एक बार प्राचीन काल में जब राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा था चारों और हरियालें वृक्ष सब समाप्त होने लगे लोगों के पास खाने के भी लाले पड़ते गए थे तब उसी समय होली का उत्सव समीप आया। अब सभी प्रजाजनों को बड़ी भयंकर चिंता हुयी की अबकी बार कैसे लकड़ियों को इकट्ठा करेंगे ना ही वृक्ष बचे है और ना ही घरों में लकड़ियाँ बची है। सभी समाप्त हो गया है और जो एक दो वृक्ष बचे है, वे हम मनुष्यों की धूप से रक्षा और प्राणों की रक्षा के लिए एक एक पत्ते का भोजन बनने के लिए ही शेष है, तब कैसे होली का त्यौहार मनेगा और इस शुभ महूर्त के लिए क्या जलाये तब सभी प्रतिष्ठित नागरिक इसी चिंता को लेकर महाराज जनक के पास गए, तब उन्होंने अपने छत्रियों के महागुरु श्री विश्वामित्र जी का स्मरण कर आवाहन किया, भगवान विश्वामित्र जी पधारे और उन्होंने सभी की चिंता को सूना और एक पवित्र स्थान पर बैठकर ध्यान लगाया। तब उन्हें अपनी इष्ट वेद माता गायत्री देवी की ज्ञानवाणी हुयी की हे-ब्रह्मर्षि इन मनुष्यों को सभी ऋषियों ने अनेक बार चेताया है की ऐसे उत्सवों के लिए वृक्ष मत काटा करो और यदि कोई वृक्ष पुराना हो भी गया है और भूमि पर गिर गया है। तब उसका उपयोग किया करो और साथ ही प्रत्येक सावन से पूर्व नए वृक्षों के अधिक से अधिक पोधे लगाया करो, ये नही माने यो आज ये दिन देखने पड़े है। इसलिए इस दुविधा से मुक्ति पाने के लिए सभी प्रजाजनो के साथ इनके राजा को भी इस वसन्त पूर्णिमा के इष्ट देव देवी श्री सत्यनारायण और श्रीमद् सत्यई पूर्णिमाँ की उपासना करनी होगी उनका अपने ध्यान में अवतरण करना होगा।
तभी ये होली की पूर्णिमा उत्सव को पूर्ण करेंगी यो इन्हें एक सार्वजनिक पवित्र स्थान को स्वच्छ करके एक चतुर्थ मण्डल बनाना चाहिए उस चतुर्थ मण्डल यानि यज्ञकुण्ड के बीच केवल एक लकड़ी का दंड जिसपर सात बार कलावे को ईश्वर श्री सत्यनारायण और ईश्वरी सत्यई पूर्णिमा को पवित्र मन्त्रों से आवहनित करते हुए सात बार लपेटे तब उसे भूमि में गाढे और जिसके चारों और चार चार गाय के पवित्र उपलों को रखते जाये और इस चतुर्थ गाय के उपलों से बने यज्ञकुण्ड में सभी प्रजाजन अपने अपने घरों से गाय के पवित्र गोबर से बने उपलों को लेकर रखते जाये, ऐसा करने के उपरांत उसमें विश्व उत्पत्ति के कारक देवता कामदेव और रति को स्मरण करते हुए अग्नि को प्रज्वलित करें और इस पवित्र गाय गोबर से निर्मित यज्ञकुंड की सभी स्त्री और पुरुष पांच बार परिक्रमा करे और भगवान सत्य पूर्णिमाँ से अपने सभी पूर्व किये बुरे कृत्यों के लिए छमा मांगे और नवीन व्रक्ष लगाने का संकल्प करें, तो अवश्य ही भगवान की कृपा होगी ये कहकर श्रीमद् वेद गायत्री शक्ति आशीर्वाद देती अंतर्ध्यान हो गयी। तब महागुरु विश्वामित्र जी ने श्रीमद् सत्यनारायण और सत्यई पूर्णिमाँ का आवाहन किया और उनके दर्शन प्राप्त कर उनसे इस समस्या के निदान को उनका आशीर्वाद प्राप्त किया और उन्होंने आशीर्वाद देते कहा की हे महामुनि इस दिन को अनेक नामों से जानते है क्योकि इसी दिन सृष्टि की उत्पत्ति हुयी थी यो ईश्वर और ईश्वरी में जो सृष्टि हेतु कामोउद्दीपन इस दिन हुआ यो इस दिवस को कामोदिवस या कामोउत्सव अर्थात सभी कामनाओं की उत्पत्ति का दिवस भी कहते है और सबसे पहले सभी संसारी या आध्यात्मिक कर्मों का प्रारम्भ ही कामभाव यानि मूलाधार चक्र से होता है यो इस दिवस पर कामयज्ञ की स्थापना की जाती है। जिसमें एक योनिकुण्ड का निर्माण करते हुए उसके ठीक बीच में एक खड़ा लकड़ी का खम्ब खड़ा किया जाता है और अपनी अपनी सभी चतुर्थ मनोकामनाएं इच्छाओं को इसमें लकड़ी या कण्डों के रूप में डाला जाता है और जो भी उस समय अन्न आदि की उत्पत्ति होती है उसका अग्रभाग फल को इस कामना अग्नि में प्रदान करते हुए शेष प्रसाद रूप परस्पर बांटते है यो अन्न के ऊपरी फल को ‘होला’ कहते है। यो इसे होलीकाउत्सवकहते है, और तब इसी की स्वरूप विश्व कर्मो को उत्पन्न करने वाली कामाग्नि को प्रज्वलित किया जाता है।