श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने एक ऐसी ही संस्था “सत्यास्मि मिशन” को महिलाओं के सम्मान में बनाया है। महिलाओं के अधिकार, उनके सम्मान के लिए हमेशा बात करने वाले श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने कुम्भ में महिलाओं के लिए शाही गंगा स्नान जैसी अहम बातों को आगे बढ़ाया है जो काफी सफल भी रही है।
सत्यास्मि मिशन द्धारा “कुम्भ गँगा स्नान” मे स्त्रियो को भी शाही स्नान जैसे पर्व पर पुरुषो की तरहा प्रथम या समान स्नान कि मांग को लेकर चल रहे आन्दोलन के 23-11-2018 दिन शुक्रवार कार्तिक पूर्णिमाँ पर्व पर- “पांचवी गंगा स्नानान्दोलन-छोटी गंगा-गंग नहर वलीपुरा बुलंदशहर:–इस विषय में इस सत्यास्मि मिशन के संस्थापक स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी बता रहे है की…
हमारे सनातन धर्म में कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक- में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष इस पर्व का आयोजन होता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। “अब आगामी 2019 का कुम्भ प्रयाग इलाहबाद में 21जनवरी से 19 फ़रवरी हो रहा है।”
खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशी में और वृहस्पति, मेष राशी में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को “कुम्भ स्नान-योग” कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलिक माना जाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है।
कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र ‘जयंत’ अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।
इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।
अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।
जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।
१०,००० ईसापूर्व (ईपू) – इतिहासकार एस बी रॉय ने अनुष्ठानिक नदी स्नान को स्वसिद्ध किया।
६०० ईपू – बौद्ध लेखों में नदी मेलों की उपस्थिति।
४०० ईपू – सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी दूत ने एक मेले को प्रतिवेदित किया।
ईपू ३०० ईस्वी – रॉय मानते हैं की मेले के वर्तमान स्वरूप ने इसी काल में स्वरूप लिया था। विभिन्न पुराणों और अन्य प्रचीन मौखिक परम्पराओं पर आधारित पाठों में पृथ्वी पर चार विभिन्न स्थानों पर अमृत गिरने का उल्लेख हुआ है।
५४७ – अभान नामक सबसे प्रारम्भिक अखाड़े का लिखित प्रतिवेदन इसी समय का है।
६०० – चीनी यात्री ह्यान-सेंग ने प्रयाग (वर्तमान इलाहाबाद) पर सम्राट हर्ष द्वारा आयोजित कुम्भ में स्नान किया।
९०४ – निरन्जनी अखाड़े का गठन।
११४६ – जूना अखाड़े का गठन।
१३०० – कानफटा योगी चरमपंथी साधु राजस्थान सेना में कार्यरत।
१३९८ – तैमूर, हिन्दुओं के प्रति सुल्तान की सहिष्णुता के दण्ड स्वरूप दिल्ली को ध्वस्त करता है और फिर हरिद्वार मेले की ओर कूच करता है और हजा़रों श्रद्धालुओं का नरसंहार करता है। विस्तार से – १३९८ हरिद्वार महाकुम्भ नरसंहार
१५६५ – मधुसूदन सरस्वती द्वारा दसनामी व्यव्स्था की लड़ाका इकाइयों का गठन।
१६८४ – फ़्रांसीसी यात्री तवेर्निए नें भारत में १२ लाख हिन्दू साधुओं के होने का अनुमान लगाया।
