जी हां सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठ गए हैं। और इस अनशन की सबसे बड़ी बात, कि यह अनशन उनकी सबसे पसंदीदा जगह दिल्ली नहीं बल्कि रालेगण सिद्धि है, मतलब उनका घर।
अन्ना रालेगण सिद्धि के ही रहने वाले हैं इसीलिए उन्होंने रालेगण सिद्धि से ही अनशन को शुर करने का सोचा है।
लेकिन इस अनशन और जगह पर सवाल उठना लाजमी है कि क्या अन्ना हजारे का जादू खत्म हो गया है? क्योंकि न तो पहले को तरह भीड़ है और न ही वो मार्केटिंग।
कुछ लोगों ने पहले अन्ना को जबरन गांधी बनाने की कोशिश की थी लेकिन अन्ना के नाम से अपना नाम चमकाकर वो बड़े नेता बन गए। लेकिन अन्ना वही सादगी भरे अन्ना रहे।
आपको बता दें कि जब यूपीए की सरकार थी तब अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अनशन शुरू किया था। 2011 का वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ‘अन्ना आंदोलन’ बना दिया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो उस वक्त गुजरात के सीएम थे, वे कहा करते थे कि ये अन्ना हजारे लोकपाल के लिए अपनी जान देने को तैयार है। अन्ना का आरोप है कि आज वही मोदी उनके पत्रों का जवाब देना तक उचित नहीं समझते।
इसीलिए अन्ना अब तब तक अनशन करेंगे, जबतक की लोकपाल न बन जाये।
बुधवार को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के दिन अन्ना हजारे सुबह 10 बजे अपने गांव रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठ गए। अन्ना की मांगे वहीं हैं जो 2011 में हुआ करती थीं। लेकिन तब यूपीए की सरकार थी और आज एनडीए की मोदी सरकार है।
अन्ना कह रहे हैं कि उस वक्त लोकायुक्त की नियुक्ति हो जाती तो राफेल जैसे मुद्दे देखने को नहीं मिलते। भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लग चुका होता। अन्ना प्रयास कर रहे हैं लेकिन न तब उनकी सुनने वाला कोई था और न अब उनकी कोई सुनने वाला दिखाई दे रहा है।
अन्ना अगर अपने अतीत में जाकर देखें कि उनके अनशन से असल फायदा किसे होता है तो कुछ नाम सामने आएंगे। आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी, मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास आदि सभी लोगों ने अपनी सुविधानुसार नई राह पकड़ ली। योगेंद्र यादव ने भी राजनीतिक पार्टी बनाई, लेकिन वे किसानों और छात्रों के मुद्दे उठाकर आज भी खुद को आंदोलनकारी बनाए हुए हैं।
लेकिन अन्ना के लिए जनता का समर्थन कम होता चला गया।
लेकिन अब फिर से अन्ना कह रहे हैं कि “मेरे शरीर में जब तक जान हैं तब तक मेरा आंदोलन जारी रहेगा।” अन्ना कहते हैं कि “करेंगे या मरेंगे, लेकिन ऐसी नादान सरकार के लिए क्यों मरना? देश की भलाई के लिए जीना है।”
अब देखना यह है कि “मैं हूँ अन्ना” कहने वाले कितने अन्ना के साथ आते हैं और ‘अन्ना नहीं आंधी है, देश का दूसरा गांधी है’, जैसे नारे देने वाले कितने वापस आएंगे।
अन्ना के इस अनशन का मतलब क्या है? ये तो अन्ना बता सकते हैं या वक़्त। क्योंकि लोकसभा चुनावों को मात्र 3 महीने बचे हैं और पीएम मोदी की मार्केटिंग के सामने इतनी बड़ी मार्केटिंग कोई नहीं कर सकता। तो ऐसे में अन्ना का अनशन का मतलब कहाँ तक रह जाता है किस ओर मुड़ता है, ये तो आने वाला वक़्त भलीभांति बता देगा।
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