आज स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज इसी पुस्तक के माध्यम से एक ऐसा खुलासा करने जा रहे हैं जिसको आप शायद ही जानते हों। श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज आज ऐसी जानकारी दे रहे हैं जिसे पढ़कर आप चौंक जाएंगे।
स्वामी विशुद्धानंद परमहंस जी के विषय में अनेक साधकों ने पाल ब्रटन की गुप्त भारत की खोज नामक प्रसिद्ध पुस्तक और स्वामी जी के प्रसिद्ध शिष्य श्री गोपीनाथ कविराज की पुस्तकों में इनके प्रत्यक्ष चमत्कारों की अनगिनत घटनाओं का उल्लेख है,जिन्हें पढ़कर साधक चमत्कृत रह जाता है और ज्ञानगंज में योग विज्ञानं का विद्याध्ययन का विषय भी बड़ा चमत्कारिक हैं।
फिर भी इनके विषय में संछिप्त परिचय ये है की- स्वामी जी का जन्म बंगाल के वर्धमान जिले में बंधूल गाँव में 21 मार्च 1856 को हुआ था व इनके बचपन का नाम भोलानाथ था होश सम्भालने पर ये अपने एक मित्र के साथ एक सन्यासी के द्वारा तिब्बत के ज्ञानगंज नामक स्थान पर पहुँचे वहाँ दोनों युवकों ने 12 वर्ष तक कठोर तप किया। परमहंस प्रभुराम से योग, परमहंस श्यामानन्द से चन्द्र विज्ञान, सूर्य विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, वायु विज्ञान आदि की शिक्षा ग्रहण की। इन दोनों को पूज्यपाद महातपा जी ने शिष्य के रूप में स्वीकार किया एवं मस्तक पर हाथ रख कर शक्ति संचार किया। इस सम्बंध में विस्तृत जानकारी के लिए गोपीनाथ कविराज की पुस्तक श्री-श्री विशुद्धानन्द का अध्ययन आवश्यक है। सन्यास ग्रहण करने के बाद इनका नाम विशुद्धानन्द परमहंस हुआ जिनको गन्धबाबा ;काली कमली वाले बाबाद्ध के नाम से भी बहुत ख्याति मिली।
इनके सिर के बाल काले थे और दाढ़ी सफेद थी ये एक व्यक्तित्त्व चमत्कार था।।
और शरीर में स्फटिक के गोलक छिपे रहते थे जिन्हें ये कभी कभी निकालते थे।
और शरीर में योग गर्मी के कारण एक अजगर पाल रखा था जो इनके शरीर पर नित्य लिपटता था।
ये विज्ञानमय कोष तक ही थे क्योकि विज्ञानमय कोष में ही शरीर ने विधुत का भयंकर आवेश और अन्य गुरु आत्माओ का समावेश होने से ऊर्जा तड़ित होती रहती है।आत्मा में प्रवेश करते ही योगी केवल सत्य संकल्पी होकर स्वयमेव सिद्धि अवस्था में पहुँच कर मनवांछित और स्थायी चमत्कार और कल्याणी हो जाता है साथ ही प्रकर्ति में अधिक हस्तक्षेप नही करता है,यो वो कालांतर तक पूज्य बना रहता है।और इस तरहां के विज्ञानवादी योगी केवल कुछ काल तक और अपने तक ही सिद्ध बने रहते है,इनसे जन साधारण का कोई कल्याण नहीं होता है।यो इनका भी कोई पंथ या शिष्य परम्परा आगे नहीं चली थी।
ये सब विषय पर मेने इनके एक शिष्य एस.एन.खण्डेवाल जी जिन्होंने इन पर लिखी कविराज जी की पुस्तक “अखण्ड महायोग” का अनुवाद लिखा है,उनसे पत्राचार करते हुए सम्पर्क किया जिसका उत्तर मुझे मेरे भेजे 27/8/2006 और 3/10/2006 में ही वापसी लिखकर मिला, की यहाँ जो सेवक राधिकारमण एडवोकेट जी की पत्नी के अग्निकांड में जल जाने के उपरांत भंग हो गयी है आदि आदि जिसे आप संलग्न पत्र में पढ़ सकते है।यहीं से मेरे मन में चिंतन प्रारम्भ हुआ की-इतने बड़े सिद्ध की परम्परा का अंत ऐसे कैसे हुआ? जबकि इसका उत्तर पूर्व की इन्हीं की लिखी पुस्तकों में मिल चूका है की- ज्ञानगंज से आदेश सिद्धों का विशुद्धानन्द जी को आ गया था की तुम अपनी स्वतंत्र शिष्य परम्परा नहीं चलाओगे,जबकि इनके उस काल में ही उनके शिष्य गोपीनाथ कविराज को भी गुरु आज्ञा हुयी की तुम भी दीक्षा नहीं दे सकते यो गोपीनाथ जी ने अपने शिष्य सीताराम दास को गुरु दीक्षा की आज्ञा दी जिन्होंने ये परम्परा चलाई पर ये भी आगे चलकर भंग हो गयी क्योंकि ज्ञानगंज से ही आदेश नहीं था और नाही सूक्ष्म सत्ताओं की दैविक साहयता मिलती थी तो सिद्ध दीक्षा पद्धति चलती ही कैसे?वाराणसी के कानन आश्रम में कुमारी सेवा की यानि नवरात्रि में विशेष पूजा की व्यवस्था की गयी थी पर वो भी विशेष नहीं चली।ये सब विषय को लेकर मैने कुछ दिनों को विशुद्धानंद जी को स्मरण का विषय बनाते हुए चिंतन किया,तब देखा कि एक पूजा का कमरा है उसमें एक देवी की प्रतिमा जो जीवंत और दिव्य आभा लिए स्थापित है उसके पास परमहंस पद्मासन में बैठे है और उनके सामने कोई मध्यायु के पुरुष शिष्य दीक्षा को बैठे है,तब उन्होंने एक कुशा का कपड़ा मढ़ा हुआ आसन जिसमें उन्हें दिखाते हुए बोले-की इसमें चारों कोनों पर चार ताबीज लगाये है और मध्य में एक ताबीज लगाया है जिससे ये आसन अब सिद्धासन बन गया है,इसमें जितना जप संख्यानुसार बताया जायेगा,उसे करने पर जो चिन्मयकोश बनेगा उससे तुम्हारी साधना खण्डित नही होगी नित्य वही से प्राप्त होती रहेगी और स्मरण रहे इस पर कोई भी नहीं बेठ पाये अन्यथा ये आसन भंग हो जायेगा।वो शिष्य नमन कर रहे है की ऐसा ही होगा।तब बाबा जी ने कहा की अब ये तुम्हारे लिए एक ताबीज है,जिसे अपने गले में सदा धारण किये रहना और किसी को छूने नहीं देना है,ये तुम्हारा साधना और जीवन का रक्षा कवच सिद्ध होगा।और ये जो गाय का घी लाये हो इससे दिव्य विधि से ज्योत की जा रही है,यो कहते हुए मंत्रोउच्चारण किया और उस दीपक में ज्योति प्रज्वलित हो गयी।तब उन्होंने ध्यान लगाया और तब लगा की उनके शरीर में जैसे एक के बाद एक तीन दिव्य सत्ताओं का आवाहन होता गया और अब पहले वाले विशुद्धानंद जी में और अब के विशुद्धानंद जी में महान अंतर दिखाई दिया,अब के बाबा में प्रबल विधुत के आकर्षण शक्ति की ऊर्जा सम्पूर्ण कमरें में तड़ित हो रही थी,जिस के बल से भक्त भी आवेशित हो रहा था। तब बाबा जी ने उसके सिर पर अपना हाथ आशीर्वाद स्वरूप रखा और कोई मंत्रोउच्चरण किया।जिससे भक्त पुरुष के शरीर में भी विधुत तड़ित हुयी और देह भान लुप्त सा प्रतीत हुआ,तब बाबा जी ने आँखे खोली जिनमें से तेज प्रकाशित हो रहा था और बोले की-अब तुम्हें दिव्य देह की प्राप्ति हो गयी है जिसका भान तुम्हे साधना करते में पता चलेगा और अनेक दिव्यताओं और विभूतियों का समयानुसार अनुभव करोगे और स्मरण रखना की तुम्हारी पत्नी दीक्षित नहीं है वो तुम्हारे पूजाघर में प्रवेश नहीं करे और तुम भी जागतिक संसारी भाव लेकर वहाँ नहीं जाना,केवल तुम्हारी माता जी ही जा सकती है क्योकि वो तुम्हारी जननी है।यो कहते ही पुनः वे ध्यानस्थ हुए और उनके शरीर से वो त्रिसत्ता का भाव मुक्त हुआ लगा।और उन्होंने भक्त को कहा जाओ।इस आदेश के साथ ही मुझे भी ध्यान में चेतना होती चली गयी।और समयानुसार ज्ञान हुआ की इनके शरीर में दीक्षा देते समय इनके परम गुरु के उपरांत इनके मूल गुरुदेव की देह का आवेश होता था।तब ये दीक्षा शक्तिपात करते थे और यही रहस्य था की सूक्ष्म सत्ताओं के सम्पर्क से ही ये सूर्य आदि विज्ञानों का ज्ञान प्राप्त करते हुए चमत्कार करते थे।वेसे भी शक्तिपात का रहस्य है की जिससे शक्ति मिलती है उसके गुरु क्रमानुसार ही शक्ति क्रम से साधक के शरीर में आवेशित होता है,यहाँ जो भी स्त्री या पुरुष साधक अपने भौतिक शरीर का समर्पण गुरु को नहीं करते है उनके शरीर में ये पहले गुरु शक्ति फिर स्त्री शक्ति जिन्हें भैरवी कहते है और पुरुष शक्ति जिन्हें भैरव कहते है उनका भावेश नही आता है यो इन सबके सूक्ष्म शरीर में मेल होने पर ही साधक का सूक्ष्म शरीर एक प्रबल प्राकृतिक विधुतीय आवेश से घिर कर एक विधुतघर बन जाता है तब वो जिस पदार्थ की इच्छा करता है,वही वस्तु प्रकर्ति में जिस भी स्थान पर उपलब्ध होती है,वे भैरवी या भैरव या स्वमेव साधक का सूक्ष्म शरीर ही आकर्षित कर उसे साधक तक उपस्थित कर देता है,जो सामान्यजन को शून्य से वस्तु उत्पन्न करने के अद्धभुत चमत्कार लगते है,ठीक ऐसे ही विज्ञानमय कोष तक ही ये ज्ञानगंज का सिद्ध लोक का प्रभाव और पकड़ है,यो यहाँ और इससे जुड़े सभी साधक चमत्कारी सिद्ध कहलाते है। पर इसके लिए गुरु प्रदत्त मन्त्रों का विधिवत नियम से जप करते हुए ये शरीर को शुद्ध करना पड़ता है और ये नहीं की आप संसारी कार्यों में भोगो में उस ऊर्जा को खर्च कर दे और चमत्कारों और दिव्यता की अनुभूतियों के भी दर्शनों को देखना चाहे।ऐसा सम्भव नहीं है।ठीक जब मूलाधार खुलता है तब भोग बड़े प्रबल हो जाते है यो उस समय गुरु अनुसार ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए ये विषय गुरु से ही बड़े गम्भीर रहस्य को शरणागत होकर जाने।
सूर्य विज्ञानं क्या है?:-सूर्य को हमारी आत्मा के समान माना गया है,यो इसे आत्मविज्ञान भी कहते है,इसमें गुरु शिष्य को शक्तिपात करके उसके सूर्य स्वर की प्रबलता की वृद्धि करते हुए उसे ध्यान जगत में प्रवेश कराते हुए अपने चिदाकाश में सूर्य के दर्शन पर अंतरः त्राटक यानि सूर्य में संयम् करने का अंतर निर्देश देते है- की अपना सारा ध्यान सूर्य को अपने ध्यान में प्रत्यक्ष करें,तब सूर्य के दर्शन होते है इसके बाद उसकी सप्त रश्मियों के दर्शन और उसके बाद एक एक करके सातों रश्मियों के भिन्न भिन्न दर्शनों के साथ उनमें संयम करते हुए उन्हें अपने ध्यान के बल से एक दूसरे से भिन्न करने और इन सातों रश्मियों का इस प्रत्यक्ष प्रकर्ति और जगत में किसी धातु या पदार्थ और जीव् के शरीर में किस प्रकार से कार्य और नियंत्रण है,उसे जानना और ज्ञान के साथ नियंत्रण भी करना होता है साथ ही किसकी किससे युक्ति करनी है,उसका ज्ञान करना आता है,साथ ही एक भिन्न रश्मि जो इन सातों रश्मियों की मूल शक्ति है-जिसकी घोषणा वेद और गायत्री करती है-उस तत्व को आयत किया जाता है जिसे फाउंडेशन या आधार कहते है जिस पर इन सारी रश्मियों को एकत्र करते हुए एक दूसरे से संयुक्त किया जाता है तभी किसी भी पदार्थ की नवीन सृष्टि या रूपांतरित सृष्टि की जाती है,ये कला सीखी जाती है यो इसमें शिष्य की छमता अनुसार अनेक वर्ष लग जाते है।यो पहले अपने शरीर के सारे उपादानों यानि स्तरों को यानि अणुओ को बदला जाता है उसे विधुत घर बनाया जाता है ताकि वो ये सब आवेशित करते हुए उसे आकर्षित कर और उसे ग्रहण करने के साथ उसे अपने में आत्मसात करने के उपरांत उसे जगत में प्रकट भी कर सके,नाकि केवल ध्यान में देखता ही रहे जैसा की ध्यानी दृश्यों को देखता है उसमें कोई नवीनता अपनी इच्छा शक्ति से नहीं कर सकता है।यो चमत्कार नही होते है।
इसके लिए विशुद्धानन्द जी की ध्यान विधि यानि क्रिया योग था जिसका पता मैने ध्यान में लगाया और देखा की- वे अपने कमरे को बन्द करके बैठते थे ताकि कोई मन और तन में बाहरी विक्षोभ नहीं हो और जब उनके शरीर में एक विकट ऊर्जा की उत्पत्ति हो उससे आसपास का वातावरण भी विधुतमय हो जाता है,यो कोई परिवारिक या अनजाना व्यक्ति वहाँ प्रवेश कर उस विधुत से आघात नही खा जाये,जैसा की जब स्त्री साधिकाएं घर में ध्यान करती है तब उनके बच्चे आकर उनसे लिपट या उन्हें छूते हुए उन्हें उठाते है,यो उस समयकी प्राप्त ऊर्जा उनमें अनावश्यक रूप से प्रवाहित हो जाती है और उनके भाव और स्वभाव में अचानक परिवर्तन हो जाता है जो उन साधिका माँओं को पता नहीं, चलता की ये बच्चे को क्या हो गया है? यो साधनाओ को एकांत और केवल गुरु निर्देश ही चलता है,नाकि आजकी तरहां की गुरु ही ये यो नही कर सकते इसे यो नही कर सकते है? तब कुछ नही प्राप्त होता है।ये कल्पना जगत नही बड़ा विकट जीवन मृत्यु का खेल है। तब अपने में जो गुरु का शक्तिपात की शक्ति है उसकी तरंगों को अपनी रीढ़ की हड्डी में आज्ञा चक्र से मूलाधार चक्र तक आरोह अवरोह यानि अनुलोम विलोम करते रहते हुए धीरे धीरे स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में यानि मनोमय कोष में प्रवेश किया जाता है, तब इस मन की शक्ति के निरन्तर घर्षण रूपी क्रिया योग के संघर्ष से शरीर से एक दिव्य गन्ध निकलनी प्रारम्भ होती है उसके लिए ही ब्रह्मचर्य की रहस्यमयी कला ज्ञान की आवश्यकता है।वही बीज ही सूक्ष्म में रूपांतरित होता गन्ध बनता है जिसका थोडा सा आभास साधक को कभी कभी अपने आसपास नजर आता है की-आज तो आने कहाँ से बड़ी अच्छी सुगन्ध आ रही है? ये उसका एक अनजाने में किये अभ्यास का आभास मात्र है।
यही मैने विश्व की सर्वश्रेष्ठ क्रिया योग की खोज की और भक्तों को दी है जिसके समयानुसार करते रहने से स्वयं ही आत्मज्ञान “अहम् सत्यास्मि” उपलब्ध हो जाता है।
-विशेष जानकारी के लिए हमारे प्रकाशित ग्रन्थ सत्यास्मि को हमारी वेबसाइट पर पढ़े।।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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