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क्यों मनाते हैं अक्षय तृतीया, क्या है इससे जुड़ा धार्मिक इतिहास? इससे सम्बंधित मान्यताओ के विषय मे बता रहे हैं स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब

इस तिथि को अक्षय तृतीया यानी जिस तिथि का कभी क्षय या समापन नहीं हो,यो इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।ओर अक्षय तृतीया में तृतीया के अर्थ भी तम, रज ओर सत गुण और साकार रूप में सत्यनारायण भगवान ओर सत्यई पूर्णिमा के त्रिगुण साकार रूप में जन्मे ब्रह्मा,विष्णु और शिव और सरस्वती व लक्ष्मी और शक्ति या काली का सांसारिक कल्याण को जो अवतरण हुआ,वो भी सदा अक्षुण बना रहे,ओर इन त्रिदेव ओर त्रिदेवी शक्तियों के सम्मलित स्वरूप दत्तात्रेय भगवान की गुरु शक्तियों से भी है। अक्षय तृतीया के पीछे बहुत सारी मान्यताएं, बहुत सारी कहानियां भी जुड़ी हैं। इसे अब कलियुग में भगवान परशुराम जयंती यानी जन्मदिन यानि परशुराम जयंती के रूप में अधिक प्रचलित करते हुए भी मनाया जाता है।इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम की जन्म कथा:-
महर्षि भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो वे बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनसे सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र जन्म की कामना की। भृगु ने उन दोनों को ‘चरु’ भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेडत्र तथा उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा,तो ये थे, महाराजा विश्वरथ यानी ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा।

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विश्वामित्र की सगी बहन सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए—

रुमण्वान
सुषेण
वसु
विश्वावसु तथा
पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था।


वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था।यो ये परशुराम ही ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के पोते थे।
इसके अलावा ये दिवस विष्णु के अवतार नर व नारायण के अवतरित होने की मान्यता भी इसी दिन से जुड़ी है। यह भी मान्यता है कि त्रेता युग का आरंभ इसी तिथि से हुआ था।इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।
वैसे इसी तिथि को ब्रह्मा जी पुत्र अक्षय कुमार का जन्म होने से ही इस दिन का नाम अक्षय तृतीया पड़ा है।बाकी अवतार व युग का प्रारम्भ आदि भी इसी दिन होने से समय समय पर उनके अनुयायियों ने अपने अपने सम्प्रदायों में विशेष दिवस के रूप में मनाया है।कुल मिलाकर इस दिन आप जिस भी देवी देवता व गुरु या इष्ट को मानते है,उसकी अधिक से अधिक जप ध्यान उपासना करके अधिक से अधिक दान करें।

भारतीय मान्यता के अनुसार इस तिथि को उपवास रखने, गंगा स्नान करके दान करने से अनंत ओर अक्षय फल की प्राप्ति होती है। यानि व्रती को कभी भी किसी चीज़ का अभाव नहीं होता, उसके भंडार सदा ही भरे रहते हैं। चूंकि इस व्रत का फल कभी कम न होने वाला, न घटने वाला, कभी नष्ट न होने वाला होता है इसलिये इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।

अक्षय तृतीया सर्वसिद्ध अबूझ मुहूर्त तिथि:-

सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों के लिये इस तिथि को बहुत ही शुभ माना जाता है। एक और जहां विवाह आदि मांगलिक कार्यों को करने के लिये अक्षर शुभ घड़ी व शुभ मुहूर्त जानने के लिये ज्योतिषी या पंडित जी से सलाह लेनी पड़ती है,की कब विवाह महूर्त निकाले, तो वहीं अक्षय तृतीया एक ऐसी सर्वसिद्धि देने वाली तिथि मानी जाती है, जिसमें किसी भी मुहूर्त को दिखाने की व पूछने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।यो ही इस तिथि को अबूझ मुहूर्तों में शामिल किया जाता है। इस दिन सोना खरीदने की परंपरा भी है। मान्यता है कि ऐसा करने से लक्ष्मी जी को स्वर्ण के रूप में किसी भी समय लेन पर अक्षय समृद्धि आती है।ओर साथ ही मान्यता यह भी है कि अपनी वार्षिक कमाई में से इस दिन अवश्य ही अधिक से अधिक या कम से कम कुछ न कुछ दान अपने गुरु जी को या मन्दिर में इष्ट सेवा को ओर गरीबों व असहाय लोगों की जरूरत को करना चाहिये।तब यही दान आपको अनगिनत सहायता के रूप में इस जन्म और आगामी जन्म में प्राप्त होगा।तभी तो बहुत से धनी लोगों के बारे में कहा जाता है,की भई ये कौन सा पिछले जन्म में कर्म कर आया कि,अब इसे कुछ भी करते नहीं देखते है,ओर इससे सदा लाभ ही लाभ और उन्नति मिलती चली जाती है।ये वो ही किया अक्षय तृतीया को किया दान और उसका अक्षुण फल है,यो आप भी अवश्य करें।

अक्षय तृतीया को ये मुख्य दान करें:-

अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन सत्य नारायण ओर सत्यई पूर्णिमाँ की पूजा जलभेषक करके सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या फिर पीले गुलाब से करनी चाहिये।ओर गन्ने के रस को भी अक्षुरस कहते है,यो उसके द्धारा भी सत्य नारायण व पूर्णिमा का अभिषेक करके भक्तों में गन्ने का रस का प्रसाद बांटना चाहिए।

अक्षय तृतीया पर्व तिथि व मुहूर्त 2019:-

7 मई अक्षय तृतीया 2019

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त – 05:40 से 12:17 तक

ओर सोना खरीदने का शुभ समय – 05:40 से 26:17 तक

तृतीया तिथि प्रारंभ – 03:17 (7 मई 2019)

तृतीया तिथि समाप्ति – 02:17 (8 मई 2019) तक।

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org

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One comment

  1. Jay satya om siddhaye manah🙏 .. akshay tritya ka mehttv bht acche se btaya ar kya kya daan krna h ye b btaya..

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