
बिहार के विधानसभा चुनाव में पैसे का खेल… सरकार बांट रही है मुफ्त का पैसा, यानी मुफ्त की रेवड़ियां… और वोट खरीदने की कोशिश।
महिलाओं के वोट के नाम पर 10,000 रुपए बांट दिए गए।
किसलिए? क्या सच में महिलाओं का सशक्तिकरण करना था?
या फिर उनके वोट की कीमत तय कर दी गई “10,000 रुपए?“
अब सबसे बड़ा सवाल अगर मदद करनी ही थी तो चुनाव आने तक इंतजार क्यों?
क्या महिलाओं या पुरुषों की तकलीफें चुनाव के साल ही दिखाई देती हैं? क्या महिलाओं के खाते सिर्फ वोट की फसल उगाने वाली जमीन हैं?
काम के बदले पैसे क्यों नहीं? मुफ्त का पैसा ही क्यों?
काम करवाते तो शायद असर कम होता, लेकिन मुफ्त के पैसे…
ये तो सीधे दिल में नहीं, वोटिंग मशीन में उतरते हैं।
महाराष्ट्र में भी यही खेल खेला गया था। चुनाव से पहले 1500 रुपए और चुनाव जीतने पर 3000 रुपए देने का वादा किया गया। सरकार बनी लेकिन 3000 तो दूर…
1500 भी हजारों महिलाओं से छीन लिए गए, ये कहकर कि वे “अयोग्य” हैं। चुनाव से पहले सभी योग्य थे, चुनाव खत्म होते ही अयोग्य, यहां तक कि हजारों पुरुषों के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर भी लेकिन जांच चुनाव के बाद गई।
ये खेल किसी को समझ नहीं आता क्या?
बिहार में भी स्क्रिप्ट वही, किरदार नए
चुनाव शुरू होने से पहले 1.4 करोड़ महिला समूहों को सीधे 10,000 रुपए। मतलब सीधा-सपाट मैसेज “हमें वोट दो, 10,000 लो”।
महिलाएं भी समझती हैं कि चुनाव के बाद अगले 5 साल तक कोई पूछने वाला नहीं। लेकिन मजबूरी, गरीबी, और सिस्टम से तंग जिंदगी… 10 हज़ार के नोट पर्स में आते ही सवाल दिमाग से गायब हो जाते हैं।
क्या ऐसे वोटर्स के भरोसे Bihar का भविष्य बदलेगा?
एक वोट 10,000 में बिक गया। फिर अगले 5 साल क्या?
फिर इंतजार… फिर खाली जेब… फिर वही शिकायतें… फिर गरीबी का रोना और फिर पिछड़ा बिहार, गाली खाता बिहार, पलायन, बेरोजगारी… 5 किलो राशन पर कटती जिंदगी।
देश और प्रदेश का विकास ऐसे वोटर्स के भरोसे कैसे होगा
जो 10,000 रुपए लेकर अगले 5 साल तक आवाज नहीं उठाते?
जो लोग कहते हैं
“नौकरी नहीं मिल रही…”
“रोजगार नहीं है…”
“सरकार मदद नहीं करती…”
तो भाई नौकरी की जरूरत ही क्या है? सरकार हर महीने 1000-1500 रुपए दे देती है। मुफ्त का राशन दे देती है। स्कीमों की चमक दिखा देती है।
बस, गरीब को गरीब और अमीर को और अमीर बनाने का चक्र चलता रहता है।
सरकारी शिक्षा… या सरकारी मजबूरी?