यो काम और अग्नि दो है की एक काम यानि इच्छा और एक काम यानि इच्छा को पूर्ण करने वाली शक्ति अर्थात इच्छाशक्ति ही का नाम काम अग्नि कहलाती है, यो काम को करने वाले मनुष्य ही होते है, यो काम और उसकी शक्ति को दो पुरुष और स्त्री के नाम से जाना जाता है जो काम पुरुष कामदेव है और काम की देवी रति यानि काम को अपने में रमित करते हुए सभी कामनाओं को सम्पूर्ण करने वाली है, यो सदैव स्त्री शक्ति ही इस जगत की सम्पूर्ण कामनाओं को सम्पूर्ण करने वाली है, यही स्त्री शक्ति की सम्पूर्णता का सम्पूर्ण नाम ही पूर्णिमाँ भी कहलाता है यो सदा स्त्री शक्ति का सम्मान करो।ये सब महाज्ञान श्रवण करते आशीर्वाद प्राप्त करते हुए समाधि से उठकर ब्रह्मऋषि गुरु विश्वामित्र जी ने महाराज जनक और प्रतिष्ठित प्रजाजनों को ये दिव्य ज्ञान उपदेश सुनाया, सबने श्रीगुरुदेव सहित माता गायत्री और श्री सत्यनारायण और भगवती सत्यई पूर्णिमाँ को नमन किया और श्री गुरुदेव विश्वामित्र के द्धारा ही ऐसा पवित्र गो गोबर से निर्मित श्री यज्ञकुण्ड को बनवाकर उसका यथाविधि पूजन करते परिक्रमा की और अपने पूर्वत सभी जाने अनजाने कर्मों के लिए छमा माँगते हुए कामदेव रति का स्मरण करते अग्नि प्रज्वलित की और प्रसाद बांटा तो देखते देखते ही आकाश में पूर्णिमाँ का प्रकाश शुभत्त्व आशीष प्रकट करता हुया अनगिनत बादलों से घिरता चला गया और सारे प्रदेश में वर्षा होने लगी जिसमें सभी ने भीग कर ईश्वर की और से आशीर्वाद की होली मानते हुए होलिकाउत्सव मनाया। यही आज भी होली पर ईश्वर की वर्षा रूपी होलिका उत्सव रूप में सभी मनुष्यों को प्राप्त होती है और जब जब मनुष्य वृक्षों को अधिक काटता हुआ हरियाली समाप्त कर देता है, तभी चारों और विभन्न बिमारियों से अकाल से ग्रस्त हो जाता है, तब अनेक स्थान पर उसी काल के ऋषि संतजन मांत्रिक यज्ञवेत्ता आदि विद्धान श्री गुरुदेव विश्वामित्र सहित वेद शक्ति गायत्री और श्रीमद् सत्यनारायण और श्रीमद् सत्यई पूर्णिमाँ की पूजा इसी प्रकार से करते हुए कामदेव रति स्वरूपी कामोअग्नि को यज्ञ में प्रज्वलित करते है और अपने अपने इष्टों के दिव्यमंत्रो से यज्ञ करते हुए संसार के कल्याण की मनोकामना मांगते ईश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करते है, ठीक यही स्थिति आज वर्तमान में हो गयी है की वृक्ष बहुत कम रह गए है और परियावरण प्रदूषित हो गया है, विभिन्न रोग और अकाल की स्थिति चारों और व्याप्त है, तो सभी देशवासियों से सत्यास्मि मिशन का सविनय निवेदन संदेश हैकि वृक्षों को मत काटों और लकड़ियों को मत जलाओ बल्कि पवित्र गाय के साथ भैसों के उपलों से ऐसे ही होलिका यज्ञोवेदी बनाकर पूजनपाठ करते हुए होलिकाउत्सव मनाये।और ये व्यंग नही करें की हमारे हिंदुओं के त्योहारों पर ही अंकुश क्यों होता जा रहा है इसका केवल उत्तर है की हमारा धर्म सनातन धर्म है जो सभी में समयानुसार ज्ञान का सही उपयोग करता हुया अपने पर्वों को उसी उत्साह से मनाता और पूर्ण करता आनन्द प्राप्त करता है।।
होली पर वृक्ष काटो नही लगाओ..