१६९० – नासिक मे शैव और वैष्णव साम्प्रदायों में संघर्ष; ६०,००० मरे।
१७६० – शैवों और वैष्णवों के बीच हरिद्वार मेलें में संघर्ष; १,८०० मरे।
१७८० – ब्रिटिशों द्वारा मठवासी समूहों के शाही स्नान के लिए व्यवस्था की स्थापना।
१८२० -हरिद्वार मेले में हुई भगदड़ से ४३० लोग मारे गए।
१९०६- ब्रिटिश कलवारी ने साधुओं के बीच मेला में हुई लड़ाई में बीचबचाव किया।
१९५४ – चालीस लाख लोगों अर्थात भारत की १% जनसंख्या ने इलाहाबाद में आयोजित कुम्भ में भागीदारी की; भगदड़ में कई सौ लोग मरे।
१९८९ – गिनिज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने ६ फ़रवरी के इलाहाबाद मेले में १.५ करोड़ लोगों की उपस्थिति प्रमाणित की, जोकी उस समय तक किसी एक उद्देश्य के लिए एकत्रित लोगों की सबसे बड़ी भीड़ थी।
१९९५ – इलाहाबाद के “अर्धकुम्भ” के दौरान ३० जनवरी के स्नान दिवस को २ करोड़ लोगों की उपस्थिति।
१९९८ – हरिद्वार महाकुम्भ में ५ करोड़ से अधिक श्रद्धालु चार महीनों के दौरान पधारे; १४ अप्रैल के एक दिन में १ करोड़ लोग उपस्थित।
२००१ – इलाहाबाद के मेले में छः सप्ताहों के दौरान ७ करोड़ श्रद्धालु, २४ जनवरी के अकेले दिन ३ करोड़ लोग उपस्थित।
२००३ – नासिक मेले में मुख्य स्नान दिवस पर ६० लाख लोग उपस्थित।
२००४ – उज्जैन मेला; मुख्य दिवस ५, १९, २२, २४ अप्रैल और ४ मई।
२००७ – इलाहाबाद मे अर्धकुम्भ। पवित्र नगरी इलाबाद में अर्धकुम्भ का आयोजन ३ जनवरी २००७ से २६ फ़रवरी २००७ तक हुआ।
२०१० – हरिद्वार में महाकुम्भ प्रारम्भ। १४ जनवरी २०१० से २८ अप्रैल २०१० तक आयोजित किया जाएगा। विस्तार से – २०१० हरिद्वार महाकुम्भ
२०१५ – नाशिक और त्रयंबकेश्वर।
2016-उज्जैन में हुआ।
2019-में प्रयाग इलाहबाद में-21 जनवरी से 19 फ़रवरी को होगा।
और 2022 में-5 फ़रवरी से 1 मार्च को हरिद्धार में होगा।
इस लेख के माध्यम से आपको एक ज्ञान मिला होगा की-इस कुम्भ के मेले का प्रारम्भ ही देवताओं और राक्षसों के अमृत कलश को लेकर परस्पर भयंकर रक्तपात युद्ध के उपरांत कुछ अमृत बूंदों के 12 स्थानों पर गिरने से हुआ।और यही युद्ध समयानुसार-
“”सन 1690 के इस कुम्भ के मेले में शैव सम्प्रदाय अपने वर्चस्व को लेकर वैष्णव सम्प्रदाय को इस कुंभ के मेले में”” अपने समानांतर शाही स्नान आदि को लेकर कितना भयंकर युद्ध किया जिसमें लगभग 60 हजार साधु और भक्त मारे गए थे और आगामी भी “सन् 1760 कुम्भ मेले के इस युद्ध” में भी पुनः इसी शैव और वैष्णवों के परस्पर गंगा स्नान में समान्तर स्नान आदि के वर्चस्व को लेकर लगभग 1,800 साधु और भक्तों का नरसंहार बलिदान हुआ।
इसके उपरांत भी पुनः एक बार और सन्-1906 में साधुओं के बीच अपने अपने सम्प्रदायों के वर्चस्व को लेकर रक्तपात युद्ध होने को हुआ जिसे उस समय की तत्कालिक ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप से टाला जा सका,अन्यथा कितने साधू और भक्त इस तीसरे युद्ध में धर्म के नाम पर बलिदान होते?
तब सोचो की-ये पुरुष अखाड़े कैसे-किसी स्त्री शक्ति अथवा किसी ऐसे ही स्त्री सम्प्रदायों को अपने साथ शाही स्नान में या उसीके समांतर किसी अन्य स्थान पर स्त्रियों को गंगा में सर्वप्रथम स्नान की अनुमति या सहयोग देंगे??
