Breaking News
BigRoz Big Roz
Home / Breaking News / परकाया प्रवेश योग विद्या का सच्चा रहस्य, आप जानकर रह जाएंगे हैरान, इस रहस्य को बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी श्री सत्येन्द्र जी महाराज

परकाया प्रवेश योग विद्या का सच्चा रहस्य, आप जानकर रह जाएंगे हैरान, इस रहस्य को बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी श्री सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

परकाया एक ऐसी योग विद्या जिसके बहुत ही गहरे रहस्य हैं। इस विद्या के माध्यम से मनुष्य वो हासिल कर सकता है जो किसी बड़े चमत्कार से कम नही है।

 

परकाया प्रवेश योग विद्या का सच्चा रहस्य जाने कैसे-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी से:-

आपने योगियों की जीवनी में पढ़ा होगा की-कुछ योगी अपने पुराने वृद्ध शरीर को त्याग कर किसी नवीन आयु के मरे हुये, युवा व्यक्ति के शरीर में अपनी आत्म विद्या यानि प्राण शरीर की सिद्धि से, प्रवेश कर नवीन शरीर धारण कर अमरता और अपनी शेष साधना को करते जीवन जीते है। और दूसरा ये है की-किसी अन्य के मृत व्यक्ति के शरीर में जाकर, उसके शरीर का उपयोग कर अपना कार्य सिद्ध कर, पुनः अपने शरीर में वापस आ जाते है। जैसे-शँकराचार्य का भारती मिश्र से शास्त्रार्थ में काम विषय में मृत राजा के शरीर में प्रवेश कर, उसकी रानियों संग काम ज्ञान प्राप्त किया और पुनः अपनी देह में लोट, भारती मिश्र को शस्त्रार्थ में काम विषय के उत्तर देकर की-किस प्रकार काम यानि भोग से मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है,उन्हें पराजित किया था। ऐसे और भी योगियों के उदाहरण है।अब प्रश्न ये है की- क्या ये सम्भव है? और है तो कैसे या सम्भव नही तो कैसे?:-

आओ जाने:– योगी कहते है की- जब योगी का प्राण शरीर उसके वश में आ जाता है, यानि नाभि चक्र खुल जाता है, तब वो नाभि चक्र की बहत्तर हजार नाड़ियों के रहस्य को जान जाता है। जिनसे इस शरीर और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुयी है।उन्हें ये योग रहस्य प्रत्यक्ष दिखाई और अनुभूत समझ आता है। तथा इस योग को,और भी गम्भीरता से जाने हेतु, इससे आगामी चक्र के जागरण की भी आवश्यक्ता पड़ती है। वो है-मन चक्र या ह्रदय चक्र का जागरण। यहाँ पर योगी, जो मन की मनोवहा नाड़ियों का दर्शन करता है, जो समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में योगी के शरीर से अनन्त जाल की भांति विश्व व्याप्ति है। हम सभी उन्हीं और इन्ही, किसी न किसी एक नाड़ी यानि मन रश्मि रूपी एक रस्सी से बंधे हुए है। यही मन की अनंत या बहत्तर हजार रश्मियां ही, हमारा एक दूसरे से अनंत कर्म संस्कार सम्बन्ध है। यो उनमें से उस सम्बन्ध और उसके कर्म और उसके संस्कार को खोजना और जानना।और तब जाकर, उसमें योगी अपनी किस नाड़ी के माध्यम से अपने प्राणों को और मन को एकाग्र करता हुआ, किसी एक नाड़ी से, जिसका सम्बन्ध उस मृत व्यक्ति से है, उसमें प्रवेश कर अपने शरीर को त्याग कर, दूसरे शरीर में प्रवेश करता हुआ, पुनः उस शरीर में अपने प्राण और मन शरीर यानि सूक्ष्म शरीर या प्राण शरीर का विस्तार कर जीवित हो उठता है।ये अति गम्भीर और गूढ़ विषय है।अब यहाँ इस अवस्था में, यदि योगी का मन और प्राण पूरी तरहां अपने वशीभूत नही है। तो वो योगी दूसरे के शरीर में फंस सकता है।और फिर लोट नही सकता है।और मानो किसी तरहां अपनी इच्छा शक्ति से लोटा भी तो,वो पहले की तरहां शक्तिशाली नहीं रहेगा,उसकी मन और प्राण की शक्ति बड़े स्तर पर क्षीण हो जाती है।और उसे प्राप्ति में बड़ा समय लग जाता है। यो इस सब ज्ञान की प्रयोगात्मक सिद्धि बहुत आवश्यक है।

