
हमारे सनातन धर्म में सदा स्त्री और पुरुष के सम्बंधों की पवित्रता और स्थायित्व की व्रद्धि के लिये दो व्रतों को मनाया गया है, जो कालांतर में केवल पुरुष प्रधानता के चलते स्त्री के प्रति पुरुष का प्रेम और दायित्व आदि भावों के निर्वाहों को लेकर भी वे सभी व्रत त्यौहार आदि केवल पुरुष की महत्ता की व्रद्धि में ही परिवर्तित करते चले गए, जिनसे भाई बहिन के अद्धभुत अनेक सम्बंधों की अनेक दिव्य प्रेम को कथाओं का विलोप हो गया जो काल के पुरुषवादी अंधकार में विलीन हो गयी जिनमें कुछ इस प्रकार है की-
महाराज दशरथ और कौशल्या के मन में बडी चिंता भी हुयी की एक बार उन्होंने अपने भाई अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी पत्नि वर्षाणि को जिनके अनेक काल तक सन्तान नही होने पर वचन दिया था, की मेरे यहाँ जो भी प्रथम सन्तान होगी वे उसे अपने भाई को अवश्य देंगे। इस विषय को लेकर उन्होंने देवताओं को आवाहन कर अपनी चिंता व्यक्त की, तब देवता नारद मुनि के साथ बह्मा जी के पास गए और उन्हें इस चिंता को बताया की भगवन पृथ्वी के राजा महाराज दशरथ में अनेक बार देवताओं के साथ मिलकर असुरों के साथ युद्ध में बड़ी साहयता की है तब उनकी इस चिंता के निराकरण का क्या उपाय है, इस पर ब्रह्मदेव ने कहा की महाराज दशरथ का श्री हरि विष्णु के साथ लोकलीला का बड़ा गम्भीर सम्बन्ध है, यो आप चिन्ता नही करें ये घटना और इसका निराकरण भविष्य के गर्भ में है, जिसके चलते स्वयमेव ही इसका स्वयं समाधान हो जायेगा यो देवता व् ऋषि नारद निश्चिन्त हो कर अपने अपने लोक को चले गए तब समयानुसार फाल्गुन माह की अंतिम और चैत्र माह की प्रारम्भिक पूर्णिमा जिस जिन संसार में होलिका उत्सव मनाया जाता है। उस दिन शुभ महूर्त में एक दिव्य कन्या का जन्म हुआ चारों और हर्षोल्लास का वातावरण हो गया, तब महाराज दशरथ को जो चिंता थी उसका निराकरण भी होता देख ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने कहा देखा राजन ईश्वर की अनन्त लीला है, यो इस दूज को इस दिव्य कन्या का नामकरण किया जायेगा और अपने भाई को इसे वचनानुसार प्रदान करना तब उत्साह के साथ अपने भाई को बुला कर उसे इस दिव्य कन्या का शांता नामकरण करते हुए प्रेम से प्रदान किया, राजा रोमपद अति प्रसन्न होकर अपनी इस बेटी को लेकर अपने राज्य चले गए अब महाराज को अपनी आगामी सन्तान की चिंता भी होने लगी। उधर एक बार राजा रोमपद अपनी पुत्री शांता के साथ बाल सुलभ वार्ता में तल्लनी थे, उन्हें एक ब्राह्मण की विनय को प्रहरी ने आकर बताया, की वे अपनी दरिद्रता के साथ साथ राज्य में आये अकाल की पीड़ा का निराकरण राजा से चाहते है, तब उनकी ये बात राजन पुत्री प्रेम में भूल गए इस विलम्बित के चलते वो भक्त ब्राह्मण झुब्द मन से वहाँ से चला गया। इस पर ब्राह्मण ने अपनी प्रार्थना अपने इष्ट इंद्रदेव से करुण ह्रदय से कही जिसके फलस्वरुप इंद्रदेव