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Home / Breaking News / पितृपक्ष (भाग-आठ) जन्मकुंडली में 12 प्रकार के पितृदोष, जानें बचने के उपाय, श्राद्ध तर्पण में कैसे करें भाग्य उदय? बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

पितृपक्ष (भाग-आठ) जन्मकुंडली में 12 प्रकार के पितृदोष, जानें बचने के उपाय, श्राद्ध तर्पण में कैसे करें भाग्य उदय? बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

“पितृदोष के बारे में संतों का मत है कि पूर्व जन्म के पापों के कारण या पितरों के श्राप के कारण यह दोष कुंडली में प्रकट होता है। अतः इसका निवारण पितृपक्ष में शास्त्रोक्त विधि से किया जाता है। अगर पितृदोष को समझ लिया जाए तो निवारण भी आसानी से किया जा सकता है।”

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के अनुसार मानव जीवन में कई समस्याएं मूलभूत आध्यात्मिक कारणों की वजह से होती हैं। उन कारणों में से एक है मृत पूर्वजों की अतृप्ति के कारण वंशजों को होने वाली तकलीफ जिसे जिसे पितृदोष कहते हैं। हम कई बार नए या शुभ कार्यों में पूर्वजों को भुला देते हैं इस वजह से भी नाराज पूर्वजों के कारण वंशजों को कई प्रकार का कष्ट होता है। यही पितृदोष है।

स्वामी जी पितृपक्ष के सात भाग पहले ही बता चुके हैं जिन्हें आप ख़बर 24 एक्सप्रेस पर पढ़ सकते हैं। नीचे दिए गए लिंक में भी बाकी भाग पढ़े जा सकते हैं।

 

पितृपक्ष (भाग सात), पितरों का सपने में दिखना होता है शुभ या अशुभ जानें यह महत्वपूर्ण तथ्य श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से

पितृपक्ष (भाग सात), पितरों का सपने में दिखना होता है शुभ या अशुभ जानें यह महत्वपूर्ण तथ्य श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से

तो आज जानते हैं आपकी जन्मकुंडली में 12 प्रकार के पितृपक्ष यानि पितृदोष, जानें इनका निवारण, और श्राद्ध तर्पण आदि कैसे हो श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज को इन बातों को पढ़ें और उन्हें दिल से करें

 

       

[भाग-8]

जन्मकुंडली में मूल रूप से पितृदोष को नवम भाव यानि धर्म के घर में राहु की स्थिति से जाना जाता है की-वहाँ राहु की शनि या अन्य ग्रहों से केसी युक्ति है।पर पितृदोष के दो अर्थ है-1-अपने ही अनेक पूर्वजन्म के किये 12 मुख्य दोष और -2-वर्तमान जन्म में किये अपने माता पिता और दादा दादी या ननसाल और 12 प्रकार के अन्य परिवार व् सामजिक प्रपंचों के किये से पाये 12 मुख्य दोष।और ये दोष जन्मकुंडली में कैसे है और इनके निवारण क्या है? आओ जाने-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी से….

1-प्रथम भाव :- यह लग्न यानि हम है,यो ये मुख्य घर भी कहलाता है। इस स्थान से व्यक्ति की शरीर की सबल या दुर्बल स्थिति, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज में से हम है या उनका शाप वरदान, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, अपने प्रति व् अन्यों के प्रति केसी मानसिकता है या रहेगी और पति या पत्नी या पार्टनर के प्रति मान सम्मान और उससे प्राप्ति का सुख दुःख और उस भोग योग से हम पर पड़ने वाला प्रभाव आदि को जाना जाता है।यो इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें।

2. द्वितीय भाव :- इसे धन भाव भी कहते हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, परिवार का सुख, घर की स्थिति, दाईं आँख, वाणी से लाभ या वाणी के दोष, जीभ, खाना-पीना, प्रारंभिक शिक्षा, संपत्ति के सही रूप में मिलने या नहीं मिलने और इन सबसे हानि या लाभ आदि के बारे में जाना जाता है।यो इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें।

3. तृतीय भाव :- इस घर को पराक्रम का सहज भाव भी कहते हैं। इससे जातक के बल पराक्रम शक्ति में उच्चता या हानि,डिप्रेशन, छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, पराक्रम, धैर्य, कंठ-फेफड़े, श्रवण स्थान, कंधे-हाथ के रोग या इनका सुख आदि का विचार किया जाता है।यो इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें।

