
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल अब अंतिम चरण में है और पार्टी में नए अध्यक्ष को लेकर सुगबुगाहट तेज़ हो गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद अब भाजपा के लिए संगठन को नई दिशा देने वाला नेतृत्व खोजने की चुनौती सामने है। इस दौड़ में कुछ पुराने चेहरे चर्चा में हैं, तो वहीं चुपचाप संघ की ओर से एक बड़ा नाम जोर शोर से सामने आया है और वो है संजय विनायक जोशी का।
भाजपा में नए अध्यक्ष को लेकर जो नाम सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं, उनमें केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान प्रमुख हैं। दोनों ही नेता संगठनात्मक अनुभव और केंद्रीय नेतृत्व के विश्वास के कारण माने जा रहे हैं। लेकिन इसी दौड़ में एक ऐसा नाम भी है जो वर्षों से पर्दे के पीछे रहकर संगठन की नींव को मज़बूत करता रहा है और वो नाम है संजय विनायक जोशी का।
संजय विनायक जोशी उर्फ संजय भैया जोशी आज भले नॉन प्रोफाइल वाले माने जाते हों। लेकिन वो आज भी संगठन को मजबूत रखने के लिए पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं।
संजय जोशी को संघ का एक मजबूत सिपाही माना जाता है। साथ ही सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत से उनके मजबूत रिश्ते इस बात को और मजबूती देते हैं।
संजय जोशी का नाम भाजपा के लिए कोई नया नहीं है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रहे हैं और संगठन के लिए उन्होंने जमीनी स्तर पर अभूतपूर्व कार्य किया है। इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर उन्होंने संघ के प्रचारक के रूप में अपना जीवन समर्पित किया।
जोशी ने गुजरात में 1988 से 1995 तक संगठन का कार्यभार संभाला और इसी दौरान नरेंद्र मोदी के साथ काम किया। जोशी को संगठन के एक सच्चे “backroom strategist” यानी गुप्त रणनीतिकार के रूप में जाना जाता है। उनका पूरा ध्यान पार्टी को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करने पर रहता है, और यही वजह है कि वे आज भी कार्यकर्ताओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि संजय जोशी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच पुराना मतभेद रहा है। एक समय पर जोशी को पार्टी से हटाया भी गया था, लेकिन समय बदला है और अब RSS के भीतर एक वर्ग यह मानता है कि भाजपा को एक बार फिर संगठन-आधारित नेतृत्व की आवश्यकता है। संघ प्रमुख मोहन भागवत की भूमिका इस समय निर्णायक मानी जा रही है।
संघ हमेशा से ही संगठनात्मक संतुलन और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध नेतृत्व का समर्थन करता रहा है। संजय जोशी इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भागवत और संघ परिवार की सहमति जोशी के नाम पर बनती है या नहीं।
2024 के आम चुनावों के बाद भाजपा ने सत्ता बरकरार रखी है, लेकिन अब ज़रूरत है संगठन को मज़बूत रखने की, खासकर जब कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव सामने हैं। ऐसे समय में भाजपा को एक ऐसे अध्यक्ष की ज़रूरत है जो कार्यकर्ताओं में भरोसा जगा सके, राज्यों में संगठन को सक्रिय कर सके और केंद्रीय नेतृत्व के साथ सामंजस्य भी बना सके।
जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी की तलाश महज़ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है — यह भाजपा के भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णय होगा। वहीं भूपेंद्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान जैसे अनुभवी नाम जहां सत्ता और संगठन दोनों का संतुलन दिखाते हैं, वहीं संजय विनायक जोशी एक ऐसा विकल्प हैं जो भाजपा को उसकी वैचारिक जड़ों की ओर फिर से खड़ा कर सकते हैं।
अब यह देखना बाकी है कि पार्टी “सत्ता के चेहरे” को आगे रखती है या “संगठन के स्तंभ” को।
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