और भी क्रोधित हो गए, परिणाम राज्य में और भी आकाल बढ़ता गया तब इस राज्य चिंता के साथ साथ उस ब्राह्मण की भी प्रार्थना को स्मरण करते राजा रोमदेव चिंतित थे, इसके निराकरण को वे अपने राज्य के बाहर निवास करने वाले ऋषि श्रंग जी के पास पहुँचे उन्हें पीड़ा बताई वे बोले अवश्य उपाय है, लेकिन इस उपाय में एक सबसे बड़ी बाँधा ये है की ये यज्ञ एक विवाहित ऋषि ही कर सकता है और मैं अविवाहित हूँ ऐसा सम्भव है की मेरे इस ब्रह्मचर्यावस्था में किये यज्ञ से वर्षा और राज्य में वैभव व शांति हो जायेगी, परन्तु ये अस्थाई होगी यो ही ये कहा गया है और ये विधि का भी प्रयोजन है की ऐसा ही होगा, तब ये सब जान और श्रंग ऋषि को अपनी कन्या के योग्य वर मानते हुए उन्होंने विवाह किया और ऋषि ने इस विवाह उपरांत अपनी पत्नी शांता के साथ बैठकर आकालनिवारण यज्ञ किया, जिसके फलस्वरुप राज्य में वर्षा हुयी और राज्य वैभव की व्रद्धि हुयी इस प्रकार के पुत्री विवाह में महाराज दशरथ कौशल्या सभी सम्मलित हुए आशीर्वाद भी प्रदान किया, इसके उपरांत महाराज दशरथ ने अपने राज्य में पहुँच। अपने और अपनी पत्नियों के अंदर उत्पन्न झुब्धता को भी अनुभव किया की अभी तक पुत्री शांता के उपरांत कोई सन्तान नही है तथा राज्य में आये भयंकर अकाल का भी कोई उपाय नही दिखाई दे रहा है। उस समय जेसे सारे देश में चारों और सभी राज्यो में अकाल बढ़ता जा रहा था जिसका सभी राजा अपने अपने कुलगुरुओं से यज्ञादि दिव्यकर्मों से निराकरण करा रहे थे। तब महाराज दशरथ ने गुरु वशिष्ठ को बुलाकर इस सन्तान और अकाल की समस्या का निराकरण पूछा तब ब्रह्मर्षि बोले की राजन इसके लिए ये प्रारब्ध निश्चित है और तुम्हारे पास इसका उपाय भी है दशरथ ने कहा मेरे पास उपाय है और मुझे पता नहीं है तब गुरुदेव बोले की अपनी पुत्री और दामाद ऋषि श्रंगदेव के प्रारब्ध से ये होना निश्वित है, अन्यथा ये उपाय तो स्वयं मैं कर देता मेरे लिए कुछ भी असम्भव नही है यो जिस तिथि को आपने अपनी पुत्री को राजा रोमपद को सोंपा था उसी तिथि को बुलाओ और उनका अतिथ्य सत्कार करो और तब पुत्रकामेष्ठी यज्ञ भी करना ये यज्ञ और उससे मिलने वाला दिव्यफल पुत्री और दामाद से ही प्राप्त होगा। तभी आपको दिव्य सन्तान उत्पन्न होंगी और भविष्य घटनाएं समयानुसार ही बताई जाती है और समयानुसार ही उनके समाधान होते है, ये सब जानकर महाराज दशरथ सहित महारानियों ने अपनी पुत्री शांता और दामाद श्रंग ऋषि को इस मनोकामना से इस दूज की तिथि को ही बुलाया और “पुत्रकामेष्ठि यज्ञ” कराया जिसमें बहिन और बहनोई रूपी यज्ञ ब्रह्मवेत्ताओं की कृपा से ईश्वर स्वरूप सन्तान की प्राप्ति का फल खीर को प्राप्त किया जिसे खा कर समयानुसार महाराज दशरथ की पत्नियों को पुत्र तथा श्री राम सहित तीनों भाइयों का सुख बहिन शांता को भी प्राप्त हुआ। शांता के चारों भाइयों के नामकरण संस्कार आदि सभी कर्मकांड कुलगुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी ने किये, तब उस उत्सव में पुत्री और दामाद श्रंग ऋषि को सभी यथासम्मान प्रदान किया और उन्हें सम्मान विदा किया क्योंकि इस यज्ञ में श्रंग ऋषि अपने सारा तपोबल से उत्पन्न श्री शक्ति को अर्पित करने के कारण श्रीहीन हो गए थे, जिसकी पुनः प्राप्ति को पत्नी शांता के साथ तपस्या हेतु वन में चले गए।