अब देखे की- ये कैसे सम्भव नही है:-

1-योगी की यदि अंतर्दृष्टि नही खुली है तो- वो कैसे जान पायेगा की किस शरीर में उसे जाना है?, क्या वो शरीर उसके लिए उपयुक्त है? क्योकि उसका यानि योगी का शरीर तो पूर्व तपस्या से शुद्ध हो गया था। अब ये नवीन शरीर उसके उपयुक्त शुद्ध नही है।और न ही होता है।अब उसे पुनः शुद्ध करने में अति समय लगेगा, तब कैसे योगी उस अशुद्ध शरीर में प्रवेश कर जायेगा?
2- कोई भी मृत शरीर इन अवस्थाओं में मरता है-1-हत्या किया शरीर जो की कटा फटा होता है।-2-आत्महत्या का शरीर जो शापित होता है।-3-जहर खाया शरीर, वो भी विष से विकृत हुआ होने से विषेला है, उसका उपयोग कैसे करेगा?-4-अल्पायु में मरा बाल्क या युवा मनुष्य, तब मृत्यु उपरांत भी उसका व्यक्ति के ह्रदय की ग्रन्थि फट जाती है। और मस्तिक के सेल्स यानि कोशिकाएं भी नष्ट होती है। तब ऐसे विकृत शरीर में प्रवेश करता हुआ योगी, उस शरीर को कैसे पुनः पूर्ण स्वस्थ करेगा?
यदि उस योगी में इतनी ही शक्ति सिद्धि है की- वो किसी शरीर को पुर्न स्वस्थ और उसके टूटे अंगो व् ग्रन्थियों व् त्वचा को निर्मित कर सकता है। तो इतनी महनत वो दूसरे शरीर में करेगा। उतनी महनत में तो उसी का पुराना शरीर भी स्वस्थ और नवीन हो सकता है या नही?
अर्थात हो सकता है। तब वो क्यों किसी अन्य तप जप रहित विषैले और कटे फ़टे पाप बल से युक्त शरीर में जायेगा? बताओ? अतः नही जायेगा।
दूसरा प्रश्न है की-दूसरे के शरीर में जाकर वहाँ उस योग रहित शरीर के मध्यम से क्या ज्ञान जानना चाहता है? जो उसके इतने सिद्ध शरीर से प्राप्त नही हो सकता है?बताओ?

