विश्व कुंडलिनी सिद्धि यंत्र:-
इस यंत्र में सोलह बीजाक्षरों से घिरा ईं कुंडलिनी बीजमंत्र है और उसमें उसके दोनों छोरों पर दो रत्न भी लगे है।ये प्रत्येक स्त्री और पुरुष के दो मुख्य छोर-1-मूलाधार चक्र-2-आज्ञाचक्र बिंदु है।जिससे इस यंत्र को दिए गए चित्र के अनुसार चांदी या सोने में बनवाकर प्रत्येक स्त्री पुरुष अपने अपने नाम और जन्म तारीख के मूल रत्नों को इसमें लगा कर, अपने गले में अपने जन्म के वार को ठीक जन्म समय पर धारण करें,और फिर अपने गुरु मंत्र के साथ जप ध्यान करें,तो अवश्य ही उस साधक की कुंडलिनी अन्य साधनाओं की अवधि से पूर्व शीघ्र और सन्तुलित होकर जाग्रत होगी।
इस यंत्र के चारों और बने विश्व वृत में जो सोलह बीजाक्षर हैं- सं,तं,यं,अं,उं,मं,सं,इं,दं,धं,आं,यं,ऐं,नं,मं,हं-ही सोलह कुंडलिनी शक्ति देवी हैं- जो इस प्रकार से हैं-सत्यई,तरुणी,यज्ञई,अरुणी, उरूवा,मनीषा,सिद्धा,इतिमा, दानेशी,धरणी,आज्ञेयी,यशेषी,ऐकली,नवेषी,मद्यई,हंसी !! और ईं इन सबकी पूरक एकल शक्ति रूप सत्यनारायण और पूर्णिमाँ है।
ईं महाबीजमंत्र रहस्य :-
ईँ-सत्य ॐ सिद्धायै नमः का शक्ति बीज है। जो यो ज्ञान से समझ आएगा, आओ- ईं महाबीजमंत्र की महिमा जाने..
ईँ -जैसा कुंडलिनी शक्ति का सर्वोच्च सर्वार्थ देने वाला स्त्री+पुरुष के एकाकार प्रेमवस्था का अद्धैत ब्रह्म प्रत्यक्ष अक्षर है। इसे बीज अक्षर कहना या वर्णक्षर कहना इसकी सम्पूर्णता को शब्दों में अभिव्यक्त करने की धृष्टता होगी। यो ये ॐ से भी उच्चतम व् पूरक साक्षात परब्रह्म प्रेमशक्ति है। जो सभी दैविक बीज अक्षरो को अपनी प्रेमाशक्ति से सम्पूर्ण करता है, जैसे-श्रीं ह्रीं क्लीं आदि और जो बीजाक्षर केवल इच्छा शक्ति की प्रस्फुटिता को ही प्रकट करता है। जैसे-ऐं वहाँ ईं ही इस ऐं को जो केवल इच्छा है, उसे शक्ति देता प्रकट हो कर पूर्ण करता है। यहाँ शक्ति इच्छा को प्रकट होने का बल दे रही है। यो ईं तन्त्र मन्त्र यन्त्र शास्त्रो में भगवती देवी यानि अनादि स्त्री शक्ति का शक्ति मन्त्र कहकर ॐ से भी महान बताया है। की ॐ स्त्री शक्ति की त्रिअवस्था से पंचम अवस्था की अभिव्यक्ति को प्रकट करता है-प्रथम-अ+उ+म तथा द्धितीय-ओ+ई+म तथा तृतीय-ओ+म तथा चतुर्थ-ओम तथा पंचम ॐ का विपरीत वर्णाक्षर उच्चारण म+उ+आ=माँ यहाँ अ में आ अंतिम ध्वनि विस्तार को प्रकट करता है। यो ॐ स्त्री शक्ति की पंचतत्व गुणों को प्रकट करता है। तभी स्त्री पंचतत्व प्रकर्ति कही जाती है। और यो ॐ से यानि कन्या+षोडशी +वधु+पत्नी+माता बनकर स्त्री पँच रूपो में भगवान या भग माने योनि और वान माने धारण करने वाली अर्थात योनि को धारण करने वाली भगवती भगवान है। और यो ॐ स्त्री से सब वर्णाक्षर जन्मे होने के कारण सारे वर्णाक्षरो के प्रथम लगाई जाती है। क्योकि ॐ यथार्थ में माँ है, और ईं इन सारे वर्णाक्षरो के मध्य शक्ति के रूप में प्रकट है। यो ये देखने में वर्णाक्षरो में गिना जाकर भी वर्णाक्षर नही है। यह एक मात्र वर्णाक्षरो को अपनी इच्छा से क्रिया और ज्ञान में बदलने के मध्य जो शक्ति द्धारा प्रस्फुटन और जागरण और विस्तार आदि अवस्थाये है, उसे अभिव्यक्त करने वाली महाशक्ति कुण्डलिनी शक्ति है। यही इग्ला नाड़ी चंद्र यानि स्त्री शक्ति + पिंगला नाड़ी यानि सूर्य नाड़ी या पुरुष शक्ति का प्रेम रमण यानि भोग+योग=सुषम्ना अर्थात मन को भी मंथित करने वाली आत्मा की शक्ति है। इसी ईं के द्धारा आत्मा अपनी सारी त्रिगुण शक्तियों-इच्छा+क्रिया+ज्ञान को प्रकट करती हुयी, इस भौतिक+आधात्मिक या सुसुप्ति+जागर्ति के मध्य द्रष्टा+स्रष्टा+आनन्दकारक बनी है। और ईं के आरम्भ से प्रत्येक वक्री अवस्था से लेकर मध्य- विश्राम और पुनः जागरण व् अंत प्रलय तक 7 चक्रों का निर्माण करती चलती है-1-ईँ का निचला प्रारंभिक भाग को देखे- तो वह चित्रण स्त्री व् पुरुष का योनि व् लिंग यानि मूलाधार चक्र है। यही से दोनों के संयुक्त प्रेम