कालांतर में अयोध्या में इतने तीर्व परिवर्तित घटना कर्म हुए जिनमें इसी घटनाएं हुयी, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र जी का श्री राम लक्ष्मण को राक्षसों से रक्षार्थ शीघ्र ही विद्याध्ययन को वन ले जाना,तड़का खरदूषण आदि असुर वध,सीता विवाह आदि जिनमें ये घटना सहित अनेक धटनाएं अति संक्षिप्त बनकर अलिखित ही रह गयी, जैसे आगे चलकर वन में श्री गुरुदेव ब्रह्मर्षि विश्वामित्र से श्री राम ने ये कथा जानी, क्योकि ऐसा कोई सम्भावना ही नही है की अपने प्रति किये किसी भी प्रतिदान और प्रेम या कर्तव्य का निर्वाह ईश्वर अवतार श्री राम ने नही किया हो। ये कमी केवल उनके चरित्र को लिखने वाले के द्रष्टि भेद में ही सम्भव है और वेसे भी “हरि कथा अनंता” में सर्वांग अर्थ छिपा है तब इस प्रसंग में अपने गुरुदेव से ये जान कर गुरुदेव के साथ श्रीराम ने उसी वन में जाने की बात कही, तब गुरुदेव ने उन्हें उस आश्रम में ले गए, जब श्री राम लक्ष्मण श्री गुरुदेव सहित श्रंग ऋषि के आश्रम में पहुँचे। वहां पहुँच देखा की वहाँ तो कोई नही दिखाई दिया, केवल एक समाधिस्थ ऋषिवर ही दिखाई दिए जो ऋषि श्रंगदेव है ये गुरुदेव ने बताया तथा वहां विकट तपस्या के प्रभाव से एक दिव्यता फेली है साथ ही वहाँ एक आभाव की शून्यता का स्पष्ट अनुभव भी हुआ। परंतु तब इन सबके आगमन के दिव्य आकर्षण प्रभाव से ऋषि श्रंगदेव जी की समाधि खुल गयी। समाधि से चैतन्य होकर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को पहचानते हुए ऋषि ने उन्हें प्रणाम किया और नवीन दो युवको को भी दिव्य द्रष्टि से पहचाना की ये नारायण स्वरूप है, परन्तु लौकिक जगत में श्रीराम लक्ष्मण ने ही उन्हें अपने बहनोई के रूप में सम्मान देते हुए प्रणाम किया और बहिन शांता के विषय में पूछा की वे कहाँ है? तब ऋषि ने बताया आपके जन्म के उपरांत मेरी श्री शक्ति क्षीण होने पर उन्होंने मेरे साथ भीषण तपस्या की थी और उनके मन में कहीं एक मनोकामना भी थी की, उनका विवाह अपने ही कुलश्रेष्ठ वंश समान किसी क्षत्रिय कुलवंशी महापराक्रमी राजकुमार से हो जो की उनकी मनोकामना मेरे प्रारब्ध वश और आपके जन्म प्रारब्धवश अपूर्ण रह गयी थी, साथ ही यदि आप पहले जन्म लेते तो आपके पिता के रघुकुल प्रतिज्ञावश आपको अपने भाई रोमपद को प्रदान करना पड़ता जो की आपके प्रारब्ध में नही था ऐसे ही अनेक घटनाक्रमों के चलते उनकी मनोकामना शेष रह गयी है यो आप अपनी लौकिक बहिन की मनोरथ कैसे सम्पूर्ण करेंगे ये आप जाने