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श्री कृष्णा जन्माष्टमी पर विशेष : गीता के वो सच्चे उपदेश जो बदलकर रख देंगे आपकी जिंदगी, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज की जुबानी

 

 

 

 

आज श्री कृष्ण जन्माष्ठमी है, और श्री कृष्ण की लीला पर श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज ने उनकी महिमा का वर्णन करते हुए गीता के उपदेशों को जीवंत कर दिया है।

 

 

गीता न केवल धर्म का उपदेश देती है, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती है। महाभारत के युद्ध के पहले अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। गीता के उपदेशों पर चलकर न केवल हम स्वयं का, बल्कि समाज का कल्याण भी कर सकते हैं।

 

 

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज भगवान श्री कृष्ण की जीवन कथा पथ पर गीता रथ में बैठकर आपको ले जाते हुए जीवन का यथार्थ सत्य उपदेश दे रहे है कि :-

 

 

“कृष्ण पथ पर गीता रथ”

कृष्ण कथा से सीखा क्या है?
जन्माष्टमी व्रत,रखे अनवरत।
और सजाये,झांकी दर्शन को
ज्ञान त्याग,निहारे बन भक्त।।
ज्ञान दिया,स्वयं निर्भरता का
पंचदेव नवग्रह,पूजन को रोक।
उठा गोवर्धन,सात दिन कंग पे
उसी ज्ञान को,दिया आज झोंक।।
गो व्रद्धि करो,बल बुद्धि बढ़ाओ
और जीव जीव् से,करो प्रेम।
खेलों खेल,तरहां तरहां के
मित्रता निभाओ,अहैतुक प्रेम।।
शत्रु दंडित करो,करे जो आक्रमण
व्यर्थ किसी ना,सताओ कभी।
क्षमा करो जो,शरण में आये
प्रेम से आये,वो पाये अभी।।
वचन की रक्षा,सदा ही करना
दिया वचन,ना कभी विस्मरण।
जिस गांव या देश,रहो कहीं भी
उसकी रक्षा,करो आमरण।।
गुरु परम्परा करो,सदा पालन
और गुरु दक्षिणा दे,उतारो ऋण।
चाहे गुरु ,सामान्य कोई हो
शिष्यविद्या फलती पराक्रम स्वेच्छक्ष।।
रिश्ते रिश्तेदारी,निभाओ
और करो उनका,सदा सम्मान।
सहन अपमान,कभी ना करना
जो रखता हो,सदा अभिमान।।
भक्त की रक्षा,सदा ही करना
यो सदा बढ़ाओ,स्वं योगबल।
आत्म उपासना,उद्धेश्य मूल हो
अहम् सत्यास्मि,ले आत्मबल।।
इस संसार में,सत्य स्वयं हो
और आत्ममन्त्र से,कोई बढ़ा न मंत्र।
भूतकाल से सीख,बढ़ जाओ
वर्तमान बनाओ,यही भविष्य है मंत्र।
अष्ट विकार,अष्ट सुकार बनाकर
अष्टमी सावन ,जन्म लिया।
अमावस कर्म से,बना पूर्णिमा
अष्टांग योग,कर्म जीवन्त किया।।
कर्म करो फल सदा,आधीन स्वयं हो
सत्य के परमपरा पथ चलो।
सत्य के रथ के,बनो सारथी
यही मेरा गीत,गाते चलो।।
जो करे मैं का,सत्य अनुसरण
वही,आत्मसाक्षात्कार पायेगा।
मैं को जानो,यही सदा है
वही मैं ,”मुझको’ पायेगा।।

“जय श्रीकृष्ण जय सत्यधारी”
“यही है सत्यास्मि विहारी”

 

****

“प्रेमास्मि”

जगे प्रेम की चाहत जन्मों कर्म।
बने प्रेम दिव्य जन्मों श्रम।
मिले एक दूजे प्रेम हो एक शरीर परम्।
तब प्रेमी बन जाता ईश्वर मर्म।।
मैं हूँ तू में समा जाता
तू है ये कहने वाला भी।
ज्यों जले ज्योत बन एक
दीपक बाती अग्नि घी।
तन भान मिटे मन सदा लीन।
एक्त्त्व अनुभव होता है।
कौन कहे मुझे प्रेम भी है
बिन कहे प्रेम यूँ जीता है।।
ना लेने वाला ना देने वाला
इच्छित बिन इच्छा होती पूर्ण।
ज्यों सुगंध विचरती पवन संग
पुष्प वहीं रह कर बन सम्पूर्ण।।
कहते देख अनुभव कर
ये और अधूरे संसारी जन।
जिस पुष्प खिले जीवंत प्रेम
उसमें अपनी पूर्णता करके हन।।
ये संसार पूर्णता और अग्रसर
इसका अंत विकास है सम्पूर्ण।
प्रेम इस पंचतत्वी शरीर परे
यो मिट जाता इस जगत हो चूर्ण।।
प्रेम की सूरत अद्धभुत है
जो देखे वो विक्षिप्त होता।
भूले नियम सभी इस जग
प्रेम दर्शन मन परे होता।।
जो देख रहा वो आपा है
जिसमे दिख रहा वो आपा बन।
ज्यों दिखे इंद्रधनुष नभ् में
पर हाथ नही आता उस तन।।
प्राप्ति यहाँ अर्थ नही
अप्राप्य यहाँ अर्थ व्यर्थ।
शेष अशेष दोनों है एक
एक यही प्रेम बिन परत परत।।
द्रश्य दर्श और दर्शित मिटता
प्रेम रहता एक प्रेमी बन धर।
अनंत एक बन जीता जग
प्रेमी प्रेमिका एक प्रेम अजर अमर।।
यो प्रेम नही मिले जग बाजार
प्रेम निभता नही बना व्यवहार।
प्रेम तुम्हारी सम्पूर्णता है
आत्मसाक्षात्कार है प्रेम का सार।।
स्मि अस्मि आस्मि बिन अहम्
कोहम सोहम नाहम रास्मि।
द्धैत अद्धैत विशिष्टाद्धैत
सब समा जाते एक प्रेमास्मि।।

 

इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

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 श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः

 

www.satyasmeemission.org


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