
मनुष्य सबसे पहली संसारी कार्यों की शिक्षा दीक्षा अपनी माता से ही प्राप्त करता है यो माँ जैसा उसे सिखाती है वेसा उसका व्यक्तित्त्व बनता जाता है।माँ ही संसार के सारे रिश्ते नातों को स्वयं बताती है की ये पिता दादा दादी आदि है इनके पास भी जाओ यदि वो अपने एप से बच्चे को अलग नही रखने व् रहने का अभ्यास नही कराये तो बच्चा किसी अन्य के पास नहीं जाता है यो माँ ही अपने गर्भकाल से आगे तक भी बच्चे पर अपना पूरा प्रभाव रखती है यो माँ को ही लालन पालन आदि करने से जीवित ईश्वर कहा गया है अब आप देखे की जितने भी महान लोग हुए है उनके जीवन के चर्मोउत्कृष में उनकी माता का ही मूल हाथ है।आदि काल में की जितनी भी सभ्यता आज प्राप्त हुयी है उनमे भी मातृक देवी की मुर्तिया मिली है ये आपको लगेंगी की ये किसी प्रकर्ति की उपासना की स्त्री प्रधान मुर्तिया है बल्कि ये जो भी उस काल में प्रेरणा प्रधान उच्चतर अवस्था प्राप्त थी उस स्त्री की मूर्ति है क्योकि स्त्री में सर्वाधिक ईश्वर के प्राकृतिक और अप्राकृतिक गुणों की अभिव्यक्ति अति तिर्वता से विकसित होती है क्योकि स्त्री में प्राकृतिक रूप से ग्रहण और त्याग करने की शक्ति होती है तभी स्त्री यानि प्रकर्ति शक्ति को ही प्रथम पुरुष ब्रह्म को चैतन्य करने का श्रेय है की उसने ही अपनी माया शक्ति से योगपुरुष ब्रह्म या विष्णु या शिव को उसकी व्यक्तिगत योगनिंद्रा से जाग्रत किया है तब इसी रहस्य को जानो की कौन सदैव जाग्रत रहता है? कौन सुप्त रहता है इर् जो सुप्त या योगनिंदित रहता है उसकी व्यक्तिगत सेवा से लेकर उसे जाग्रत करने तक कौन मुख्यतया भूमिका निभाता है वह स्त्री शक्ति ही है यो यही कुण्डलिनी शक्ति का मुख्य आधार है तभी इसे ही जननी और पालन करता और अपने से उचित गुणों को देने के कारण ये संतान को उच्चतर योगवाद से लेकर मोक्ष ज्ञान तक जाने के बंधन से मुक्त करती है और यही अपने में व्याप्त अवगुणों को सन्तान में व्यक्त करने और उसी को विस्तारित करने के कारण उसे भोगवाद से लेकर अकाल मृत्यु के बन्धन चक्र में डाल देती है यो अप्रत्यक्ष ईश्वर किसी ने नही देखा जो भी अप्रत्यक्ष है वह प्रत्यक्ष के ऊपर ही आश्रित होता है क्योकि मूल ही बहिर रूप में प्रकट होता है यो ही स्त्री ही मनुष्य के रूप में सदगुणों की जननी होने से देवताओं की जननी होती है और अवगुणों की जननी होने से दैत्यों की जननी होती है यही आप सभी धर्मों के मूल गर्न्थो में जानेंगे।की देवताओ और दैत्यों और सर्पों आदि की माताओं का ही परस्पर विवाद होने से ही आजतक ये देव दैत्य युद्ध चलता आता रहा है यही आप रावण की माता कैकसी और केकयी की महत्वकांक्षा का प्रत्यक्ष परिणाम राम रावण युद्ध था तथा महाभारत में भी सत्यवती से प्रारम्भ हुआ और कुंती व गंधारी और द्रोपती से होता हुआ उलूपी आदि की इच्छाओं की पूर्ति से होता हुआ महाविनाश को प्राप्त हुआ जिसका परिणाम भी अनगिनत विधवाओं नारियों को भीलों के ले जाने और उन भीलों को द्धारा ही उत्पन्न संतति का नामांतरण ही अंधकार युक्त कलियुग का इतिहास है।