4. चतुर्थ स्थान :- इस घर को माता व् सास का स्थान भी कहते हैं। इससे मातृसुख और सास सुख मिलेगा या उनसे कलह रहेगी, गृह सौख्‍य, वाहन सौख्‍य, बाग-बगीचा,वाहन की प्राप्ति और स्केंडहेण्ड वाहन,अग्नि कांड, जमीन-जायदाद, मित्र छाती पेट के रोग, मानसिक स्थिति और पूजाघर और ध्यान धारणा व् योगाभ्यास केसा और सफल होगा या नहीं आदि का विचार किया जाता है।यो इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें।

5. पंचम भाव :- इस घर को सुत व् शिष्य की प्राप्ति भाव भी कहते हैं। इससे संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख,शिष्य कैसे होंगे और विद्याध्ययन के बाद गुरु को यश या अपयश देंगे,व विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में सफलता मिलेगी या नहीं या टूटेगा और कितने अफेयर होंगें व् उनसे कितना अपयश मिलेगा, नौकरी परिवर्तन व् गर्भ धारण होगा या नहीं या लिवर कैसा रहेगा आदि का विचार किया जाता है।यो इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें।

6. छठा भाव :-ये घर को शत्रु या रोग स्थान भी कहते हैं। इससे जातक के श‍त्रु, रोग, भय, तनाव, कलह, मुकदमे, मामा-मौसी का सुख, नौकर-चाकर, जननांगों के रोग आदि का विचार किया जाता है।यो इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें।

सातवाँ भाव :-ये घर विवाह सौख्य, शैय्या सुख, जीवनसाथी का स्वभाव, व्यापार, पार्टनरशिप, दूर के प्रवास योग, कोर्ट कचहरी प्रकरण में यश-अपयश आदि का ज्ञान इस भाव से होता है। इसे विवाह स्थान कहते हैं।यो इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें।

आठवाँ भाव :- इस भाव को मृत्यु स्थान कहते हैं। इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें। यो इस घर आयु निर्धारण, दु:ख, आर्थिक स्थिति, मानसिक क्लेश, जननांगों के विकार, अचानक आने वाले संकटों का पता चलता है।

नवाँ भाव :- इसे भाग्य स्थान कहते हैं। इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें। यो यह भाव आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु बनाना,मिलना और गुरु से धोखा या उसे धोखा देना,मन्दिर बनाना व् मूर्ति रखने में दोष, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन,लेखन चोरी, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी और उससे अच्छे बुरे सम्बन्ध, दूसरा विवाह व् उसकी सफलता विफलता आदि के बारे में बताता है।

दसवाँ भाव :- इसे कर्म स्थान कहते हैं। इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें। यो इस भाव से राजयोग मिलना या भगं होना, पद-प्रतिष्ठा, बॉस, सामाजिक सम्मान, कार्य क्षमता, पितृ सुख, नौकरी व्यवसाय, शासन से लाभ, घुटनों का दर्द,सुसर से विवाद या लाभ होना, सासू माँ,शिष्यों से लाभ या हानि,नोकर या सन्तान की आय से लाभ या हानि आदि के बारे में पता चलता है।

ग्यारहवाँ भाव :- इसे लाभ भाव कहते हैं। इस भाव का पितृदोष का हमारे यहाँ दिए निम्न हमारी जीवन की आवश्यकताओं और इनसे सम्बंधित कारणों व घटनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है और हानि पाते है।इसका कारण है की-हमने अपने पूर्वजन्म व् वर्तमान जन्म में इस भाव क्षेत्र के बाहरी लोगों और परिजनों या इस सम्बंधित कार्य नोकरी आदि क्षेत्र में प्रपंच करके यानि छल करके केवल अपना ही स्वार्थ रख धोखा दिया और हानि पहुंचाई थी या है।यो ये सबमें से कोई एक और उस मुख्य दोष में ये यहाँ दिए सारे अन्य कारण उसको बढ़ाने में साहयक बनते है और ये सारी अवश्यक्ताएं हमारे लिए जीवन में मिलनी मुश्किल हो जाती है।यो इन सब बातों को आप अपने दैनिक जीवन में बांधित देखें,तो समझे इस भाव सम्बंधित पितृदोष है और उसका निवारण करें। इस भाव से मित्र व् मित्रता से लाभ या हानि, बहू-जँवाई, भेंट-उपहार, लाभ,जीवन सभी प्रकार के आय के तरीके और उनसे लाभ बचत या हानि,पैर की शक्ति या कमजोरी, पिंडली के बारे में जाना जाता है।