आज होलीका दहन पर
वृक्ष को काट नही जलाना।
गाय आदि के उपलों ले कर
उन्हें जला शुभ होली मनाना।।
वृक्ष आज इतने कम है
उनसे नही हो प्रदूषण कम।
होली जले धुँआ फैलेगा
घुटे सभी मनुष्य का दम।।
व्यंग नही कसना ये कहकर
क्यूँ हिंदु त्योहारों पर अंकुश का वार।
क्योंकि हमी जानते और मानते
वृक्षों है हम जीवन का सार।।
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी की होली के पर्व पर प्रकाश डालती कविता-सृष्टि की प्रथम होली पूर्णिमाँ बोली…
जब था नही कोई सत् असत्
शून्य सभी था अभिनभ गत।
क्या था वहाँ जहाँ वेद मौन हैं
कौन था इस शून्य मध्य में रत।।
ये अनुभव करता कौन आत्मा
ये प्रमाणित करता कौन परमात्मा।
कौन है जिससे हुयी नव सृष्टि
सत्यास्मि बताये जीव सृष्टि नाता।।
कौन सृष्टि का प्रथम उत्सव
कौन प्रथम सृष्टि की बोली।
कौन सप्त रागित सृष्टि नवमंडल
कौन खेली पहली प्रेम नवरंगित होली।।
कौन प्रथम अभिसार गीत है
किससे बने ये प्रेम रचित रंग।
कौन मुग्ध हुआ श्रंवित करता इस
प्रियसी प्रेमी नवीनतम गा प्रेम अभंग।।
जिसे धुन सुन गुन खो गयी
और प्रेम पल्लवित हुयी सर्व उपमा।
अहं महं आत्मतत्व बना
सत्य प्रकाशित प्रभासित हुयी पूर्णिमाँ।।
दो एक थे प्रेम रसित हो
केवल एक्त्त्व प्रेम था शेष।
सत्य पुरुष ॐ सत्यई नारी
आत्मत्त्व स्थित हो प्रेम अशेष।।
प्रेम ही था प्रेम है बनकर
लिंगभेद परे अलिंग बन शून्य।
मैं में मैं समाय वहीं था
बिन वाणी मोनवत स्वयं गून्य।।
प्रेम जाग्रत तभी है होता
जब मैं हो जाता पर में विलीन।
कौन कहे किसी दूजे की
क्या है क्यूँ है होकर तल्लीन।।
रहते नही ये सब संसारी
कोहम सोहम ओहम् अहम्।
एक ही रहता बिन कुछ रहते
कर्ता कारक अक्रिया नहम्।।
प्रेम रति में मति जाग्रत
कहे जिसे प्रेम प्रज्ञा।
प्रेम चैतन्य प्रेममत करते
दोनों प्रेम से हो राग्या।।
तब प्रेम सहमति द्धैत हो जन्मी
तब हुआ दोनों से प्रथम उद्घघोष।
एकोहम् बहुस्याम बोली बोले
नर नार स्वरूप हम प्रेमुतोष।।
हम से जने सभी संसारी
और हम ही प्रकाशित ब्रह्ममनुष।
हम की ही आभा आलोकित
सूर्य धरा मध्य सप्तरंगी इंद्रधनुष।।
ह हूँ है म बिन अहं मैं हम
कह मैं तेरा तेरी हो ली।
तन मन सब अर्पित हम में है
यही हम मिलन प्रथम होली।।
हम के रमित से निकले मथ सब
प्रेम के बावन अक्षर हार।
यही प्रकर्ति की पंचम बेला
प्रेम सप्तदल कमल पुष्प प्रथम उपहार।।
स्नेह श्रद्धा समर्पण संगत
नित्यता मिलन निशब्द बोली।
यही प्रेम की सप्त रंगोली
बरसी एक दूजे बन प्रथम होली।।
सत्य पुरुष प्रेम सूर्य बन चमके
ॐ सत्यई प्रेम पृथ्वी नारी।
चन्द्र इन दोनों प्रेम स्वरूपी
नवग्रह प्रेम नवधा भक्तिधारी।।
सत्य ॐ से सात अमृत निकले
सोम मंगल बुध गुरु और शुक्र।
शनि राहु केतु अर्थ आत्मशक्ति
ये सभी सप्त प्रेम आत्मभक्ति चक्र।।
सत्य पुरुष ॐ सत्यई नार
सिद्धायै सृष्टि नमः प्रेम नमन्।
ईं कुंडलिनी महाशक्ति विश्व
फट् चतुर्थ वेद स्वाहा प्रेम अमन।।
सत्य ॐ सिद्धायै नमः
ईं फट् स्वाहा।
प्रथम सिद्धासिद्ध महामंत्र ये
अर्थ काम धर्म मोक्ष दे अथाहा।
यो जपता ध्याता सदा इसे
आत्म मुक्ति स्वयं वशीभूत।
सत्यास्मि आत्मसाक्षात्कार सिद्ध
अहम् आत्म इश्वत गुरुवर हो अनुभूत।।
…………..
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