तब ये सब जान श्री राम सहित लक्ष्मण को बहिन से नही मिलने का दुःख हुआ साथ ही बहिन की इस अपूर्ण मनोकामना की पूर्ति को भविष्य में सम्पूर्ण अवश्य करेंगे ऐसा मनोस्ंकल्प करते श्रंग ऋषि के सत्कार को स्वीकार करते प्रणाम कर वहाँ से विदा ली भविष्य में श्री हरि के द्धितीय अवतार श्री कृष्ण के रूप में अपनी पूर्व जन्म की बड़ी बहिन जो इस इस जन्म में छोटी बहिन के रूप में सुभद्रा नाम से क्षत्रिय कुल में जन्मी थी उसका विवाह विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुधर महान योद्धा अर्जुन से कराया और अपना पूर्व जन्म का बहिन के मनोरथ को सम्पूर्ण करते हुए इस फाल्गुन की अंतिम और चैत्र की प्रारम्भिक पूर्णिमा से आगामी दूज को ही श्री कृष्ण ने सुभद्रा और अर्जुन का विवाह करने का संयोग रचा कर पूर्ण किया तथा आगे भी इसी दूज को सुभद्रा सहित अर्जुन को बहनोई स्वरूप बुलाकर अपनी रानियों सहित अतिथ्य सत्कार करते हुए की हे बहिन सुभद्रा तुम्हारी कोई और मनोकामना हो तो, वह भी अपने इस भाई को बताओ, तब सुभद्रा ने कहा भाई अपने मेरी इच्छा पूर्ण की है और एक इच्छा है की मेरे भी संसार का श्रेष्ठ धनुधर महावीर पुत्र उत्पन्न हो, तब श्री कृष्ण बोले अवश्य ऐसा होगा, तथा अर्जुन से बोले की तुम मेरे सभी प्रकार से सबसे प्रिय हो तुम्हारी कोई भी मनोकामना हो वो मुझे बताओ, ये इस भैया दूज के दिन तुम्हे देकर अपना संकल्प रूप व्रत को सम्पूर्ण करूँगा। तब अर्जुन बोले की हे माधो आप भी मेरे सबसे प्रिय है आपको प्राप्त करने पर मेरा मनोरथ कुछ भी शेष नही है, यो जो आपकी जब इच्छा हो तब मुझे देना ये जान श्री कृष्ण अति प्रसन्न हुए और उस दिन की अपनी कुछ देने की इच्छा को ही महाभारत के युद्ध में अर्जुन के निस्वार्थ महाभाव के रूप में उनके संशय निवारण को साथ ही *विश्व कल्याण हेतु श्रीमद् गीता का महाज्ञान प्रदान किया, साथ ही पुरी की रथयात्रा में श्री कृष्ण बलराम भाइयों के साथ सुभद्रा भी विराजमान रहती है, ये है भाई का बहिन को प्रेमसम्मान और अपना भैया दूज का महाव्रत संकल्प सम्पूर्ण किया, यो इस दूज को अनेक ऐसे दिव्य कारणों से मनाया जाता था, जो आज केवल ज्योतिष तिथि लेखों में ही सिमट कर रह गया है, यो आज इसका पुनरुद्धार इस कथा की पुनरावर्ती से हुआ है, यो आज के इस भैया दूज को जो भी भाई इस कथा के स्मरण ओर कथन श्रवण के साथ साथ सश्रद्धा पूर्वक मानते हुए, इस प्रकार से मनाता है, उसकी और उसकी कुवारी बहिन अथवा विवाहित बहिन के साथ बहनोई की भी सभी मनोकामनाएं ईश्वर कृपा से सम्पूर्ण होती है, व्रत की सामान्य विधि यो है की जो भाई अपनी बहिन यदि बहिन कुवारी है, तो उसके शुभ मनोरथ की पूर्ति हेतु छोटा अथवा बड़ा भाई अपनी सामर्थ्यानुसार ससम्मान बहिन को उसकी मनोरूप या अपनी सामर्थ्य अनुसार कोई भी प्रिय भेंट देता है और उसके मनोरथ को सम्पूर्ण करने का वचन देता हुआ, समयानुसार उस दिए