अब बात आती है शिक्षा की… गरीब को पढ़ा-लिखा दो, तो सवाल पूछेगा। हक मांगेगा। विरोध करेगा। सरकार से जबाव मांगेगा और सरकारों को जवाब देना पड़ेगा।
इसलिए सरकारी स्कूलों की हालात… आपको मुझसे अधिक पता है। कॉपी-किताब फ्री, मिड-डे मील फ्री… लेकिन शिक्षा? शायद सीखने लायक नहीं छोड़ी गई।
अच्छी शिक्षा महंगी है और फ्री के राशन से अच्छी शिक्षा नहीं मिलती। इसलिए गरीब हमेशा सरकार की तरफ देखता है…
सरकार चुनाव के समय गरीब की तरफ देखती है…
और यह रिश्ता 5 साल बाद फिर ताज़ा कर दिया जाता है।
क्या रेवड़ी ही चुनाव जीतती है? हरियाणा और महाराष्ट्र भी बताता है – जवाब हाँ!
प्रधानमंत्री पीएम मोदी मुफ्त की रेवड़ियों का विरोध करते हैं और इस शब्द का निजात भी उन्होंने ही किया है। लेकिन पहले कर्नाटक फिर महाराष्ट्र फिर हरियाणा और अब बिहार चुनाव में मुफ्त की रेवड़ियों का जबरदस्त तरीके से इस्तेमाल हो रहा है।
हरियाणा में महिलाओं को 2100 रुपए, किसानों को बोनस,
युवाओं को भत्ता।
वहीं कांग्रेस ने 2000 रुपए, 6000 पेंशन, 300 यूनिट फ्री बिजली के वादे किए। लेकिन जिसने पहले दिया जनता का वोट भी उसी को जाता है।
अब बाद में क्या हुआ? कौन-कितना मिला? किसको नहीं मिला? ये सवाल चुनाव जीतते ही खत्म।
महाराष्ट्र में भी यही हुआ। जब एकनथ शिंदे की सरकार थी तो उन्होंने 1500 वाली योजना, फिर 3000 करने का वादा किया, उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने भी इसे दोहराया।
लेकिन चुनाव के बाद? चुनाव के बाद जो हुआ उसे आप जानते हैं।
बिहार की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है… लेकिन जनता का भरोसा?
नीतीश कुमार के 20 सालों में बिहार का GDP तो बढ़ा, लेकिन क्या गरीबों की जिंदगी बदली? गरीबों की जिंदगी बिहार के गांवों में कस्बों में शहरों में बद से बदतर है। गरीबों के हाल बेहाल हैं। बिहार को ऐसे ही अति पिछड़ा राज्य नहीं कहा जाता है असली हालत वहां देखकर पता चलता है।
GDP बढ़ने से गरीबी मिटती तो बिहार आज भारत का “एक खुशहाल राज्य” होता।
लेकिन यहाँ तो लोग आज भी रोटी–रोजगार–शिक्षा–स्वास्थ्य जैसे सवालों से जूझ रहे हैं। विकास पर बात कौन करे?
वोट फ्री में मिल रहा है और नेता फ्री में बातें बांट रहे हैं।
क्या 10,000 रुपए बिहार की राजनीति बदल देंगे? या बिहार का भविष्य बेच दिया गया है?
चुनाव खत्म होगा… पैसे खत्म होंगे… और समस्याएं? सब जस की तस रहेंगी।
महिलाओं को 10,000 देकर उनका वोट तो जीत लिया जाएगा।
लेकिन उनका भविष्य? उनके बच्चों की शिक्षा? उनकी सुरक्षा? उनका रोजगार?
क्या इनकी कीमत भी 10,000 रुपए में रख दी गई है?
सबसे बड़ा सवाल… लोकतंत्र बिक रहा है, या बिकने पर मजबूर है?
जब तक वोटर मुफ्त के पैसों की लालच में रहेगा, तब तक नेता भी मुफ्त की योजनाओं की खिल्ली उड़ाते रहेंगे।
विकास पीछे, जाति आगे और मुफ्त की रेवड़ी सबसे आगे।
क्या बिहार और भारत का भविष्य इन्हीं फ्री के पैसों पर टिकेगा?
क्या लोकतंत्र इतने में बिक जाएगा?
सवाल तो बहुत सारे हैं लेकिन जबाव उन लोगों के पास नहीं जो पैसे लेकर लोकतंत्र को बेच रहे हैं।
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