कालांतर में जब जब स्त्री में व्यक्तिगत घुटन हुयी उसका परिणाम हुआ की उस की व्यक्तिगत देन सन्तान ही ने उसी के अनुसार कार्य किया चाहे वो विधवा स्त्रियों के लिए महाराणा प्रताप,शिवाजी,महाराजा सूरजमल छत्रसाल आदि अनगिनत योद्धाओं की वैचारिक उन्नति सफलता के पीछ उनकी मताओं का ही हाथ है अब चाहे राजा राममोहन हो या दयानन्द हो या विवेकानंद हो या गाँधी आदि हो आखिर इनके मनों में स्त्रियों के उत्थानों को लेकर इतना उन्नतिकारक विचार क्यों आया? क्यों विश्वभर में स्त्री प्रधानता की उन्नति को लेकर आंदोलन चले तो देखेंगे की उन सब में स्त्रियों की ही व्यक्तिगत पहले थी और जिन स्त्रियों को आप वहां खड़ा नही पाते है उनके स्थान पर आप पुरुषों को खड़ा पाते है तो वे पुरुष भी उन्ही अज्ञात स्त्री माताओं की आंतरिक स्वतन्त्रताओं को लेकर उत्पन्न तीर्व इच्छाओं का पुरुष सन्तान के रूप प्रत्यक्ष हुआ था और सदा रहेगा जैसा मन वेसा तन। आप देखेंगे की शङ्कराचार्य ने अपनी माता की आज्ञा होने पर ही सन्यास लिया और उन्हें वचन दिया की जब उनकी मृत्यु होगी तब वे उनके निकट होंगे और उनकी मनचाही प्रदान करेंगे तब यही हुआ उन्होंने उन्हें मनचाहे देव देवी के दर्शन कराये और अंत में उस समय की प्रथानुसार सन्यासी को दाह संस्कार नही करने का अधिकार के विचार को तोड़ा ये किसकी आंतरिक इच्छा थी जो शङ्कराचार्य में फलीभूत हुयी उनकी माता की यही महर्षि रमण ने अपनी माता को अंतिम समय में आठ घण्टे समधिस्थ रहकर उन्हें मोक्ष गति दी तब देखे की माता ने ऐसा कोई तप प्रत्यक्ष में तो नही किया था की जो उन्हें जीते जी बिना किसी कठिन तपस्या के मोक्ष फल मिला तो आप पाएंगे की इसी माता ने अपना ही समस्त तपोबल इसी संतान की प्राप्ति में दिया होगा तभी वही तपोबल उन्हें पुनः पूर्वत किये प्रयास के बिन प्रयास के दिखाई देने पर भी प्राप्त हुआ वो इन्ही स्त्री माता का पूर्वजन्मों का मोक्षीय तपोबल था अन्यथा कोई किसी को मोक्ष नही दे सकता है वह उसी का तपदान और फल होता है यो जैसी शक्तिशाली भूमि वेसा उनमे कमजोर बीज भी पड़ने पर शक्तिशाली ही उत्पन्न होता है यो ही पृथ्वी भूमि को माता का महान अर्थ मिला है यही पृथ्वी पुत्री सीता के लव् कुश ने श्री राम के सभी भाई सहित महावीरों को बन्दी बना लिया और श्री राम से भी युद्ध को प्रस्तुत रहे यही तो माता सीता की आक्रोशित आत्मशक्ति का परिणाम था जो जाने कहाँ तक जाता वेसे ही हनुमान जी की माता के वचन के लिए राम हनुमान युद्ध की कथा है वेसे ही द्रोपती के वचन को अर्जुन व् कृष्ण युद्ध है आदि है और अध्यात्म में भी जो वाममार्ग का गुप्त योग भोग सिद्धांत है उसमे भी प्रथम माँ यानि स्त्री ही अपनी संतान की अपने सामने साधनगत शक्तीदीक्षा देते हुए दिगम्बर होकर योनि पूजा करती उस पुरुषत्व भाव में कामभाव को रूपांतरित करती हुयी दिव्यप्रेम में प्रतिष्ठित करती थी जो की विलुप्त हो गया है उसकी जगह स्त्री और पुरुष को काम सम्बंधित भोग योग विभत्सव विकृत रूप धारण करता घोर पतन की और पातकी हुआ जबकि यही था श्री रामकृष्ण परमहं स का स्त्री शक्ति काली की साधना में स्त्री शक्ति की जीवंत गुरु भैरवी ब्राह्मणी की चोसठ कला सिद्धि उपरांत दिगम्बर होकर दिगम्बर कन्या की गोद में बैठकर समाधि लगानी और उससे भी उच्चतर खुली आँखों से रमण क्रियायुक्त दिगम्बर स्त्री पुरुष को चैतन्य भाव से दर्शन करते हुए उनके पीछे के महाभाव दिव्यकाम के द्धारा अखण्ड ईश्वर की सम्पूर्ण जीव जगत के रूप