रमण से शक्ति जाग्रत होती है। और कुंडलिनी शक्ति नीचे से ऊपर तक अपने स्त्री+पुरुष के प्रेम रमण की क्रिया+प्रतिक्रिया के क्षेत्र बनती हुयी, दो से एक में सम्पूर्ण होती है। यही स्त्री+पुरुष के रूप में ईश्वर+ईश्वरी का प्रेम महारास है। जिसका वर्णन सभी धर्म के मतो में विभिन्न रूपो में महारास के रूप में किया है। इससे आगे जो ईं का पुनःमोड़ से पूर्व का भाग प्रतिक्रिया स्वाधिष्ठन चक्र है। और ईं का तीसरा भाग क्रिया मोड़ एक स्पष्ट चक्र को बनाता है। वही नाभि चक्र है और पुनः प्रतिक्रिया रूपी वक्री मोड़ ह्रदय चक्र है। और पुनः क्रिया रूपी मोड़ कंठ चक्र है। यहाँ आकर स्त्री+पुरुष का प्रेम रमण स्थिर होता है, यानि द्धैत से अद्धैत की और बढ़ता है। यहाँ दोनों सम्पूर्ण एकाकार होने प्रारम्भ होते है। दोनों का जो एक दूसरे को लेने+देने का जो अहंकारी भाव है, वो मिटता जाता है। यो यहाँ प्रेम में स्थिता का भाव आता है। यहीँ से संसार से परे दिव्य भाव की स्थिर अवस्था का उदय होता है। जहाँ से काम भाव में जो अतृप्ति-अभाव-मांग और पूर्ति आदि है, वो सब त्रिरोहित हो जाती है। केवल हम एक है। यही भाव शेष रह जाना प्रारम्भ हो जाता है। यो ये महाभाव का स्थान चक्र आज्ञा चक्र कहलाता है। जहाँ पर अवज्ञा नही है। बस है तो एक मात्र प्रेम सृष्टि की सम्मलित प्रेम आज्ञा की, जो हो रहा वो सभी सही व् सत्य है। यहाँ सब स्त्री+पुरुष का रूप समाप्त होकर केवल अरूप प्रेम यानि शक्ति बचती है। जिसके दर्शन करके कितने साधक यही समझते आये की- ईश्वर या ईश्वरी एक प्रकाश मात्र है। जो की उनकी अपूर्ण ज्ञान अवस्था है। यहाँ तो दोनों का एकाकार अवस्था का प्रेम ठहराव मात्र है, और पुनः यहाँ से प्रेम शक्ति एक होकर कुछ वक्री परन्तु सीधी ऊपर को बढ़ती है, और यही ईं मंत्र में स्थान सहस्त्र चक्र है। जहाँ से दोनों एक होकर लय अवस्था को प्राप्त होते है। परन्तु यहां कितने ही कॉल और कोई सीमा नही होते हुए भी अनन्त समय से लगने वाले स्थिर प्रतीत होने वाले महासमय के बाद ही दोनों पुनःइस एक प्रेमावस्था से जाग्रत होते है। जिसका नाम वेदों में कहा है की- जब सत असत कोई नही था, यानि न स्त्री थी न पुरुष था, तब केवल शून्य था। जो वास्तव में ऊपर कहि प्रेम अवस्था ही थी।अर्थात केवल प्रेम था। तब उस शून्य यानि प्रेम में हलचल हुयी अर्थात दोनों प्रेम से जाग्रत हुए और उस एकल ब्रह्म ने एकोहम् बहुस्याम का सङ्कल्प किया। जो वास्तव में इन दो स्त्री+पुरुष रूपी प्रेम युगल ब्रह्म ने परस्पर प्रेम सहमति से हम अवस्था से अपने जैसे अपनी ही अनेक प्रतिमूर्ति की, ये सृष्टि उत्पन्न की। जो ईँ के कुंडलिनी के ज्ञान से भक्तो को समझायी गयी है। जो पढ़ने में बड़ी कठिन लगेगी। परन्तु महाज्ञान यो ही समझ में नही आ जाता है। उसे समझने को गुरु दीक्षा के साथ बार बार पढ़कर आत्मसात करना पड़ता है। और करोगे तो अवश्य ज्ञान पाओगे। यही सत्यास्मि ज्ञान है। इसे पढ़ो और ईं की महिमा गाओ और मित्रो को भेजो।
विशेष:-जो भक्त चाहे तो केवल बिना चक्र के ही “ईं” महाबीज मंत्र को सोने या चांदी में बनवाकर अपने गले में अपने जन्म तारीख को और जिस समय जन्में है,उस जन्म समय पर पंचाम्रत से स्नान कराकर अपने गले में किसी भी चेन में धारण कर सकते है।ये अनेक प्रकार के शब्दों के दोषों को नष्ट करके रक्षा कर साधक की सभी मंत्र साधनाओं को बढ़ाएगा और विधार्थी की एकाग्रता के साथ,विवाह दोष,संतान,व्यापार,नोकरी में बांधा दोष आदि अनगिनत दोषो का सफल निराकरण करके अनन्त लाभ देगा।क्योकि पंचतत्व से निर्मित-रूप-रस-गंध-स्पर्श-शब्द के पंचदोष है-यो उनमें सबसे प्रथम है-शब्द दोष।ये शुद्ध होते ही सर्व दोष स्वयं संशोधन होकर लाभ देते है।
इस विषय पर किसी और लेख में विस्तार से बताऊंगा।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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