
जब तक हमला बंद नहीं होता, किसी से नहीं होगी कोई बातचीत – विदेश मंत्री अरागची का बड़ा बयान
मनीष कुमार अंकुर, जिनेवा/तेहरान, 20 जून 2025 : इजराइल और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर है। एक ओर जहां इजराइल लगातार ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान ने जवाब में इजराइल की ‘वाट लगा दी’ – और अब कूटनीतिक स्तर पर भी ईरान ने सख्त रुख अपनाते हुए साफ कह दिया है:
“जब तक इजराइली हमला जारी है, हम किसी से कोई बातचीत नहीं करेंगे।”
ईरान के विदेश मंत्री अब्दोल्लाह अरागची ने जिनेवा में यह बयान तब दिया जब यूरोप और अमेरिका की ओर से युद्धविराम के लिए मध्यस्थता की कोशिशें की जा रही थीं।
ईरान का जवाब: फौजी भी और फौलादी भी!
ईरान की सैन्य इकाइयों ने बीते 48 घंटों में इजराइली ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों की बौछार कर दी। वहीं, जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल ने भी ईरान के कई परमाणु शोध केंद्रों पर हमले किए।
लेकिन इस बीच ईरान का यह राजनीतिक और रणनीतिक स्टैंड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
बातचीत पर ईरान की शर्तें:
- इजराइल को तत्काल हमले रोकने होंगे
- अमेरिका को अपनी ‘पक्षपातपूर्ण’ भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा
- क्षेत्रीय शांति की बात तभी होगी जब “हमले नहीं, संवाद की भाषा” बोली जाएगी

ईरान ने दिखाई इजराइल को कूटनीतिक ताक़त
ईरान के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया:
“हम जिनेवा इसलिए नहीं आए कि अपने आत्मसम्मान की बलि दें।
ज़ायोनिस्ट शासन (इजराइल) जब तक हमला करता रहेगा, हम किसी मंच पर वार्ता नहीं करेंगे।”
यह बयान उस समय आया जब यूरोपीय संघ, अमेरिका और खाड़ी देशों के प्रतिनिधि ईरान से संघर्ष विराम पर चर्चा की कोशिश कर रहे थे।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
- यूरोपीय संघ ने दोनों देशों से संयम की अपील की है
- अमेरिका अभी भी इजराइल का समर्थन कर रहा है, जिससे ईरान और भी नाराज़
- रूस और चीन ने भी ईरान के रुख को “रक्षात्मक और तार्किक” कहा है
विश्लेषण:
ईरान ने यह साबित कर दिया है कि सिर्फ मिसाइल से ही नहीं, विचार और नीति से भी जवाब दिया जा सकता है।
यह संदेश सिर्फ इजराइल को नहीं, उन तमाम ताकतों को है जो छोटे देशों को दबाने की नीति अपनाते हैं।
“ईरान ने इजराइल की वाट लगाई: हमले जारी रहे तो बातचीत नहीं होगी – अरागची का बड़ा ऐलान”
Geneva talks tense as Iran shuts door on diplomacy amid Israeli airstrikes
रिश्तों और संघर्षों पर अंतिम प्रेरणात्मक संदेश:
“शांति वहीं टिकती है, जहां सम्मान ज़िंदा होता है।
और जब कोई सम्मान के लिए लड़ता है, तो वो सिर्फ युद्ध नहीं करता – इतिहास बदलता है।”“बातचीत मजबूरी नहीं, हिम्मत की निशानी होती है – लेकिन शांति की कीमत अगर आत्मसमर्पण है, तो ईरान जैसे देश उसके लिए तैयार नहीं।”
ईरान और इज़राइल के बीच मौजूदा संघर्ष की जड़ें बहुत गहरी और बहुस्तरीय हैं। इस युद्ध की सीधी वजह, दोनों देशों की नीतियां, उनके क्षेत्रीय इरादे और एक-दूसरे के अस्तित्व को लेकर दुश्मनी की सोच रही है। नीचे इसकी वजह, दोनों की गलतियां और सबसे ज्यादा जिम्मेदार कौन है, इसे स्पष्ट रूप से बताया गया है। हम इस खबर में एकतरफा बात नहीं कर रहे हैं। क्योंकि युद्ध से नुकसान सिर्फ इंसानियत का होता है और लोग मारे जाते हैं। युद्ध किसी भी बातचीत का अंतिम विकल्प नहीं है। इसीलिए हमने ईरान और इजराइल युद्ध की महत्वपूर्ण कलियों को जोड़ा है और दोनों की गलतियों को स्पष्ट रूप से बताया है।
ईरान-इजराइल युद्ध की सीधी वजह क्या है?
