
14 अगस्त, 1984: मेरे सपनों की पूर्ति का अविस्मरणीय-ऐतिहासिक दिन!वर्षों का अथक प्रयास,अनेक मित्रों का सहयोग, समर्पण का प्रतिफल ” प्रभात खबर ” का लोकार्पण हो रहा था।हां,ऐतिहासिक ही था वह दिन!
आज जब उन संघर्षमय दिनों की याद करता हूं,स्मृतियाँ अंगड़ाई लेने लगती हैं।अविभाजित बिहार की कभी गृष्म राजधानी रही
रांची से एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक निकालने का स्वप्न था मेरा।जब इसकी घोषणा मैंने की, अख़बारों की दुनिया में खूब मजाक उड़ाया गया। कहा गया-‘
…विनोद जी पागल हो गए हैं…रांची से राष्ट्रीय दैनिक निकालेंगे!’ तब दिल्ली से प्रभाष जोशी के संपादन में प्रकाशित, बहुचर्चित-बहुप्रसारित ‘जनसत्ता’ में मेरी योजना का मजाक उड़ाते हुए प्रथम पृष्ठ पर एक बड़ी खबर छपी। खबर की अंतिम पंक्ति थी–‘… भय है कि कहीं विनोद जी का दावा, ढपोरशंखी दावा बन कर न रह जाए!’
कलकता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘टेलीग्राफ ‘ में भी कुछ इसी आशय की खबर छपी।
एक दिन विलंब रात्री में नव भारत टाइम्स के तत्कालीन प्रधान संपादक आदरणीय राजेन्द्र माथुर का फोन आया। बोले- ” विनोद जी,अभी कुछ देर पहले मैं,प्रभाष जोशी और राजेन्द्र अवस्थी एक कार्यक्रम में साथ बैठे थे।..आपके प्रोजेक्ट की चर्चा छिड़ी।प्रभाषजीनेकहा,”…विनोद जी पगला गए हैं।…रांची से राष्ट्रीय दैनिक निकालेंगे!…उन्हें कांके मेंटल हास्पिटल में भर्ती होना पड़ेगा।”

…मुझे बुरा लगा। मैंने कह दिया –” मैं विनोद जी को जानता हूं। अखबार के लिए साधन की उनकी क्या व्यवस्था है,इसकी जानकारी मुझे नहीं।अत: अखबार के भविष्य के विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता।लेकिन, जब उन्होंने कहा है, तब वे रांची से राष्ट्रीय दैनिक निकाल कर दिखा देंगे। “
अखबारी दुनिया में इस प्रकार. प्रकाशन के पूर्व ही “प्रभात खबर ” चर्चित ,खूब चर्चित हो गया था।आश्चर्य नहीं कि एजेंसी के लिए तब त्रिवेन्द्रम से भी मांग आई थी।
पूरे देश से संपादकीय सहयोगियों का चयन किया गया था।दिल्ली,कलकत्ता, बंबई, पटना के अखबारों में संपादकीय सहयोगियों की नियुक्ति संबंधी विज्ञापन दिए गए थे। सहायक संपादक पद पर इलाहाबाद से सुनील श्रीवास्तव और समाचार संपादक पद पर बंबई नव भारत टाइम्स के विजय भास्कर जैसे कुशल, अनुभवी सहयोगियों की नियुक्ति हुई। बाद में ‘प्रभात खबर ‘ के अनेक सहयोगी, देश के विभिन्न समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण वरिष्ठ संपादकीय पदों पर आसीन हुए। उन्हें याद कर गौरवान्वित हो उठता हूं।
नियुक्ति के संबंध में एक महत्वपूर्ण-उल्लेखनीय-दिलचस्प जानकारी – राज्य सभा के वर्तमान उपाध्यक्ष हरिवंश को लेकर!
“प्रभात खबर ” का प्रकाशन शुरु हो चुका था।लेकिन, नियुक्ति का दौर जारी था। एक दिन हमारे सहायक संपादक और समाचार संपादक मेरे पास आए। बोले–“…एक हरिवंश हैं।बंबई के एक बैंक में कार्यरत थे।नौकरी छूट गई है।रांची ससुराल है।यहां आए हुए हैं।पत्रकारिता का पार्श्व है।अगर अपने अखबार में ‘चीफ सब ‘ आदि में रख लिया जाता,तो मदद हो जाती!”
मैंने कहा – ” ठीक है,बुलाएं!”
मेरे दोनों सहयोगी हरिवंश को मेरी केबिन में लेकर आए।हमारी उनसे कुछ देर समाचार पत्र को लेकर चर्चा हुई। फिर उन्हें बाहर प्रतीक्षा करने कहा गया।मैने अपने दोनों सहयोगियों से राय मांगी। दोनों ने एक स्वर से कहा– “…ये अपने यहां नहीं चलेंगे। “
अर्थात,प्रभात खबर में’चीफ सब ‘ पद के लिए साक्षात्कार में हरिवंश अयोग्य पाए गए थे, रिजेक्ट कर दिए थे।
फिर बाद में उसी ‘प्रभात खबर’ में प्रधान संपादक पद पर कैसे आसीन हो गए?
सवाल स्वाभाविक एवं दिलचस्प है।
जवाब आगामी कल,दूसरी किस्त में!
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वरिष्ठ पत्रकार एसएन विनोद की कलम से

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