क्योकि अन्तर्द्रष्टि खुल जाने पर संसार का कोई भी विषय ऐसा नही है, जो उसे अपने ही शरीर में ज्ञात नही होगा। अर्थात सभी विषय का ज्ञान आत्मा में होता है। और वो योगी अपनी पूर्वजन्म के शरीरों में वो सब भोग और जान चूका है। उसे केवल उन पूर्व जन्मों के,अपने उसी काल के कर्मो में अपना संयम यानि गम्भीर ध्यान करने की आवश्यकता भर है। और वो जान लेगा,जो वो जानना चाहता है। यदि काम विषय प्रश्न है तो- मूलाधार चक्र में संयम करना भर है। उसे सभी भोगों का रहस्य उसके प्रयोगों के साथ प्राप्त हो जायेगा।क्योकि उसने अनंत काल में ये भोग संस्कार पूर्ण किये होते है और साथ ही वो वर्तमान जन्म में भी अपने माता पिता के ही भोग संस्कार से जन्मा होता है,यो उसे उस संस्कार के मध्य संयम विधि से(धारणा+ध्यान+समाधी= संयम विधि है) संयम करना है।और उसे वो भोग संस्कार के सारे रहस्य ज्ञात हो जायेंगे।
अब प्रश्न है की-प्रत्यक्ष भोग वहाँ कैसे प्राप्त होगा? वहाँ योगी के साथ कौन स्त्री या पुरुष भोग में संग देने को है?जिसका संग ले वो भोग रहस्य को प्राप्त कर सके?क्योकि पूर्व जन्म के संगी का साथ तो तभी जन्म में समाप्त हो गया या ये उस भोग संस्कार को नष्ट करके,वर्तमान जन्म में योगी बना है।तब कैसे भोग संस्कार इस जन्म में शेष है? क्या भोग संस्कार नष्ट नहीं होते या पूरी तरहां से नहीं हुए है?शेष है?
तब उत्तर है की- भोगों तो वो योगी पूर्व जन्म में भोग चूका। तभी उसे उस भोगों से ऊपर का योग समझ आया है। यदि शेष है तो- पूर्व जन्म के विपरीत लिंगी के संग के चित्रण को, अपने मनो जगत में सजीव कर लेता है। जैसे हम कल्पना को चित्र में बदल देते है या जैसे हम कल्पना रूपी भोग को अपने स्वप्न में भोगते है। जो की सोचा भी नही था। ठीक वेसे ही योगी उस कल्पना को स्वप्न की जगह अपने चैतन्य ध्यान जगत में जीवित करता हुआ यथार्थ भोग में बदल देता है। और वहाँ चेतना युक्त विचार के साथ उस विपरीतलिंगी से युक्त होकर रमण यानि भोग करता हुआ मनवांछित ज्ञान को एक एक क्रम से ज्ञान प्राप्त करता है।(ये गम्भीर रहस्य है,रुक कर विचार करना और आगे पढ़ना) तब उसे क्या आवश्यकता किसी अन्य शरीर में परकाया प्रवेश करने की। बल्कि जो वो अभी कहा बताया-संयम विधि से ये योग कर रहा है, ठीक यही सच्ची परकाया प्रवेश सिद्धि कहलाती है। क्योकि यहाँ वो पूवर्त कल्पना के दूसरे और मनवांछित सत्य शरीर को अपने मनोयोग जगत में जीवित किये और उसमें प्रवेश या उपयोग किये हुए है। ये है परकाया प्रवेश विद्या। ठीक यही शँकराचार्य ने किया। क्योकि योगी अपने पूर्वजन्मों में राजा रहा होता है। क्योकि ये उक्ति है की- तपेश्वरी सो राजेश्वरी और राजेश्वरी सो नरकेश्वरी या योगेश्वरी।भावार्थ है की- तप से ही राजा बनता है, यदि तप नही करे तो- अभी पुण्यबलों को उपयोग कर,वो दरिद्र बनकर नरक पाता है। और राजा होने पर भी यदि योग करता है। तब राजा से वो योगी बनता है।जैसे-महावीर और बुद्ध आदि। यो वो पूर्वजन्म में राजा भी रहे थे, उसी पूर्व योग अवस्था में जाकर संयम् किया और ज्ञान पाया यही महात्मा महावीर और महात्मा बुद्ध को ज्ञान था। तभी वर्तमान के कथित योगी,योग के नाम पर मात्र तप के बल से योग राजा है। वे योगी नही है यो उन्हें ये गम्भीर योग रहस्य नही पता है।

अध्यात्म योग विद्या में सिद्ध गुरु और शक्तिपात की आवश्यकता होती है:-

मन की दो धाराएं है-1-एक शाश्वत ज्ञान-2-दूसरी उस शाश्वत ज्ञान का पुनः पुनः उपयोग कर आनन्द प्राप्त करना। इसमें जो आनन्द प्राप्त करने वाली मन की दूसरी धारा है।उसे गुरु अपनी योग शक्ति से यथार्थ अंदर की और मोड़ देता है,यानि शिष्य को अंतर्मुखी बना देता है। तब यही धारा दिव्य दृष्टि बन जाती है।और तब शिष्य मन से देख पाता है की- मेरा कर्म क्या और उसका फल क्या व् कैसे प्राप्त होता है। यही साधक का ध्यान करना कहलाता है। इतने, कितना ही विकट साधक प्रयास करे। वो मन की बहिर धारा को अपने अंदर नही मोड़ पाता है।क्योकि मन अपने को खोना नहीं चाहता है,और उसे अंदर की और करने के लिए,उसी मन के पास कौन सी अतिरिक्त शक्ति है,बताओ?यानि कोई नहीं है। यो ही इस अतिरिक्त शक्ति की प्राप्ति को एक प्रबल बाहरी मन की एकल संयुक्त शक्ति चाहिए।यो वो गुरु ही देता है।भक्त की भक्ति से।यो ही गुरु की प्रबल आवश्यकता होती है। यही दीक्षा और उसका गम्भीर रहस्य है। यानि दूसरी इच्छा की शक्ति की, प्राप्त ही दीक्षा कहलाती है।यो योगी गुरु का विकट अर्थ महत्त्व है।