वचन को सम्पूर्ण करता है, और यदि बहिन का विवाह हो जाने पर भाई अपनी बहिन और बहनोई को अपने यहां इस दिन भैया दूज को सम्मान से बुलाता है और अपनी सामर्थ्यानुसार सत्कार करता हुआ उनका मनोरथ सम्पूर्ण करता है। तो अवश्य सभी मनोरथ स्वयं सहित बहिन के भी ईश्वर अनुकंपा से सम्पूर्ण होते है। सर्व कल्याण की प्राप्ति होती है यो ही इस दूज को इतने विशिष्ठ कारणों से बहिन की दूज कहलाने पर भी इस दिन को “भैया दूज” ही कहते है। आप भी अपनी बहिन के लिए यदि वो कुवारी है तो और विवाहित है तो भी उसे और उसके पति अपने बहनोई को ससम्मान अपने यहाँ बुलाकर अपनी सामर्थ्यानुसार सत्कार अवश्य करें ऐसा संकल्प पूरा करने का नाम ही व्रत कहलाता है यो आज के दिन भैया दूज को मनाकर यथासम्भव भेंट देकर अवश्य व्रत सम्पूर्ण करें।।
जब जगे तब हो सवेरा।
ज्ञान सदा मिटाये अज्ञान अंघेरा।।
शृंग ऋषि ओर शांता देवी का आश्रम व मन्दिर:-
ऋषि शृंग ने महाराज दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया था। जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाये थे वह अयोध्या से लगभग 39 कि.मी. पूर्व में था और वहाँ आज भी उनका आश्रम है और उनकी तथा उनकी पत्नी की समाधियाँ हैं।
हिमाचल प्रदेश में है शृंग ऋषि और देवी शांता का मंदिर ,हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में शृंग ऋषि का मंदिर भी है। कुल्लू शहर से इसकी दूरी करीब 50 किमी है। इस मंदिर में शृंग ऋषि के साथ देवी शांता की प्रतिमा विराजमान है। यहां दोनों की पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।बाल्मीकि रामायण से उपलब्ध प्रमाण-
इक्ष्वाकूणाम् कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः |
नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्य प्रतिश्रवः || काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 2-अर्थ – ऋषि सनत कुमार कहते हैं कि इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न दशरथ नाम के धार्मिक और वचन के पक्के राजा थे ,
अङ्ग राजेन सख्यम् च तस्य राज्ञो भविष्यति |
कन्या च अस्य महाभागा शांता नाम भविष्यति || काण्ड 1 सर्ग 11श्लोक3
अर्थ-जिनकी शांता नाम की पुत्री पैदा हुयी जिसे उन्होंने अपने मित्र अंगदेश के राजा रोमपद को गोद दे दिया और अपने मंत्री सुमंत के कहने पर उसका विवाह श्रंगी ऋषि से तय कर दी थी।
यहाँ कहने का अर्थ है की ये सब प्रमाण कम ही है यो इन सभी की तरहां स्वयं इश्वत प्रेरणा से ये सत्य ज्ञान उद्धभाषित किया है जैसे वे सब कथाएँ मान्य है और समयानुसार हुयी ठीक वेसे ही ये भी सत्य मान्य है।ज्ञान भक्ति पर ही टिका है।।इसे अवश्य मनाए।

स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी
जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः
www.satyasmeemission.org
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