में प्रेमालीला महारास युक्त महालीला विलास दर्शन को आत्मसात करना यही हुआ जिसके फलस्वरुप रामकृष्ण अद्धैत समाधि की भूमि की सुद्रढ़ हुए और अपने शिष्यो को भी उनके पूवजन्मों के तपबलों के कारण सीधा निर्विकल्प समाधियाँ करायी ठीक यो ही शँकराचार्य ने भी अद्धैत समाधि की प्राप्ति से पूर्व भी भारती मिश्र के कामशास्त्र के प्रश्नों के उत्तरों की खोज में परकाया प्रवेश के द्धारा मृत राजा का शरीर धारण करके उसकी स्त्रियों में दिव्यकाम को अपने ज्ञान से रमित होकर शिक्षा प्राप्त कर पुनः वापस आकर भारती मिश्र के प्रश्नों का उत्तर दिया साथ ही तभी उन्होंने सोन्दर्यलहरी देवी शक्ति का भक्तिप्रधान ग्रन्थ लिखा जो विलुप्त प्राय वाममार्गी योग सिद्धांत है उसके उपरांत उतने श्रेष्ठ उनके शिष्य नही हुए है यो योग हो या भोगवादी दर्शन सबके पीछे स्त्री ही मुख्य बन्धन और मुक्ति का मूलाधार है वेसे भी अपने देखा होगा की प्रकर्ति में प्रत्यक्ष स्त्री की पुष्प आक्रति लिए व्रक्ष है जिन पर स्त्री आक्रतियां है और पुरुष आकृतियों वाली जड़ें है तो आप पाएंगे
की स्त्री प्रत्यक्ष में खुले में दिखाई देती है वहाँ भी अपने गुप्तांग को ढके है और पुरुष छिपा हुआ मूल जड़ है क्योकि वो बीज है और स्त्री परिणाम है यही है यथार्थ प्रकर्ति दर्शन जिसे देख योगियों ने व्रक्षों में प्रत्यक्ष स्त्री पुरुष जीवन कहा और लिखा की ये बोलते भी थे व है।
यो आज मातृ दिवस पर सभी को एक सन्देश है की जो अपनी माता में उच्चरत आध्यात्मिक दर्शन नही पाने के कारण ये मानते है की ये पूजनीय नही है तो उन्हें इस लिख से पता चल गया होगा की बिंदु में ही सिंधु है जो बिंदु की उपेक्षा करता है वो कभी भी सिंधु को प्राप्त नही कर सकता है माता संतान में वैचारिक मतभेद हो सकते है जिनके चलते उन्हें हम उनकी पूजा सम्मान से वंचित करते है जो की नितांत ईश्वरीय धर्म शास्त्र विरुद्ध है जितना हमें समयानुसार परस्पर विवाद में उनको अपशब्द कहने का तो अधिकार लगता है उतना ही हमे उन्हें प्रेम सम्मान शब्द कहने का भी अधिकार भी होना चाहिए अन्यथा हमारी जननी ही हमारा काल भी है और मोक्ष भी है जैसे हम चित्त एकाग्रता को एक क्रियाहीन बिंदु को चुनते है उस पर अपना मन एकाग्र करते हुए सिद्धि को प्राप्त होते है तब क्या बिंदु में सिद्धि थी या हम में थी असल में हम में थी बिंदु साधन था यही यहाँ है की प्रत्यक्ष माँ स्त्री शक्ति का प्रारम्भिक बिंदु है वेसे ये तुलना माँ की महिमा में अल्पता लाती है फिर भी एक उदाहरण मात्र है तब अपनी माँ में ही ध्यान करते हुए हम हमारी सभी कर्मों के जननी में ही हमारे सारे जन्मों के संस्कार छिपे होते है वहीँ से हमे सभी पूर्वत जन्मों का रहस्य प्राप्त होता है ये बड़ी ध्यान देने वाली चिंतनित ज्ञान है इस पर विचार करना तो आप पाएंगे की प्रत्यक्ष माँ की उपासना ध्यान में कितनी आध्यात्मिक उन्नति छिपी और प्रकट है यो अपनी जीवंत माँ को ही प्रथम प्रणाम करने का विधान और ध्यान का शास्त्र निर्देश है उसका आज से पालन करो और बन्धन से मुक्ति पाओ।
यह भी देखें
स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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Jay satya om siddhaye namah 🙏 maa ki leela aprampaar h..