पूर्व की तरहां इस बार भी दिनाक 23 नवम्बर 2018 को कार्तिक पूर्णिमा के गंगा स्नान पर्व पर सत्यास्मि मिशन की महिलाओं और पुरुषों द्धारा-“पांचवी बार-स्वतंत्र कुंभ गंगा स्नान आंदोलन” को छोटी गंगा-गंग नहर वलीपुरा घाट पर स्त्री शक्ति के महावतार श्रीमद् पूर्णिमाँ देवी की दिव्य प्रतिमा को पञ्चामृत अभिषेक कराते हुए यज्ञानुष्ठान और धार्मिक संगीत जागरण किया जायेगा और सदूर से आये अनेक श्रद्धालुओं को भंडारें से प्रसाद वितरण किया जाएगा।और स्त्री को धर्म में पुरुष सन्तों की भांति गंगा के कुम्भ पर्व पर होने वाले शाही स्नान में प्रथम अथवा समानाधिकार की प्राप्ति होनी चाहिए।इस सम्बन्ध में अनेक स्त्रियों ने अपना अपना मत प्रकट करेंगी-और बताएंगी की- शँकराचार्य कहते है की-गंगा में प्रथम देवता फिर नागा सन्त फिर महामण्डलेश्वर और मण्डलेश्वर आदि सन्तों के स्नान के उपरांत स्त्रियों को स्नान का सोभाग्य अधिकार है,तब प्रश्न है की-गंगा भी स्त्री है और उसमे प्रथम स्नान करने वाले देवता पुरुष, नंगे नागा और ये महामण्डलेश्वर भी पुरुष है। तो क्या ये स्त्री का अपमान नही है की-स्त्री भी उसी ब्रह्म की अर्द्ध स्वरूप है जिसका पुरुष अर्द्ध स्वरूप है और दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण होते है यो ये मात्र कुछ कथित धर्माचार्यों पुरुषों का स्वतंत्र स्वार्थ भरा धर्म वर्चस्व है और स्त्री शक्ति की निम्न समझना है और हमारे सत्यास्मि मिशन की लगातार पहल के आंदोलन होते रहने से ही आज अनेक अखाड़ों ने अपने यहाँ स्त्रियों को मण्डलेश्वर बनाने की पहल की है- यहीं हमारे सत्यास्मि मिशन द्धारा स्त्री शक्ति की धर्म में सार्वभोमिक उन्नति और सफलता की पहचान है।इससे भी हम स्त्रियां प्रसन्न है और भविष्य के कुम्भ गंगा स्नान 2019 प्रयागराज (इलाहाबाद) में भी अवश्य ही कुछ न कुछ स्त्री शक्ति को इस सम्बन्ध में धार्मिक समांतर पहल और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी।
और पूर्व की तरहां ही तो क्या आज के वर्तमान युग में इसके लिए भी स्त्रियों को शैव और वैष्णवों की तरहां एक भयंकर युद्ध करना होगा? इस तरहां के कुम्भ मेलो का स्त्री और पुरुष के समान अधिकारों को लेकर भविष्य क्या है?
क्या वर्तमान युग में स्त्रियों को भी अपने धर्म में समनाधिकारों को लेने के लिए स्वतंत्र स्त्रियों की सेना खड़ी करनी होगी??

पर आज के युग में राष्टीय कानून की बड़ा सहयोग है।यो इसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आज कानून में स्त्री और पुरुष को सभी प्रकार के धर्म अधिकारों में समांतर अधिकार देने की सर्व सहमति और सम्पूर्ण क़ानूनी अधिकार भी दिया है।यो आज आप देखते है की-सत्यास्मि मिशन की स्त्री विषयकों धर्म में सामान अधिकारों को लेकर चल रहे आंदोलनों की इसी सन् 2000 से 2018 और वर्तमान तक की पहल का परिणाम सामने है की-तभी सभी अखाड़ों ने अपने अपने अखाड़ों में स्त्रियों को मण्डलेश्वर या महामण्डलेश्वर बनाना और नियुक्त करना प्रारम्भ किया है,साथ ही मन्दिरों में स्त्री प्रवेश और महंत आदि की व्यवस्था भी की गयी है।यही है- सत्यास्मि मिशन की स्त्री धर्म अधिकारों को लेकर विजय..!!!!
अतः-23-11-2018 को इसी विषय की सफलता को सत्यास्मि मिशन द्धारा पांचवा स्वतंत्र स्त्री शक्ति गंगा कुम्भ स्नान आंदोलन की पृष्टभूमि अपने जनपद बुलन्दशहर की छोटी गंगा-गंग नहर वलीपुरा घाट पर-स्त्री शक्ति महाअवतार पूर्णिमाँ देवी की दिव्य प्रतिमा की पंचाम्रत अभिषेक के साथ दिव्य मंत्रों से यज्ञानुष्ठान के उपरांत विशाल भण्डारें का आयोजन कर रहा है जिसमें आप सभी सम्मलित हो और अगामी कुम्भ मे स्त्रियो के प्रथम गँगा स्नान के लिये सभी स्त्रियो से अनुरोध है कि वे अपने इस धर्माधिकार के लिये सत्यास्मि मिशन को अपना सम्पूर्ण सहयोग ओर समर्थन दे।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ऊँ सिद्धायै नमः
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