“श्री सदगुरू बोध”-पुस्तक ऐसे रहस्यों को उजागर करती है जो हमारे जीवन में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। हम बहुत से रहस्यों के लिए न जाने कहाँ-कहाँ जाते और किस-किस से मिलते हैं? लेकिन रहस्य-रहस्य ही बने रहते हैं।
श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज की यह पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी। तो आइए जानते हैं इस पुस्तक के कुछ महत्त्वपूर्ण हिस्सों को : –
इस विषय पर मेरा चिंतन तब गया जब हमारे बीच के दादा रघुराज सिंह तौमर पहलवान जो अपने काल में अविजित “कमिश्नरी विजेता” रहे थे,तब कमिश्नरी आगरे से सहारनपुर आदि तक की सीमा क्षेत्र से बनी थी और बुलंदशहर जिले में लगभग सन 23- सन् 55 तक इनका कोई समकालीन पहलवान नहीं था,इनके पास चाँदी की बड़ी आकार की गदा पुरुष्कृत में मिली थी।और ये अनेक कारणों से अपनी स्म्रति मृत्यु तक गवाँ बैठे थे,ये सन् अस्सी के दशक की बात है,तब भी किसी ने कहा था की पहलवान जी की चिता पर कोई रात्रि में तांत्रिक आया था उसने उनको बांधकर अपने साथ ले गया है,ऐसी उनके अनेक चेलो में ग्रामीण अफवाह हुयी,आगामी वर्षों में अनेक बार मैने अपने पास अपनी परिवारिक विपदाओं के समाधान को आने वाले अनेक व्यक्तियों के माध्यम से भी ये निरन्तर सुना की- गुरु जी-हमारे पितरों को किसी ने बंधवा रखा है,यो वे हमें दुखी दीखते और हमें भी दिखाई देते है,इस विषय को लेकर मैने उन्हें अनेक तार्किक खण्डन सुनाये,पर उन्हें समाधान भी मिला,पर पितरों के विषयों में जिज्ञासा शांत नहीं हुयी।साथ ही समाज में ये भी आत्याधिक प्रचलित है की-उस तांत्रिक ने श्मशान साधना करके अनेक भुत प्रेत,जिन्नातों या कर्ण पिशाचिनी की या द्रष्टि वेताल की सिद्धि कर रखी है,वो ही श्मशान में जाकर दीपावली और होली या ग्रहणों पर पितरों को अपने वशीभूत करते है,यो इसी ज्ञान के समाधान को मैने उस कालीन अपने ध्यान को इस विषय की खोज में जोड़ा।और तब उस समय उपलब्ध एक तांत्रिक ग्रन्थ से मैने एक कर्णपिशाचनी का मंत्र ग्रहण किया जो इस प्रकार से था-“”ॐ नमो कर्ण पिशाचनी अमोघ सत्य वादनि मम् कर्णे अवतर अवतर अतीत अनागत वर्तमानी मम द्रश्य कथय कथय ह्रीं कर्ण पिशाचनी स्वाहा””का जप भी करते हुए इस विषय को जानने हेतु ज्ञान संकल्प किया और उसी रात्रि मुझे दिखा की मैं एक अपने उलटे हाथ पर पड़ने वाले त्रिराहे पर बने एक केलों की बाड़ी से घिरे छोटे से मन्दिर के पास हूँ,जहाँ अनेक लोग किसी की प्रतीक्षा मे बैठे है,मैने वहां बाहर खड़े लोगों से पूछा-तो बोले यहाँ एक तांत्रिक है,जो अपने पास आने वाले भक्तों के प्रश्नों का उत्तर,अपने पास ही टँगे काले पर्दे के पीछे जाकर किसी दैविक शक्ति से पूछ कर आकर देता है,उसके उपरांत और भी उसके पास चमत्कारिक शक्तियां है,पर बीती बात अधिक बताता है,भविष्य की बातें कम।दो एक लोगों ने उसे धोखेबाज भी कहा।ये सब सुन मैं उस मन्दिर में प्रवेश किया और पाया की, वहाँ भक्त ही बैठे थे,वो तांत्रिक नहीं थे,ये देख मैने तुरन्त जाकर उस काले पर्दे की पीछे क्या है?जानने को झाँका!!तो देखा वहाँ एक तेल के बड़े से दीपक में बड़ी सी ज्योत जल रही है,और उसकी शक्ति पूर्ण रहस्यमयी आभा फेली है,बस तभी वो तांत्रिक मेरे पास आ गया,कुछ नाराज सा हुआ,पर मुझे देखा कुछ बोला नहीं,तब मेने उन्हें देखा-वे एक मध्यायु के ताम्बई रंग के स्थूलकाय शरीर पर अनेक मालाएं पहने,दाढ़ी मूछें और सिर के बाल कुछ बढ़े से हुए मोटी आँखों वाले है,तब मैने उनसे कहा की-मैं भी सीखूंगा,ये विद्या और मुझे सिखाओं!! ये सुन वे बोले ठीक है और उन्होंने भक्तों से अलग ले जाकर मुझे मेरे उलटे हाथ की हथेली को फेलाते हुए उस पर सात बार ह्रीं बीज मंत्र बोलते हुए अपनी फूँक मारी,कहा की इसे जपना अगला मंत्र फिर मिलेगा और दर्शन होंगे और उनमे तीर्व शक्ति का स्फुरण हुआ यो उन्होंने मुझे अपने आलिंगन में भरा और उसके प्रभाव से उन्हें स्खलन हुया,तभी उन्होंने उस स्खलित अपने वीर्य को एक पन्नी की थैली में करके बांध कर मुझे देते हुये कहा की-इसे दक्षिण दिशा की और मुख करके शौच की मुद्रा में बैठते हुए इस बीज थैली को नीचे करें गढ्ढे में रखते हुए जप करना और वे चले जाने को हुए तो,ये सब अनुभूत करते हुए ज्यों ही मैने पहले ह्रीं मंत्र को वहीं खड़े होकर जपा-तो मुझे उनके उलटे कान पर चांदी से जड़ा एक पत्र मढा हुआ दिखाई दिया,जिस पर पहले क्रम से ये मंत्र ॐ..फिर नीचे ह्रीं क्लीं क्लीं(यहाँ इस स्थान पर दो स्त्री और पुरुष देव के चांदी के ही चहरे वाले सुंदर चित्र बने थे) फिर नमः लिखा देखा-यो मंत्र हुआ-“ॐ ह्रीं क्लीं क्लीं नमः“।तब मेने ऐसे ही बैठकर जप करने को बेठा तो,हमारी एक परिचित भक्त सुषमा वहाँ आकर खड़ी हो गयी और बोली-ये तांत्रिक झुटा है,ऐसे कुछ नहीं होता है,इधर मैं जपता जा रहा हूँ साथ ही उन्हें मना करता जा रहा हूँ की-वे ये सुन रहे है और वे अद्रश्य से मुझे दिख रहे है।बस यही मेरा ध्यान टूट गया।तब उस दिन सप्तमी और 7 अंकों का दिन माह और वर्ष का योग बना था। आगामी समय मेने इसी मंत्र को शौच में बैठकर रात्रि में जपा और फिर ध्यान करने बेठा तब कुछ विशेष नहीं दिखा,कुछ दिनों के पश्चात मुझे दिखा की-एक तांत्रिक है जो किसी के पितरों की बनी समाधि स्थल पर खड़ा है, और मन में कह रहा है की आज बड़ी दीपावली है,अब छण आ गया जब मैं इन्हें अपने वश में करूँगा। तब उसने दक्षिण मुखी होकर उस समाधि स्थल के चारों और चारों दिशा में चार दीपक जलाये और पांचवा दीपक अपने सामने की और जलाया जिससे उसकी और ही वो आत्मा वशीभूत होकर आये यो ये पांचवा दीपक एक द्धार हुआ।और वहीं दो जोड़े कपड़े जिनमें पुरुष को और स्त्री को दिए जाने वाला सारा श्रंगार के साथ चूड़ियाँ और चप्पल भी थी रखी औरतब उसने वहाँ एक कण्डे पर बहुत सारा कपूर जलाया और समाधि की और अपने हाथ करके एक एक मन्त्रोच्चारण के साथ एक एक आहुति कंडे में फेंकते हुए जप प्रारम्भ किये।मैं मन की आँखों से देख रहा हूँ की-उसकी सामग्री में काले तिल,ज्यो,बताशे,कपूर को घी और सरसों के तेल से मिश्रित किये हुए था वहाँ ज्यादा वस्तुओं की बनाई सामग्री नही थी।(यहां ज्यो और तिल भिन्न मन्त्रों से अभिमन्त्रित होते है उन्हें एक साथ मिलाकर आहुति दी जाती है)।तब मुझे भी लगने लगा की एक आकर्षण शक्ति का प्रवाह वहाँ उस समाधि की और बढ़ता हुआ उसे अपने घेरे में ले रहा है,मुझे भी खिंचाव सा लग रहा था चूँकि मैं उस तांत्रिक के पीछे की और था यो प्रभावी नहीं हो रहा था,तब वहाँ बनी समाधी स्थल से और पास की दो और छोटी सी समाधियों से सुगन्धित धुएं की आकृति के एकत्र होने का शक्तिमण्डल दिखाई देने लगा और उस तांत्रिक की और पांचवे दीपक के पास से आता चला गया।तब मेने देखा की वो सब शक्तिमण्डल उस तांत्रिक के गले में लटके ताबीज में समाहित होता चला गया।मेरे अनुमान से उसने वे मंत्र कुछ संकल्पित संख्या में ही जपे होंगे।और तब उस तांत्रिक ने क्रिया रोकी और अपने शरीर पर हाथ फेरते हुए अपने गुरु को स्मरण किया और वहाँ रखी सब वस्त्रों को उठाया तब द्रश्य बदला और देखा की आगे बढ़कर उसने उसे एक श्मशान के चांडाल परिवार को दक्षिणा के साथ दिया था।और फिर अपनी गद्दी पर बेठा लोगों के मनोरथ सुन रहा है।