सत्यास्मि क्रिया योग से कैसे, सब योग रहस्य ज्ञान और सिद्धि उपलब्ध होती है:-

सत्यास्मि क्रिया योग विधि से ध्यान करने पर प्रत्येक साधक को मंत्र और मन यानि इच्छा व् प्राणों यानि शक्ति का एक साथ आरोह अवरोही चक्र से, एक एक क्रम से नो चक्रों का क्रमशः शोधन होता चलता है। जिसके फलस्वरुप साधक को पहले ही स्तर पर प्राण शरीर की प्राप्ति होती है।यानि पहले शक्ति और उसके पीछे है,इच्छा।और आगे मन शरीर जिसे सूक्ष्म शरीर कहते है, इसकी प्राप्ति पर सकारात्मक शक्ति के पूर्ण विकास के चलते साधक में ,सभी सकारात्मक गुणों का आकर्षणीय चुम्बकीय व्यक्तित्त्व की प्राप्ति होने पर, उसे सभी लोग पसन्द करते है। यो बिगड़े कार्य बनते है, आदि आदि भौतिक जगत में सभी उन्नतिकारक लाभ होते है। नवीन विचारों और नवीन चिंतन का उदय होता है। यो दैनिक कार्यों में लाभ होता है। और आप अन्य मित्रों को भी सही राय दे पाते है। यो उनकी भी प्रशंसा के पात्र बनते है और परिवारिक दायित्त्वो की उचित समयानुसार पूर्ति करते हुए अर्थ धर्म काम और आत्म मोक्ष को प्राप्त करते है यो गुरु निर्दिष्ट मंत्र और ध्यान विधि को करते जाओ और अपने भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में सम्पूर्णता पाओ। यो जब साधना करते आप मन शरीर के दर्शन कर पाते है।यानि अपने सामने अपने आपे को ही इच्छित रूप में और अपने सोचे अनुरूप देख पाते हो।
तब आपमें परचित्त ज्ञान अन्य के विचारों को जानने की शक्ति स्वयं प्राप्त हो जाती है। इसके लिए कोई भिन्न साधना नही है। और जब मन शरीर की प्राप्त होती है। जिसे सूक्ष्म शरीर भी कहते है। तब परकाया प्रवेश यानि सभी कायाओं में मैं ही विद्यमान हूँ.. ये ज्ञान प्राप्त होता है। यही सब योग सिद्धि अर्थ है, ना की भिन्न भिन्न चक्रों के तथाकथित मन्त्रों के नाम पर जनसाधारण को मुर्ख बनाया जाता है। ये नो चक्र भी मन शरीर में होते है। जैसे दूध में घी, न की दूध में झकने से घी मिलता है। घी प्राप्ति का केवल एक मात्र उपाय है। दही का एक क्रमविधि से मन्थन करते रहना। और समयानुसार घी स्वयं ही प्राप्त होगा। यो गुरु विधि से साधना करने पर स्वयं ही समयानुसार ये सब योग विद्या प्राप्त होती है। यो व्यर्थ के भ्रमों को जानो और मुक्त हो।

 

इस लेख को अधिक से अधिक अपने मित्रों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को भेजें, पूण्य के भागीदार बनें।”

अगर आप अपने जीवन में कोई कमी महसूस कर रहे हैं घर में सुख-शांति नहीं मिल रही है? वैवाहिक जीवन में उथल-पुथल मची हुई है? पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा है? कोई आपके ऊपर तंत्र मंत्र कर रहा है? आपका परिवार खुश नहीं है? धन व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो रहा है? घर में बीमारी का वास हो रहा है? पूजा पाठ में मन नहीं लग रहा है?
अगर आप इस तरह की कोई भी समस्या अपने जीवन में महसूस कर रहे हैं तो एक बार श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के पास जाएं और आपकी समस्या क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
माता पूर्णिमाँ देवी की चमत्कारी प्रतिमा या बीज मंत्र मंगाने के लिए, श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज से जुड़ने के लिए या किसी प्रकार की सलाह के लिए संपर्क करें +918923316611

ज्ञान लाभ के लिए श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज के यूटीयूब

https://www.youtube.com/channel/UCOKliI3Eh_7RF1LPpzg7ghA से तुरंत जुड़े

*****

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः


Discover more from Khabar 24 Express | India's Leading Hindi News Network

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Check Also

राष्ट्रकुल पदक विजेत्या खेळाडूंची पंतप्रधान नरेंद्र मोदींसोबत भेट ; केंद्रीय राज्यमंत्री रक्षा खडसे यांची उपस्थिती

राष्ट्रकुल पदक विजेत्या खेळाडूंची पंतप्रधान नरेंद्र मोदींसोबत भेट ; केंद्रीय राज्यमंत्री रक्षा खडसे यांची उपस्थिती

Leave a Reply

Discover more from Khabar 24 Express | India's Leading Hindi News Network

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading