का खतरा ज्यादा हो?”
“तब्लीगी इज्तिमा” में खुद मुस्लिम संगठन और धर्म गुरु अनाउंस कर रहे थे कि ऐसी कोई भी हरकत इस पाक तब्लीगी इज्तिमा जमात में ना हो कि सारी कौम को जिंदगी भर शर्मसार होना पड़े।
यही नहीं उस तब्लीगी इज्तिमा के लिए लोगों ने अपनी जमीनें दी, हिंदुओं ने नमाज के लिए मंदिर के दरवाजे खोल दिए हों। तब्लीगी इज्तिमा के लिए खुद हिन्दू मुसलमानों का हाथ बंटा रहे हों?
अगर ऐसा नहीं है तो आइए बुलंदशहर और पूँछिये उन गांवों में जाकर जहां यह कार्यक्रम 3 दिन तक चला। इसके अलावा मेरे घर के नज़दीक हलवाई ने हजारों पैकेट खाने के बनाएं, जिनमें पूरी सब्जी थी। मैंने अपनी आंखों से देखा, इसके अलावा जमात वाली जगह पर भी लगभग पूरी सब्जी बांटी गई। इस बात की तस्दीक खुद वहां जमा पत्रकार और पुलिसवाले भी कर रहे हैं।

बुलंदशहर में गाय खुलेआम पिन्निया खाती फिरती हैं, कभी-कभी तो वो चारे के अभाव में मारी जाती हैं। इन दंगाइयों की भावनाएं तब कहाँ घास चरने चली जाती हैं। मतलब दंगे करने के लिए गाय इनकी माँ बन जाती है चाहे वैसे भले इनकी मां इधर-उधर पिन्निया खाती फिरे, नाले में गिरकर अपनी जान क्यों न दे दे। लेकिन राजनीति के लिए और पैसे कमाने के लिए गाय इनकी माँ बन जाती है।
योगेश राज और इसके बाकी साथियों से पुलिस ढंग से तस्दीक करे, बिना दबाव पूंछताछ करे तो दंगों की साजिश का पूरा राज सामने आ जायेगा। हो सकता है यह एक बहुत बड़ी साजिश हो।
गाय किसने और क्यों मारी यह भी खुलासा हो जाएगा। लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि पुलिस पर ऐसा न करने का भारी दबाव है।

 

 

“जिस इंस्पेक्टर की मौत हुई है पहली ही नज़र में साबित हो जाता है कि चौकी को जानबूझकर निशाना बनाया गया था। क्योंकि जो चौकी इंचार्ज थे वो कभी दादरी में अखलाक मर्डर केस के भी इंचार्ज थे। और उनकी गवाही भी लगती थी।”

 

 

अब इस पूरे आर्टिकल में सब कुछ साफ-साफ है बाकी आपके विवेक पर निर्भर करता है।

और अंत में
आप सबसे विनम्र विनती, हाथ पांव जोड़कर अपील, साम्प्रदायिकता को ज्यादा बढ़ावा न दें। अगर आपके व्हाट्सअप या फेसबुक पर कोई भी भड़काऊ मैसेज या पोस्ट आती है तो उसे किसी को फारवर्ड ना करें, इस संबंध में पोस्ट करने वाले को समझाएं, नहीं माने तो उसे ब्लॉक कर दें या पुलिस में शिकायत दें। अगर आप ऐसा करते हैं तो यकीन मानिए आप देशहित, समाजहित में एक बहुत बड़ा कार्य कर रहें हैं।
कुछ सत्ता के लालची, दंगों को सत्ता पाने का सबसे आसान रास्ता मानते हैं। लेकिन दंगा भड़कने की स्थिति में किसी न किसी की तो जान जाती है। हो सकता है अगला नं0 आपके आसपास वालों का, आपका, आपके चाहने वालों का हो।
दंगा रोकने का सबसे आसान उपाय है कि तूफान को सर उठाने का मौका ही न दिया जाए।
जाइये पूँछिये शहीद इंस्पेक्टर सुबोध के परिवार से, उन्हें कैसा महसूस हो रहा है, जाइये हिम्मत करिये और करिये सामना सुमित के परिवार वालों से, जो अपने बेटे को बेकसूर बता रहे हों जिन्होंने दंगों की आग में अपने बेटे को खो दिया हो, भले उनका बेटा उस भीड़ का हिस्सा हो।
गर्मजोशी में लोग भड़क जाते हैं लेकिन झेलना उनके परिवार को पड़ता है।
जब अपना मरता है या खोता है तो परिवार को दर्द होता है। दंगाई योगेश राज मरता तो उसका भी परिवार रोता। आत्मा सबके होती है, दिल सबका होता है, और भावनाएं भी। आंखें भी होती हैं और दंगाई के मरने पर उसके परिवार वाले उन्हीं आंखों से रोते हैं। सोचिए बेकसूर मारा जाए तब उसके परिवार वालों पर क्या बीतती होगी?

इन बातों को दिल में रखिये… गाय-गाय नहीं “गौ सेवा” चिल्लाईये… जो गाय-गाय करे उससे कहो कि सड़क पर कूड़ा खा रही गाय को घर ले जाये और उसकी देखभाल करे.. फिर देखिए उसका गौमाता प्रेम कैसे छूमंतर होता है। यह बातें आपके ऊपर भी लागू होती हैं। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो छोड़ दीजिए अपना दोगलापन।
और इन नेताओं को नीच हरकतों को अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए।
और हां अगर आप गाय को अपने घर भी न ले जा पाएं तो दो बेहद सुरक्षित जगह बता देता हूँ, जाइए बाहर बेसहारा चारे के लिए घूम रहीं सभी गायों को पकड़कर मुख्यमंत्री आवास में और कुछ प्रधानमंत्री आवास में छोड़ दीजिये, गाय बेहद सुरक्षित भी रहेंगी और कम से कम इनको भी सेवा का मौका मिल जाएगा।

धन्यवाद
इसी के साथ…
आप सब खुश रहें स्वस्थ रहें और देशहित में सोचें। न कि नेताओं के हित में। ये सब अपना हित तलाशेंगे.. पूरा होने पर निकल लेंगे और आपको आपने जूते के तले रखेंगे..।
यही है आजकी असली राजनीति..।

 

 

 

*****

Manish Kumar

Editor-in-Chief,

Khabar24 Express

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