यो पता चला की श्मशान में नहीं बल्कि जो मनुष्यों के द्धारा बनवाये गए अपने पितरों के समाधी स्थलों और ऐसे ही स्थानों पर ही ये तांत्रिक साधना करते हुए उनकी आत्माओं को अपने वशीभूत करते है।यहां अनेक तर्क हो सकते है की आत्मा तो जन्म ले लेती है।पर जब हम अपने पितरों के स्मरण स्थलो का निर्माण कराते है तब हमारी ही भावना के वशीभूत उन पितरों का वहाँ आत्म अंश निवास करने लगता है।वही पितरों की आत्मा और हमारे अपने आत्म संकल्प मिलकर हमारे मनोरथों को पूर्ण करते दीखते है।जैसा कर्म करोगे वेसा फल मिलेगा का यहां सूत्र कार्य करता है।ये सब सकारात्मक ऊर्जाओं का अपने में आत्मसात करने का विज्ञानं है।जो तंत्र विज्ञानं के अंतर्गत है।यहीं योग में भी है,मात्र नामों का अर्थ बदलता है। योगी अपनी आत्मा को विश्वात्मा यानि अपनी आत्मा के अनन्त विस्तृत स्वरूप को विस्तारित करते हुए अनन्त शक्ति की प्राप्ति करते है और तांत्रिक या मांत्रिक विज्ञानवादी जन अपने भक्तों में मन्त्रों को बाँटते हुए अपनी आत्मा के साथ उनकी आत्माओं को सम्मलित करते हुए एक विशालतम ऊर्जा का शक्ति क्षेत्र बनाते सर्व कल्याण करते है।ठीक इसके विपरीत नकारात्मक भाव की साधना करने वाले भी ऐसे ही अपने में अनेक छोटी बड़ी संसारिक भावो में जीने वाली इच्छाधारी आत्माओं की आत्मसात करते हुए अपने में शक्ति अर्जित करते है।यो सनातनी चिंतन में सभी मृत व्यक्ति को अग्नि दी जाती है ताकि ऐसी विद्याओं के उपयोग नहीं हो सके।यो भक्तों अब अधिकतर लोगों की ग्रामीण भूमियाँ कम या समाप्त होती जा रही है,यो अपने पितरों को लोग उठाकर अपने रहने के मकानों की छतों पर रख लेते है और उससे उन्हें कुछ समय बाद ही लाभ की जगहां बुरे सपने,और धन,तन आदि अनेक हानियों का सामना करना पड़ता है क्योकि पहले समय में अधिक भूमि होने से अपने खेतों पर ही किसी पुराने पीपल या वट वृक्ष के नीचे पितरों का त्रिकोणीय आवास बनवा दिया जाता था और वहां होली दीपावली और मांगलिक कार्यों आदि त्योहारों पर जाकर पूजा की जाती थी,वेसे तो ये अपने पैत्रक भूमि और गांव के लोगों से अधिकतर संपर्क बनाये रखने का एक धार्मिक अर्थ था,फिर भी भूमि समाप्ति पर जिसने वो भूमि खरीदी वो कहता है की भई अपने पितरो को यहां से ले जाओ।तब लोग कथित पण्डितों के अनुसार अपने घर में या छत पे रख लेते है,वहां उनके ऊपर बच्चों के द्धारा कुछ न कुछ गन्दगी चली जाती है,यो भी परिवार के लोगो में एक भय व्याप्त होता होता दुःस्वप्न बन डराता है।और आपकी छत पर एक विचित्र ऊर्जा क्षेत्र भी बन जाने से घर का ऊर्जा क्षेत्र बंधित होता है,यो अधिकतर मेने आगे चलकर इस समस्या से ग्रस्त भक्तों के पितरों को गंगा जी में पूर्णमासी को पण्डित द्धारा जप तर्पण करा सिलवाने का उपाय बताया और समस्या का सफल समाधान किया। यो स्मरण रखो की सच्ची साधना श्मशान में नही जैसा की कथित तांत्रिकों ने फेलाया हुआ है की हम श्मशान में रहते है वहां दिगम्बरी और कपालिक साधना यज्ञानुष्ठान करते है आदि आदि बल्कि ये सब साधनाएं इस प्रकार के तन्त्र अनुष्ठान के माध्यम से ही सिद्ध होती है, यहां बहुत सी बातें मैने छिपा भी दी है।जो प्रकाशय योग्य नहीं है यो ये भक्तों के ज्ञान वर्धन को दी है।पर ये यहाँ दिए मंत्र सम्पूर्ण ओर सच्चे और मेरे द्धारा अनुभूत किये हैं।और शेष रहा कुछ ज्ञान आगामी स्थान पर कहूँगा।।
विशेष ज्ञान के लिए हमारा सत्यास्मि ग्रन्थ को वेबसाइट पे पढ़े।।
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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
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