बारहवाँ भाव :-इस बारहवें भाव का पितृदोष का हमारे जीवन पर निम्न स्तर पर प्रभाव पड़ता है-चूँकि इस 12 वें घर को व्यय स्थान भी कहते हैं। इससे कर्ज, नुकसान,सदूर यात्रा व् व्यवसाय से लाभ या हानि, परदेश गमन, संन्यास लेना और उसमें सिद्धि या व्यर्थता मिलनी, अनैतिक सम्बंधों व् आचरण,सभी बुरे ड्रग के व्यसन, गुप्त शत्रु की प्रबलता या उनसे हानि,अपने जीवनसाथी या अन्य प्रेम सम्बन्ध से कैसा शैय्या सुख या दुःख मिलेगा, आत्महत्या, जेल यात्रा, मुकदमेबाजी में हार व् जीत का विचार किया जाता है।यो ठीक यही सारे दोषों में से कोई एक हमारे साथ मुख्य रूप से बन जाता है और उसके साथ साथ ये सारे दोष भी उसके बढ़ाने में साहयक होते जाते है।क्योकि ये दोष बनता है,हमारे किसी बाहरी व्यक्ति या सदूर स्थान के लोगों की सहयता मांगने और उसमे हमने उसके साथ छल प्रपंच करके उसका धन तन मन का शोषण किया होने से।

उपाय है:-इनमे से जो मुख्य कारण आपके जीवन में दिखाई दें,तो जानो उसी घर के उस प्रमुख कारण का आप पर पितृदोष है और पहले तो ये आवशयक है की-आप ठीक उसी घर के सम्बंधित अपने आचरण और आदत में तुरन्त सुधार करे।और उस घर के जीवित व्यक्ति से क्षमा मांगे या उस भाव या घर के सम्बंधित पूर्व पितृ को स्मरण करके उससे क्षमा मांगे की-मेने आपके साथ जो भी जाने अनजाने दोष किया है।उसके लिए मैं ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हूँ।और आपके लिए मैं अब नित्य 2 या 5 या 11 माला जप गुरु या इष्ट मंत्र के करूँगा की-जबतक आप मेरे स्वप्म में दर्शन देकर मुझे क्षमा नहीं करते है।और प्रत्येक रविवार या अमावस्या को मन्दिर में आपके नाम का अधिक से अधिक धन दान करूँगा और भगवान पर प्रसाद चढ़ाया करूँगा।प्रत्येक महीने की अमावस्या को यज्ञ या अंगारी पर आपके नाम की आहुति दिया करूँगा।यहां आपको उस पितृ का नाम नहीं पता है,तो केवल उस घर के जो स्वामी है-मानो पहले घर के अपने वंश के पितृ होते है।दूसरे घर के कुटुंब के पितृ,तीसरे के छोटे भाई व् बहिन व् मित्र,चोथे की माता और सास,पांचवे की शिष्य और संतान,छठे के नाना नानी मामा मामी,मौसी मौसा यानि ननसाल पितृ,सप्तम की पति या पत्नी,अष्टम के रास्ते में मिले लोग या कीड़े,सर्प,जानवर गाय आदि,नवम के गुरु और मन्दिर के देव देवी ग्रह आदि,दशम घर के पिता,सुसर,उच्चाधिकारी,ग्यारहवें के बड़े भाई,बहु जवाई,और कर्मचारी,मित्र।और बारहवें घर के सभी सदूर के लोग व् विदेशी लोग पितृ होते है।यो इनका आवाहन करते आहुति या जप करें,तो अवश्य उस घर से सम्बंधित कष्ट संकट दोष मिटकर आपकी शीघ्र लाभ मिलेगा।यो जरा इस लेख को ध्यान से पढ़े,समझे और उपाय करें,अवश्य कल्याण होगा।

 

इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः


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