मुख्य कारण:
- गाजा पट्टी में हमास और इजराइल के बीच संघर्ष –
ईरान हमास जैसे फिलीस्तीनी गुटों को समर्थन देता है, जो इजराइल के खिलाफ हथियार उठाते हैं। इजराइल इसे सीधे ईरानी हस्तक्षेप मानता है। - ईरान का परमाणु कार्यक्रम –
इजराइल को डर है कि ईरान अगर परमाणु हथियार बना लेता है, तो उसका अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा। इसलिए इजराइल बार-बार ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला करता रहा है। - सीरिया और लेबनान में ईरानी प्रभाव –
ईरान वहां पर हिजबुल्लाह जैसे गुटों को मदद देता है, जो इजराइल के खिलाफ सक्रिय हैं। - इजराइल के ‘रक्षात्मक’ हमले और ईरान की ‘बदले की नीति’ –
इजराइल का दावा है कि वह अपने बचाव के लिए हमले करता है, जबकि ईरान इन्हें “आक्रामकता” मानकर बदला लेता है।
ईरान की गलतियाँ:
- हमास और हिज़बुल्लाह जैसे चरमपंथी गुटों को खुला समर्थन देना
- खुले मंचों से इजराइल को “जायोनिस्ट शासन” कहकर खत्म करने की धमकी देना
- न्यूक्लियर प्रोग्राम को पारदर्शी ना रखना, जिससे वैश्विक संदेह और तनाव बना रहता है
- सीरिया-लेबनान में मिलिशिया गुटों को हथियार और ट्रेनिंग देना
इजराइल की गलतियाँ:
- ईरान के खिलाफ ‘पहले हमला’ की नीति – बिना किसी तत्काल खतरे के भी हमला करना
- ईरान के न्यूक्लियर वैज्ञानिकों की हत्या जैसे गुप्त ऑपरेशन करना
- गाज़ा और वेस्ट बैंक में जबरदस्त सैन्य कार्रवाई, जिससे निर्दोष लोग भी मारे जाते हैं
- शांति वार्ता की बजाय सैन्य ताकत से समाधान ढूंढने की जिद
जिम्मेदार कौन है?
दोनों ही देश सीधे और परोक्ष रूप से इस युद्ध के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि:
- दोनों एक-दूसरे को मिटाने की सोच रखते हैं
- दोनों ने बातचीत के रास्ते बंद कर दिए
- दोनों देशों की कड़वाहट राजनीतिक नहीं, वैचारिक हो गई है
लेकिन सबसे ज़्यादा गलती किसकी है?
👉 सबसे ज़्यादा गलती – इजराइल की मानी जा सकती है, क्योंकि:
- उसने बार-बार ‘पहले हमला’ करने की रणनीति अपनाई (Proactive Strikes)
- बातचीत की बजाय सैन्य ऑपरेशन को प्राथमिकता दी
- ईरान के भीतर वैज्ञानिकों की हत्या, न्यूक्लियर ठिकानों पर गुप्त हमले जैसे एकतरफा कदम उठाए
- ईरान के खिलाफ उसकी नीति हमेशा “Regime Change” यानी सत्ता पलटने जैसी रही है, जो किसी भी संप्रभु देश के खिलाफ आक्रामकता मानी जाती है।
हालांकि ईरान की आतंकी संगठनों को समर्थन देने की नीति भी ग़लत और खतरनाक है, लेकिन इस विशेष संघर्ष की शुरुआत और उसकी आग में घी डालने वाला कदम इजराइल का रहा है।
निष्कर्ष:
युद्ध में कोई पूरी तरह सही नहीं होता, लेकिन जो पहले हथियार उठाता है, वो सबसे पहले जिम्मेदार होता है।
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